-वंदे मातरम् के 150 वर्ष से युवा भारत के 2047 तक: इतिहास से भविष्य की ओर बढ़ता सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तां हमारा
गोंदिया - वैश्विक स्तरपर 15 अगस्त 2026 भारत के इतिहास में केवल एक और स्वतंत्रता दिवस नहीं होगा। यह वह अवसर है,जब देश अपनी आजादी के 80वें स्वतंत्रता दिवस का उत्सव मनाएगा और साथ ही 150 वर्ष की ऐतिहासिक यात्रा पूरी कर चुके राष्ट्रगीत वंदे मातरम् को भी विशेष राष्ट्रीय सम्मान के साथ स्मरण करेगाहालांकि 1947 से 2026तक स्वतंत्रता की अवधि 79 वर्ष पूर्ण हुई है,इसलिए संवैधानिक/ऐतिहासिक गणना में 15 अगस्त 2026 को 80वां स्वतंत्रता दिवस समारोह कहना अधिक उपयुक्त है। इस वर्ष का उत्सव एक ऐसे भारत की तस्वीर प्रस्तुत करता दिखाई दे रहा है,जहां अतीत की स्वतंत्रता- स्मृतियां और भविष्य की युवा आकांक्षाएं एक ही मंच पर मिल रही हैं। वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ के लिए 7 नवंबर 2025 से 7 नवंबर 2026 तक राष्ट्रव्यापी वर्षभर का कार्यक्रम पहले ही शुरू किया जा चुका है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र बताना चाहूंगा क़ि वंदे मातरम् की इस ऐतिहासिक गूंज के साथ एक महत्वपूर्ण संवैधानिक और कानूनी अध्याय भी जुड़ चुका है। प्रेवेंशन ऑफ़ इंसल्ट्स टू नेशनल हॉनर (अमेन्डमेंट ) बिल,2026 को संसद में राज्यसभा ने 29 जुलाई 2026 और लोकसभा ने 30 जुलाई 2026 को पारित कियाथा। इस विधेयक पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 11 अगस्त 2026 को अपने हस्ताक्षर किए,जिसके बाद यह कानून बन गया है, अब यह राष्ट्रीय गीत को राष्ट्रीय गान के समान वैधानिक संरक्षण देने वाला कानून बनाया गया। इसके तहत राष्ट्रीय गीत के गायन को जान बूझकर रोकने या उसमें व्यवधान डालने पर वही दंडात्मक प्रावधान लागू किए गए हैं जो राष्ट्रीय गान के संदर्भ में हैं।इसलिए 15 अगस्त 2026 का लाल किला केवल अतीत को याद करने का मंच नहीं,बल्कि 2047 के विकसित भारत की दिशा निर्धारित करने वाला राष्ट्रीय संवाद बन सकता है।देश के सामने एक तरफ तिरंगे की शान, हर घर तिरंगा, तिरंगा बाइक रैलियां,सांस्कृतिक कार्यक्रम और राष्ट्रगीत की गूंज होगी, तो दूसरी तरफ बेरोजगारी प्रतियोगी
परीक्षाओं की पारदर्शिता पेपर लीक शिक्षा कौशल रोजगार स्टार्टअप डिजिटल अर्थव्यवस्था कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानसिक दबाव और युवाओं की राजनीतिक भागीदारी जैसे सवाल भी होंगे। यही कारण है कि इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस को युवा शक्ति के उत्सव के रूप में देखना महज भावनात्मक विचार नहीं, बल्कि सटीकता से समय की आवश्यकता प्रतीत होता है।
साथियों बात अगर हम लाल किले से ‘वंदे मातरम्’ की गूंज और 150 वर्षों कीऐतिहासिक यात्रा को समझने की करें तो ‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं,बल्कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना का एक महत्वपूर्ण प्रतीक रहा है। इसे बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में रचा था और बाद में यह स्वतंत्रता आंदोलन में राष्ट्रीय जागरण का स्वर बना। भारत सरकार ने 2025-26 को इसकी 150वीं वर्षगांठ का वर्ष घोषित करते हुए वर्षभर के राष्ट्रीय कार्यक्रमों की शुरुआत की है।15 अगस्त 2026 के समारोह में इसका विशेष महत्व इसलिए भी है क्योंकि राष्ट्रगीत की 150 वर्ष की यात्रा को स्वतंत्रता दिवस के राष्ट्रीय मंच से जोड़ना अतीत और वर्तमान के बीच एक प्रतीकात्मक सेतु तैयार करता है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार इस अवसर पर लाल किले से ‘वंदे मातरम्’ की प्रस्तुति को विशेष महत्व दिया जाएगा।यहां लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण कसौटी भी सामने आती है राष्ट्रप्रेम केवल कानून से पैदा नहीं होता; वह नागरिक चेतना, स्वैच्छिक सम्मान और संविधान के प्रति प्रतिबद्धता से मजबूत होता है। इसलिए ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ का वास्तविक अर्थ तभी पूर्ण होगा जब यह गीत भारतीयों को केवल अतीत के बलिदानों की याद न दिलाए, बल्कि वर्तमान में राष्ट्र निर्माण की जिम्मेदारी का भी एहसास कराए।
साथियों बात अगर हम 80 वां स्वतंत्रता दिवस: तिरंगे के साथ युवा भारत की नई उड़ान इसको समझने की करें तो, इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस का सबसे महत्वपूर्ण संदेश संभवतः युवा भारत के नाम हो सकता है। भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसका विशाल युवा वर्ग है। आज का युवा केवल नौकरी मांगने वाला नागरिक नहीं है; वह स्टार्टअप बना रहा है, डिजिटल अर्थव्यवस्था खड़ी कर रहा है, अंतरिक्ष और विज्ञान में आगे बढ़ रहा है, खेलों में विश्व मंच पर भारत का नाम रोशन कर रहा है और लोकतांत्रिक विमर्श में अपनी आवाज बुलंद कर रहा है। सरकारी माय भारत कार्यक्रम में स्वतंत्रता दिवस 2026 के लिए युवाओं की भागीदारी पर आधारित क्विज और अन्य गतिविधियां आयोजित की गईं तथा चयनित प्रतिभागियों को लाल किले के समारोह में आमंत्रित किए जाने की व्यवस्था की गई। यह स्वयं इस बात का संकेत है कि इस वर्ष समारोह में युवा सहभागिता को विशेष स्थान दिया जा रहा है।इसका व्यापक अर्थ यह है कि स्वतंत्रता दिवस का मंच अब केवल स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान की स्मृति तक सीमित नहीं रह सकता। आजादी की अगली परीक्षा यह है कि भारत का युवा अपने सपनों को अवसर में और अवसर को उपलब्धि में बदल पाता है या नहीं। युवा पूछ रहा है,शिक्षा कितनी गुणवत्तापूर्ण होगी? रोजगार कितने मिलेंगे? प्रतियोगी परीक्षाएं कितनी पारदर्शी होंगी? पेपर लीक कब रुकेगा? एआई और ऑटोमेशन के युग में भविष्य की नौकरियां कैसी होंगी? ग्रामीण और छोटे शहरों के युवाओं को समान अवसर कैसे मिलेगा? और राजनीति में युवाओं की भागीदारी केवल चुनावी नारों तक सीमित रहेगी या निर्णय- निर्माण में भी उनकी वास्तविक भूमिका बढ़ेगी ?यही वे असल सवाल हैं जो 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से निकलने वाले किसी भी युवा-केंद्रित संदेश को सटिका से ऐतिहासिक बना सकते हैं।
साथियों बात कर हम संसद का मानसून सत्र: आजादी के 80 वर्ष बाद लोकतांत्रिक संवाद पर सवाल को समझने की करें तो 15 अगस्त के उत्सव से ठीक पहले 13 अगस्त 2026 को संसद का मानसून सत्र समाप्त हुआ। लेकिन इस सत्र ने लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने एक गंभीर प्रश्न भी छोड़ा है, क्या संसद वह मंच बन पा रही है जहां देश के सबसे महत्वपूर्ण सवालों पर पर्याप्त और सार्थक बहस हो? सत्र के समापन पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार लोकसभा की उत्पादकता लगभग 19 प्रतिशत, जबकि राज्यसभा की लगभग 39 प्रतिशत रही। 12 विधेयक पारित हुए, लेकिन केवल एक विधेयक पर दोनों सदनों में चर्चा हुई।यहां 39 प्रतिशत का आंकड़ा विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करता है, लेकिन यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह पूरी संसद की संयुक्त उत्पादकता नहीं बल्कि राज्यसभा की उत्पादकता का आंकड़ा है। लोकसभा का आंकड़ा इससे भी कम रहा। यही अंतर बताता है कि संसदीय कामकाज का संकट कितना गंभीर है।पेपर लीक और परीक्षाओं की पारदर्शिता जैसे युवा- केंद्रित मुद्दों को लेकर विपक्ष के विरोध और सरकार - विपक्ष के बीच टकराव ने सत्र के बड़े हिस्से कोप्रभावित किया। दूसरी ओर सरकार ने विपक्ष पर बार-बार सदन बाधित करने का आरोप लगाया।यह राजनीतिक आरोप- प्रत्यारोप अपनी जगह हैं, लेकिन नागरिक के लिए मूल प्रश्न इससे बड़ा है जिस संसद से युवा अपने भविष्य के लिए कानून और नीतियां चाहता है, क्या वहां उसके सवालों पर पर्याप्त चर्चा हो रही है?यही स्वतंत्रता दिवस 2026 का विरोधाभास भी है। एक तरफ देश लोकतंत्र की 80वीं वर्षगांठ की यात्रा का उत्सव मना रहा होगा, दूसरी तरफ संसद के कामकाज पर सवाल खड़े होंगे। इसलिए इस वर्ष तिरंगे के नीचे सबसे जरूरी संदेश शायद यही होगा कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं; परंतु लोकतंत्र बहस,
असहमति जवाबदेही और संसदीय कामकाज की संस्कृति का भी सटीकता से नाम है।
साथियों बात कर हम युवा आंदोलनों ने बदला राजनीतिक विमर्श को समझने की करें तो,पिछले कुछ सप्ताहों में छात्रों और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर आंदोलन और विरोध भारतीय राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रहे हैं। पेपर लीक, प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता,
रोजगार और शिक्षा जैसे विषय अब केवल परीक्षा-कक्ष की समस्याएं नहीं रह गए हैं; वे राजनीतिक जवाबदेही के प्रश्न बन चुके हैं।युवा पीढ़ी का संदेश साफ है,डिग्री चाहिए, लेकिन उसके साथ अवसर भी चाहिए; परीक्षा चाहिए, लेकिन उसके साथ निष्पक्षता भी चाहिए;विकास चाहिए, लेकिन उसके साथ रोजगार भी चाहिए।यहां 2026 का युवा आंदोलन भारतीय राजनीति को एक नई दिशा देने की क्षमता रखता है। यदि युवा केवल चुनाव के समय मतदाता न रहकर नीति- निर्माण का सक्रिय भागीदार बनता है, तो भारतीय लोकतंत्र का अगला चरण अधिक सहभागी लोकतंत्र का हो सकता है।इसीलिए प्रधानमंत्री के 15 अगस्त के संबोधन में यदि रोजगार, स्किलिंग, एआई,स्टार्टअप, खेल, शिक्षा सुधार, परीक्षा प्रणाली, युवा उद्यमिता और मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषयों पर कोई बड़ा रोडमैप सामने आता है, तो वह इस वर्ष के स्वतंत्रता दिवस को केवल समारोह नहींबल्कि नीति- संदेश का राष्ट्रीय मंच बना सकता है। हालांकि भाषण में क्या घोषणाएं होंगी, यह पहले से निश्चित मानना उचित नहीं होगा।
साथियों बात अगर हम अमेरिका में भारत दिवस भारतीय प्रवासी की बढ़ती वैश्विक पहचान, को समझने की करें तो 15 अगस्त 2026 की विशेषता केवल भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं है।अमेरिका के कई राज्यों द्वारा 15 अगस्त को इंडिया डे अथवा भारत के स्वतंत्रता दिवस के रूप में मान्यता दिए जाने की घोषणाएं भारत की वैश्विक सामाजिक और सांस्कृतिक उपस्थिति का उल्लेखनीय संकेत हैं।न्यूयॉर्क, न्यू जर्सी और मैसाचुसेट्स के बाद डेलावेयर द्वारा भी 15 अगस्त 2026 को इंडिया डे के रूप में मान्यता दिए जाने की खबर सामने आई है। इन घोषणाओं में भारतीय- अमेरिकी समुदाय की संस्कृति परंपराओं और अमेरिकी समाज में उसके योगदान को रेखांकित किया गया है। मैसाचुसेट्स में गवर्नर माउरा हीली द्वारा 15 अगस्त को इंडिया डे घोषित किए जाने की खबर पहले आई थी, जबकि न्यूयॉर्क और न्यू जर्सी में भी इस अवसर को आधिकारिक मान्यता देने की घोषणाएं की गईं। यह केवल प्रतीकात्मक कूटनीति नहीं है।अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों की दूसरी और तीसरी पीढ़ी अब राजनीति, विज्ञान, चिकित्सा, तकनीक, शिक्षा, व्यवसाय और सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। भारतीय प्रवासी समुदाय की यह बढ़ती उपस्थिति भारत-अमेरिका संबंधों में पीपल-टू- पीपल डिप्लोमेसी को भी मजबूत करती है।अर्थात 15 अगस्त 2026 को तिरंगा केवल दिल्ली के लाल किले पर नहीं फहराएगा; वह न्यूयॉर्क, न्यू जर्सी, मैसाचुसेट्स, डेलावेयर और दुनिया के अनेक हिस्सों में भारतीय मूल के लोगों की पहचान,स्मृति औरउपलब्धियों के साथ भी दिखाई देगा।जब किसी दूसरे देश के राज्य भारत के राष्ट्रीय दिवस को आधिकारिक रूप से मान्यता देते हैं, तो इसका एक सांस्कृतिक अर्थ होता है और एक रणनीतिक अर्थ भी।सांस्कृतिक अर्थ है कि भारतीय सभ्यता, भाषाओं परंपराओं और त्योहारों ने अमेरिकी समाज में अपनी जगह बनाई है।इसलिए 15 अगस्त 2026 का भारत दिवस अमेरिका में भारतीय मूल के युवाओं के लिए भी विशेष संदेश रखता है,अपनी जड़ों से जुड़े रहकर वैश्विक नागरिक बनना।आज का भारतीय युवा एक साथ दो पहचान लेकर चल सकता है,भारतीय सभ्यता का उत्तराधिकारी और वैश्विक अर्थव्यवस्था का सक्रिय भागीदार। यही भारत की सॉफ्ट पावर की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है।
साथियों बात अगर हम आजादी की अगली मंजिल: 2047 का विकसित भारत को समझने की करें तो 1947 में भारत ने राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त की थी। 2026 में सवाल यह है कि 2047 तक भारत किस प्रकार की आर्थिक, सामाजिक, तकनीकी और मानवीय स्वतंत्रता हासिल करना चाहता है।क्या हर युवा को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलेगी? क्या रोजगार की तलाश में युवाओं को अपने गांव और छोटे शहर छोड़ने की मजबूरी कम होगी?
-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318


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