भारत देवताओं की भूमि रही है।यहाॅं राम कृष्ण शिव अवतार लेकर लीलायें किए हैं।यहाॅं की भाषा देव भाषा संस्कृत थी।देवता लोगों का संवाद संस्कृत में ही होता था।संस्कृत आम बोलचाल की भाषा थी।सुर असुर सभी संस्कृत बोलते थे।आखिर ऐसा क्या हुआ कि जो भाषा सर्व स्वीकार थी जिसे सभी बोलते थे।उसका पतन क्यों हो गया।यह यक्ष प्रश्न भारतियों के सम्मुख है। जवाब किसी के पास या तो है नहीं।है तो गोलमोल।
जहाॅं तक मेरा मानना है,संस्कृत के पतन का कारण संस्कृत के विद्वान रहे हैं। जिसमें मुख्य भूमिका पाणिनि की है। पाणिनि ही आदिकाल में संस्कृत के महापंडित कहे गये।व्याकरणाचार्य कहलाए। उन्होंने ऐसे कठिन कठिन शब्दों का प्रयोग किया।कठोरतम से कठोर नियम बनाए।जिससे आम लोग संस्कृत से दूर होने लगे।उनके समकक्ष और उनके बाद के विद्वानों ने उन्हीं के सूत्र को मानते गये।और कड़ाई से शिक्षा में उनके ही व्याकरण को मनवाये।जहाॅं बहुसंख्य सरलता की तरफ बढ़ रहे थे,वहीं कुछ संस्कृत के विद्वान इस होड़ में लगे रहे पाणिनि से भी कठिन शब्द ढूंढ़ने में।परिणाम यह हुआ कि बहुसंख्य संस्कृत से दूर होने लगे।उस भाषा की तरफ अग्रसर हो लिए जो क्षेत्रानुसार आम बोलचाल में सरल थी।लोग प्राकृतिक भाषा की तरफ उन्मुख हुए।इसके बावजूद भी संस्कृत के विद्वानों ने ध्यान नहीं दिया।और टिके रहे उसी कठोरता पर कठोरता के साथ।जिसका परिणाम यह हुआ कि भारत में अनेक भाषाओं ने जन्म ले लिया।और संस्कृत अधोगति की तरफ बढ़ने लगी। नतीजा यह निकला कि संस्कृत के साथ साथ संस्कृति का भी पतन होने लगा।लोग कुसंस्कारी होने लगे। इसी तरह पूजा पाठ में भी इतने नियम लगा दिए हैं कि लोग पूजा पाठ से विमुख होकर दूसरी तरफ जाना शुरू कर दिए।जैसे धर्म परिवर्तन।जहाॅं देखें सरलता वहाॅं चले गये। नियमों की कठोरता ने लोगों को धर्म विमुख कर दिया।सनातन सिमटता जा रहा है।और धर्म फैलता जा रहा है।क्योंकि मैकाले की शिक्षा में संस्कार नाम की चीज ही नहीं है।वह सनातन को भी क्षति पहुॅचा रहा है।पैसा कमाने का जरिया बना हुआ है।ऐश करने का प्रलोभन दे रहा है।शराब शबाब का आनंद लें रहा है।इसलिए लोग उसी की तरफ आकृष्ट होते जा रहे हैं।
इसी दौरान म्लेच्छों के आक्रमण भारत पर होने लगे।जो विजयी हुआ वो शासक बन गया।उसने अपनी भाषा को पुष्ट किया। संस्कृत कमजोर होते चली गई। फिर देश पर अंग्रेजी हुकूमत आई।संस्कृत को कमजोर करने के लिए गुरुकुल बंद करवाये गये।और मैकाले की शिक्षा देश पर प्रभुत्व जमाते चली गई।इसी बीच हिन्दी का उदय हुआ।हिन्दी संस्कृत से सरल रही अधिकांश भारतीय हिन्दी को अपनाये।हिन्दी भारत को आजाद कराने में मुख्य भूमिका निभाई।उत्तर से दक्षिण,पूरब से पश्चिम के लोगों को जोड़ा। लेकिन संस्कृत अब भी उभर नहीं पाई।रही सही कसर आजादी के बाद तत्कालीन सरकारों ने मैकाले की शिक्षा को बढ़ावा देकर पूरा कर दिया।संस्कृत रसातल में चली गई।बड़े मजे की बात ये है कि जितनी क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियाॅं देश में हैं सभी क्षत्रप क्षेत्रीय भाषाओं का गुणगान और हिन्दी का विरोध तो करते हैं।मगर अंग्रेजी और उर्दू का कभी विरोध नहीं करते। संस्कृत जो देश की प्राचीन भाषा है,उसे लागू करवाने के लिए कोई आंदोलन नहीं होते। संस्कृत धीरे धीरे पूजा पाठ से भी नदारद की जा रही है।बहुत से विद्वान पंडित संस्कृत का वाचन या तो करते ही नहीं या कम करते हैं।जहाॅं के पंडित वहाॅं की भाषा का चलन बढ़ रहा है।देववाणी संस्कृत मृतप्राय होती जा रही है।ऐसे ही चलता रहा तो एक दिन संस्कृत का अस्तित्व मिट जायेगा। इसलिए मेरा मानना है।जो भी आज की तारीख में संस्कृत के विद्वान हैं वे पाणिनि के व्याकरण को या तो सरल करें,नहीं तो व्याकरण को बदलें।जिससे संस्कृत सरल हो।आम जन की समझ में आये।जैसे रामचरित मानस सरल भाषा में लिखा गया है।पूरे भारतवासी पढ़ लेते हैं।समझ लेते हैं।वैसे ही संस्कृत को बचाने के लिए जितना सरल हो सके,उतना सरल किया जाय।अनाड़ी भी उसका अर्थ समझ ले।तभी संस्कृत बचेगी।अन्यथा डूबना अवश्यम्भावी है।कुछ आम बोलचाल की बोली का समावेश संस्कृत में आज समय की माॅंग है।
जैसे यह गायत्री मंत्र मैने रचा है।
ॐ खाटूश्याम देवाय विद्यमहे त्रिशरधाराय धीमहि तन्नो हारे के सहारे प्रचोदयात्।
ऐसे ही सरल करने की कोशिश की जाय।तो शायद लोग संस्कृत भाषा की तरफ उन्मुख हों।नहीं पतन तो हो ही रहा है।वैसे इस मंत्र में मैं पराभूतानाम आश्रय: भी लिख सकता था।मगर सरल करने के लिए स्वस्फूर्त जो जबान पर आ रहा है,जो प्रचारित है वहीं लिखा है।
पं.जमदग्निपुरी
![]() |
| विज्ञापन |


