चेतन सिंह
पत्रकारिता पर सबसे बड़ा हमला सत्ता ने नहीं किया, बल्कि उन लोगों ने किया जिन्होंने पत्रकारिता का चोला पहनकर उसे सौदेबाजी का औजार बना दिया। लोकतंत्र में पत्रकारिता को चौथा स्तंभ इसलिए नहीं कहा गया कि वह सत्ता, व्यवस्था और जनता के बीच समझौते का माध्यम बन जाए। पत्रकारिता का सम्मान इसलिए नहीं है कि उसके नाम पर प्रभाव, पहुंच और दबाव का व्यापार किया जाए। पत्रकारिता का मूल धर्म है सवाल पूछना, सच सामने लाना और हर परिस्थिति में जनता के पक्ष में खड़ा रहना। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आज पत्रकारिता के भीतर ही एक ऐसी द्वेष प्रवृत्ति तेजी से पनप रही है जिसने पत्रकारिता और बिचौलियागिरी के बीच की रेखा को धुंधला कर दिया है।
पिछले कुछ वर्षों को गौर करे तो गांव, कस्बों और तहसील स्तर पर पत्रकारिता का एक नया चेहरा उभरकर सामने आया है। किसी मामले की शिकायत हुई, किसी विभाग पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा, किसी प्रधान और सचिव के बीच विवाद हुआ, किसी गोशाला, मुक्तिधाम, स्वच्छता या विकास कार्यों पर सवाल उठे, किसी योजना में अनियमितता सामने आते ही बस फिर द्वेष पूर्ण पत्रकारिता कर रहे कुछ लोगों की सक्रियता अचानक बढ़ जाती है। उन्हें समस्या से कम, समस्या से पैदा होने वाली संभावनाओं में अधिक रुचि दिखाई देती है। कल तक जो व्यक्ति खुद को तथकथित पत्रकार कहते हुए किसी प्रधान, सचिव या कर्मचारी को भ्रष्टाचार का प्रतीक बताकर सुर्खियां बटोर रहा था, वही कुछ दिनों बाद उसके साथ बैठकों और दौरों में दिखाई देने लगता है। जो कल ग्रामीणों का हवाला देकर जांच की मांग कर रहा था, वही आज जांच की दिशा बदलवाने की चर्चाओं में नजर आता है। ऐसे लोग पत्रकार कम और मौसम वैज्ञानिक अधिक लगते हैं। पहले हवा का रुख बनाते हैं, फिर उसी दिशा में खड़े होकर अपना लाभ तलाशते हैं।
सच तो यह है कि आज पत्रकारिता का सबसे बड़ा संकट बाहर से नहीं, खुद पत्रकारिता के भीतर पैदा हुआ है। पहले पत्रकार खबर खोजता था, समस्यात्मक मुद्दों को उठाता था अब खबर के बहाने अवसर खोजने लगे हैं। पहले पत्रकार जनता की लड़ाई लड़ता था, उसकी आवाज को प्रमुखता देता था, अब कुछ लोग दोनों पक्षों के बीच खड़े होकर अपनी भूमिका तलाशते हैं। पहले कलम व्यवस्था पर दबाव बनाती थी ताकि सुधार हो, अब कहीं-कहीं दबाव स्वयं एक कारोबार का रूप लेता दिखाई देता है। विडंबना देखिए, जिन लोगों को व्यवस्था की खामियां उजागर करनी चाहिए, वे स्वयं उन्हीं कमियों के बीच अपना स्थान खोजने लगते हैं। कभी किसी अधिकारी के कमरे में, कभी किसी कर्मचारी के साथ, कभी किसी जनप्रतिनिधि के इर्द-गिर्द। सुबह विरोध, शाम समर्थन और रात में समझौते की चर्चाएं होती रहती है। यह पत्रकारिता नहीं, अवसरवाद का चरित्र है। गांवों में अब लोग अक्सर कहते सुनाई देते हैं कि खबर छपने से उतना डर नहीं लगता, जितना खबर छपने के बाद शुरू होने वाली गतिविधियों से लगता है। शिकायतकर्ता सोचता है कि अब न्याय मिलेगा, लेकिन कई बार उसके सामने ऐसे चेहरे सक्रिय हो जाते हैं जो समस्या के समाधान से पहले अपने लिए जगह तलाशने लगते हैं। यही वह स्थिति है जहां पत्रकारिता की विश्वसनीयता सबसे अधिक घायल होती है। सबसे बड़ा नुकसान तब होता है जब जनता का भरोसा टूटने लगता है। गांव का किसान, मजदूर, वृद्ध, दिव्यांग और पीड़ित व्यक्ति जब किसी पत्रकार के पास अपनी समस्या लेकर पहुंचता है तो वह उसे अपनी अंतिम उम्मीद मानता है। वह विश्वास करता है कि उसकी बात समाज और शासन तक पहुंचेगी। लेकिन जब उसे यह महसूस होने लगे कि कुछ लोग समस्या के समाधान से ज्यादा उसके इर्द-गिर्द बनने वाले समीकरणों में रुचि रखते हैं, तब पत्रकारिता की साख पर गहरी चोट लगती है।
यह भी एक कटु सत्य है कि समाज पत्रकार और प्रेस कार्ड के बीच का अंतर समझता है। प्रेस कार्ड छपवाना आसान है, पत्रकार बनना कठिन। किसी संगठन में पद पा लेना पत्रकारिता नहीं है। किसी अधिकारी के मोबाइल में नंबर सेव हो जाना पत्रकारिता नहीं है। किसी व्हाट्सएप समूह में खबरों की कॉपी-पेस्ट करना पत्रकारिता नहीं है। किसी जनप्रतिनिधि के साथ तस्वीर खिंचवा लेना पत्रकारिता नहीं है। किसी मामले में दखल देकर स्वयं को प्रभावशाली साबित करना भी पत्रकारिता नहीं है। पत्रकारिता वह है जो बिना भय और बिना लालच के सच लिख सके, और सच लिखने के बाद भी उसी पर अडिग रह सके। आज आवश्यकता आत्ममंथन की है। पत्रकारिता को बाहरी खतरों से कम, भीतर घुस आए उन तत्वों से अधिक खतरा है जिन्होंने कलम को साधना नहीं, साधन बना लिया है। ऐसे लोग कुछ समय के लिए प्रभावशाली दिखाई दे सकते हैं, लेकिन इतिहास में उनका स्थान कभी पत्रकारों के बीच नहीं होता और न ही है। इतिहास और समाज हमेशा उन लोगों को याद रखता है जिन्होंने सच के साथ खड़े रहने का साहस दिखाया, न कि उन लोगों को जिन्होंने सच और झूठ के बीच अपनी सुविधा का रास्ता खोज लिया। वही दूसरी ओर समाज को भी सतर्क रहना होगा। असली पत्रकार की पहचान उसके साहस, उसकी खबर और उसकी विश्वसनीयता से होती है। कलम की सबसे बड़ी ताकत न सत्ता है, न संपर्क, न प्रभाव। उसकी सबसे बड़ी ताकत जनता का भरोसा है। और जिस दिन यह भरोसा टूट जाता है, उसी दिन पत्रकारिता का सबसे बड़ा नुकसान होता है। आज प्रश्न केवल इतना नहीं है कि कुछ लोग क्या कर रहे हैं। प्रश्न यह है कि क्या हम पत्रकारिता को मिशन बनाए रखेंगे या उसे बिचौलियों के हवाले कर देंगे। आने वाला समय इसी प्रश्न का उत्तर तय करेगा कि किसने सच का साथ दिया और किसने सच के आसपास अपनी दुकान सजाई। समय इसका फैसला अवश्य करता है। लगभग एक दशक के करीब पत्रकारिता अनुभव के आधार पर मैं इतना अवश्य कह सकता हूं कि पत्रकारिता का भविष्य बड़े मीडिया घराने नहीं तय करेंगे। उसे गांव, कस्बे और तहसील स्तर पर दिन रात काम करने वाले पत्रकार तय करेंगे। इसलिए यह समय आत्ममंथन का है। कलम को कलम रहने देना होगा। यदि वह सिफारिश, प्रभाव और सौदेबाजी के बीच उलझ गई तो नुकसान किसी व्यक्ति का नहीं, पूरे पेशे का होगा। इसलिए समय अभी भी है पत्रकारिता को पत्रकारिता रहने दें, बिचौलियागिरी का पर्याय न बनने दें।

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