अमेरिकी प्रशंसा,ब्रिटेन एफटीए,निवेश आकर्षण वैश्विक आर्थिक शक्ति बनने की दिशा में समग्र व्यापक विश्लेषण
गोंदिया। वैश्विक स्तरपर विश्व की आर्थिक व्यवस्था में किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी सैन्य क्षमता से पहले उसकी आर्थिक मजबूती से आंकी जाती है।विकसित राष्ट्र बनने के अनेक मानदंड हैं,किंतु उन सभी का मूल आधार सुदृढ़ अर्थव्यवस्था,स्थिर वित्तीय व्यवस्था निवेशकों का विश्वास, मजबूत पूंजी बाजार और प्रभावी वैश्विक साझेदारियां हैं।आज भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनकर तीसरे स्थान की ओर तेज़ी से अग्रसर है।इसी पृष्ठभूमि में आठ महत्वपूर्ण घटनाएं भारत की आर्थिक यात्रा को नई दिशा देती दिखाई देती हैं।27 जून 2026 को अमेरिकी विदेश मंत्री द्वारा भारत और भारत के प्रधानमंत्री की सार्वजनिक प्रशंसा,भारत को अमेरिका का सबसे करीबी रणनीतिक साझेदार बताना, वैश्विक रेटिंग एजेंसियों की भूमिका पर उठे प्रश्न, भारत- ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) की संभावनाएं, भारतीय मूल की कंपनियों की वैश्विक सफलता पर ब्रिटिश रिपोर्टें,एमएसएमई दिवस 27 जून 2026 पर उद्यमिता को लेकर दिया गया संदेश,वैश्विक कंपनियों के निदेशकों को भारत के विकास से परिचित कराने की रणनीति तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 27 जून 2026 को शुरू हुई तीन दिवसीय सेशेल्स यात्रा।इनसभी घटनाओं का साझा संकेत यह है कि भारत केवल एक विशाल उपभोक्ता बाजार नहीं, बल्कि आने वाले दशकों में वैश्विक निवेश,उत्पादन,व्यापार और पूंजी निर्माण का प्रमुख केंद्र बनने की क्षमता रखता है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि विश्व इतिहास बताता है कि जिन देशों की अर्थव्यवस्था मजबूत हुई,वही विश्व राजनीति और वैश्विक व्यापार के केंद्र बने।अमेरिका, जापान,जर्मनी, चीन और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने अपनी आर्थिक शक्ति के आधार पर विश्व में प्रभाव स्थापित किया।आज भारत भी उसी दिशा में आगे बढ़ रहा है।लगभग डेढ़ अरब की आबादी, विशाल घरेलू बाजार,युवा कार्यबल, तीव्र डिजिटलीकरण, मजबूत बैंकिंग व्यवस्था,रिकॉर्ड जीएसटी संग्रह,बढ़ता विदेशी मुद्रा भंडार,विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देने वाली नीतियां तथा आधारभूत संरचना में अभूतपूर्व निवेश भारत को विश्व की सबसे आकर्षक अर्थव्यवस्थाओं में शामिल कर रहे हैं। यही कारण है कि वैश्विक निवेशक अब भारत को केवल विकासशील देश नहीं बल्कि दीर्घकालिक निवेश गंतव्य के रूप में देखने लगे हैं।
साथियों, शेयर बाजार किसी देश की अर्थव्यवस्था का दर्पण माना जाता है,लेकिन यह वर्तमान की अपेक्षा भविष्य की संभावनाओं पर अधिक प्रतिक्रिया देता है।जब निवेशकों को विश्वास होता है कि किसी देश की नीतियां स्थिर हैं,सरकार सुधारों के प्रति प्रतिबद्ध है, अंतरराष्ट्रीय संबंध मजबूत हो रहे हैं और उद्योगों को विस्तार के अवसर मिल रहे हैं,तब पूंजी बाजार में सकारात्मक वातावरण बनता है।इसके विपरीत राजनीतिक अस्थिरता, युद्ध,आर्थिक मंदी, बढ़ती महंगाई या वैश्विक अविश्वास बाजार में गिरावट का कारण बन सकते हैं।इसलिए कूटनीतिक घटनाओं का भी शेयर बाजार पर अप्रत्यक्ष लेकिन महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। 27 जून 2026 को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो द्वारा भारत और भारतीय प्रधानमंत्री की प्रशंसा को इसी व्यापक आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। उन्होंने भारत को अमेरिका का सबसे करीबी रणनीतिकसाझेदार बताते हुए कहा कि भारतीय पीएम के नेतृत्व में भारत आर्थिक रूप से अधिक मजबूत होकर प्रभावशाली वैश्विक शक्ति के रूप में उभर रहा है।उन्होंने व्यापार, महत्वपूर्ण खनिज, ऊर्जा सुरक्षा,आपूर्ति श्रृंखला तथा समुद्री नेविगेशन जैसे क्षेत्रों में भारत-अमेरिका सहयोग की भी सराहना की। अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए ऐसे बयान यह संकेत देते हैं कि विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत को दीर्घकालिक रणनीतिक भागीदार के रूप में देख रही है। इससे भारत की वैश्विक विश्वसनीयता मजबूत हो सकती है और निवेशकों का मनोबल बढ़ सकता है।
साथियों, यदि किसी देश के पक्ष में वैश्विक महाशक्ति सकारात्मक संदेश देती है तो उसका प्रभाव प्रत्यक्ष से अधिक मनोवैज्ञानिक होता है। विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई), वैश्विक पेंशन फंड, संप्रभु संपत्ति कोष तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियां निवेश निर्णय लेते समय केवल कंपनी की बैलेंस शीट नहीं देखतीं,बल्कि राजनीतिक स्थिरता,अंतरराष्ट्रीय संबंध, कानून व्यवस्था, व्यापारिक वातावरण और भविष्य की विकास संभावनाओं का भी मूल्यांकन करती हैं।इस दृष्टि से भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी भारतीय शेयर बाजार के लिए दीर्घकालिक सकारात्मक संकेत मानी जा सकती है।
आज भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का महत्वपूर्ण केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। कोविड महामारी और विभिन्न भू-राजनीतिक घटनाओं के बाद विश्व की अनेक कंपनियां उत्पादन का विविधीकरण चाहती हैं।ऐसी स्थिति में यदि भारत विश्वसनीय साझेदार के रूप में उभरता है तो इलेक्ट्रॉनिक्स सेमीकंडक्टर,रक्षा विनिर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा, ऑटोमोबाइल,फार्मास्यूटिकल्स, लॉजिस्टिक्स और बंदरगाह क्षेत्रों में बड़े निवेश संभव हैं। इन क्षेत्रों से जुड़ी सूचीबद्ध कंपनियों को भी दीर्घकालिक लाभ मिल सकता है।
साथियों, विश्व अर्थव्यवस्था में क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।फिच,मूडीज़ और एसएंडपी जैसी एजेंसियां किसी देश की सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग निर्धारित करती हैं। उनकी रिपोर्टें यह संकेत देती हैं कि संबंधित देश अपनी वित्तीय जिम्मेदारियों को किस सीमा तक निभाने में सक्षम है।यदि किसी देश की रेटिंग बेहतर होती है तो विदेशी निवेशकों का विश्वास बढ़ सकता है,सरकार अपेक्षाकृत कम ब्याज दर पर ऋण जुटा सकती है,विदेशी पूंजी का प्रवाह बढ़ सकता है तथा बांड और शेयर बाजार दोनों को लाभ मिल सकता है। दूसरी ओर यदि रेटिंग घटती है तो विदेशी निवेशकों का जोखिम आकलन बढ़ जाता है, पूंजी निकासी का खतरा बढ़ सकता है तथा बाजार में अस्थिरता दिखाई दे सकती है।हालांकि यह भी उतना ही सत्य है कि किसी देश की वास्तविक आर्थिक शक्ति केवल रेटिंग एजेंसियों से निर्धारित नहीं होती। कई बार किसी देश का वास्तविक आर्थिक प्रदर्शन उसकी रेटिंग से बेहतर होता है। इसी संदर्भ में केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने 26 जून 2026 को लंदन में कहा कि कुछ वैश्विक रेटिंग एजेंसियां भारत के साथ निष्पक्ष व्यवहार नहीं कर रही हैं और उन्होंने कुछ कमजोर अर्थव्यवस्थाओं को भी भारत से बेहतर रेटिंग दी है।यह टिप्पणी वैश्विक वित्तीय मूल्यांकन प्रणाली पर एक गंभीर बहस को जन्म देती है। यदि भारत निरंतर उच्च विकास दर,बेहतर कर संग्रह, नियंत्रित राजकोषीय घाटा, मजबूत बैंकिंग प्रणाली और संरचनात्मक सुधार जारी रखता है,तो अंततः वास्तविक आर्थिक प्रदर्शन ही निवेशकों का विश्वास जीतता है।
भारत और ब्रिटेन के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ऐतिहासिक अवसर सिद्ध हो सकता है। एफटीए का मूल उद्देश्य व्यापारिक बाधाओं को कम करना, आयात-निर्यात को सरल बनाना और निवेश को प्रोत्साहित करना है। यदि यह समझौता प्रभावी रूप से लागू होता है तो भारतीय वस्त्र उद्योग, दवा उद्योग, सूचना प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग उत्पाद, कृषि प्रसंस्करण, रत्न एवं आभूषण तथा ऑटो कंपोनेंट उद्योग को बड़ा लाभ मिल सकता है। इससे संबंधित कंपनियों की आय में वृद्धि की संभावना बनेगी और शेयर बाजार में इन क्षेत्रों के प्रति निवेशकों की रुचि बढ़ सकती है।
साथियों, भारत-ब्रिटेन आर्थिक सहयोग का एक और महत्वपूर्ण पक्ष भारतीय मूल की कंपनियों की बढ़ती वैश्विक सफलता है।विभिन्न व्यावसायिक रिपोर्टों में यह उल्लेख किया गया है कि भारतीय मूल की कंपनियां ब्रिटेन में हजारों रोजगार सृजित कर रही हैं,अरबों पाउंड का राजस्व उत्पन्न कर रही हैं तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। ऐसी रिपोर्टें वैश्विक निवेशकों को यह संदेश देती हैं कि भारतीय उद्यम केवल घरेलू बाजार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में भी सफल हैं। इससे भारतीय कॉर्पोरेट क्षेत्र की विश्वसनीयता और निवेश आकर्षण दोनों मजबूत होते हैं।
साथियों, 27 जून को मनाया गया अंतरराष्ट्रीय एमएसएमई दिवस भारत के लिए विशेष महत्व रखता है क्योंकि सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्यम भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक आधारशिला हैं। यही क्षेत्र करोड़ों लोगों को रोजगार देता है, बड़े उद्योगों की आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करता है तथा निर्यात में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है। यदि इस क्षेत्र को सस्ता ऋण, आधुनिक तकनीक, डिजिटल प्लेटफॉर्म, निर्यात सहायता और नवाचार के अवसर मिलते हैं तो संपूर्ण औद्योगिक उत्पादन में तेजी आती है। इसका सकारात्मक प्रभाव अंततः बड़ी सूचीबद्ध कंपनियों और शेयर बाजार पर भी दिखाई देता है क्योंकि मजबूत एमएसएमई का अर्थ है मजबूत औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र।आज विश्व की बड़ी कंपनियां निवेश निर्णय लेने से पहले केवल सरकारी प्रस्तुतियों पर निर्भर नहीं रहतीं। वे स्वयं उस देश की यात्रा करती हैं, उद्योगों का निरीक्षण करती हैं, आधारभूत संरचना देखती हैं और स्थानीय व्यापारिक वातावरण का मूल्यांकन करती हैं। यदि भारत वैश्विक कंपनियों के निदेशकों और निवेशकों को अपने औद्योगिक गलियारों, एक्सप्रेस-वे, बंदरगाहों, रक्षा गलियारों, डिजिटल भुगतान व्यवस्था, स्टार्टअप इकोसिस्टम, सेमीकंडक्टर परियोजनाओं और स्मार्ट शहरों का प्रत्यक्ष अनुभव कराता है, तो यह निवेश आकर्षित करने का अत्यंत प्रभावी माध्यम सिद्ध हो सकता है। प्रत्यक्ष अनुभव किसी भी रिपोर्ट से अधिक विश्वसनीय होता है।
साथियों, भारतीय प्रधानमंत्री की 27 से 29 जून 2026 तक शुरू हुई सेशेल्स यात्रा को भी केवल विदेश नीति तक सीमित नहीं देखा जाना चाहिए। हिंद महासागर वैश्विक व्यापार का अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। भारत के अधिकांश ऊर्जा आयात और निर्यात इसी समुद्री क्षेत्र से होकर गुजरते हैं। यदि भारत इस क्षेत्र में अपनी रणनीतिक उपस्थिति मजबूत करता है तो समुद्री व्यापार अधिक सुरक्षित होगा, आपूर्ति श्रृंखला की विश्वसनीयता बढ़ेगी और भारतीय कंपनियों के लिए नए व्यापारिक अवसर खुलेंगे। सेशेल्स स्वास्थ्य, कृषि, पर्यटन और खाद्य सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में भारत के साथ सहयोग बढ़ाने का इच्छुक है, जिससे भारतीय उद्योगों को नए बाजार मिल सकते हैं।
साथियों, निवेशकों के दृष्टिकोण से देखें तो इन सभी घटनाओं का एक साझा संदेश है, भारत की वैश्विक आर्थिक विश्वसनीयता लगातार मजबूत हो रही है। हालांकि किसी एक बयान, यात्रा या समझौते से शेयर बाजार में स्थायी तेजी की गारंटी नहीं दी जा सकती, क्योंकि बाजार पर वैश्विक ब्याज दरों, महंगाई, भू-राजनीतिक तनाव, कॉर्पोरेट आय और अन्य अनेक कारकों का भी प्रभाव पड़ता है।फिर भी यदि सकारात्मक कूटनीति, आर्थिक सुधार, मुक्त व्यापार समझौते, मजबूत एमएसएमई, विदेशी निवेश और आधारभूत संरचना विकास समानांतर रूप से आगे बढ़ते हैं, तो भारतीय अर्थव्यवस्था और पूंजी बाजार दोनों को दीर्घकालिक लाभ मिलने की संभावना मजबूत होती है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि कहा जा सकता है कि भारत आज ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है जहां उसकी आर्थिक प्रगति को केवल घरेलू उपलब्धियों से नहीं बल्कि वैश्विक मंच पर भी व्यापक मान्यता मिल रही है। अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंध, ब्रिटेन के साथ व्यापारिक सहयोग, वैश्विक निवेशकों का बढ़ता विश्वास, भारतीय उद्योगों की अंतरराष्ट्रीय सफलता, समुद्री कूटनीति, एमएसएमई सशक्तीकरण और निरंतर आर्थिक सुधार मिलकर भारत को आने वाले वर्षों में विश्व अर्थव्यवस्था के प्रमुख विकास इंजन के रूप में स्थापित कर सकते हैं। यदि यही गति, नीति-स्थिरता और सुधारों का क्रम जारी रहता है, तो भारतीय शेयर बाजार भी दीर्घकाल में इस आर्थिक परिवर्तन का सबसे बड़ा लाभार्थी बन सकता है और विकसित भारत 2047 का लक्ष्य अधिक यथार्थवादी एवं सशक्त आधार प्राप्त कर सकता है।
-संकलनकर्ता लेखक - क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

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