नया सवेरा नेटवर्क
रफा-दफा....रफा-दफा...!
बन्द दोनों की.....!
आपस में बोल चाल थी...
हरकतें दोनों की ही,
बेहद ढील-ढाल थी....
हाल दोनों का ही...बेहाल था
दोनों ही के दिल दिमाग पर...
हावी....दुनियावी मायाजाल था..
यह हुआ तो था....पहली दफा
कि....दोनों ही एक दूजे से....!
दिख रहे थे ख़फ़ा-ख़फ़ा....
बनाई जाए दूरियाँ कितनी...!
दोनों ही के मन में यह सवाल था
दोनों ही अब तलक.....!
न जान पाए थे जिंदगी में....
कि घाटा किसे कहते...और...
किसे कहते हैं नफ़ा....
समझे नहीं थे दोनों अब तलक
क्या होती है वफा और बेवफा....
इल्जाम भी नहीं था कोई...!
एक दूसरे पर प्यारे.....
दोनों ही बोलते थे हमेशा,
एक दूजे थे सफ़ा-सफ़ा....
इसीलिए मन में होती रही....!
हलचल भी सदा....कि...
मतभेद होना जायज़ है
जिंदगी में यदा-कदा...
बुज़ुर्गों ने भी सही इसको
हमेशा ही कहा....पर....
बात मिलन की करने की
करेगा कौन पहल यहाँ...
गले से नीचे....पहले....!
कौन उतारेगा गरल यहाँ...
उहापोह में दोनों पड़े थे प्यारे...
कि अचानक सामने आया....
मसीहा एक अजूबा सा....!
बताया बड़ी आसानी से....
यह कि...हर एक मसले पर प्यारे
किताबों में लिखी हैं....
कई-कई दफा....कई-कई दफा...
चाहो तो उपयोग उसका....!
आप भी कर लो प्यारे....
पर हल हर एक मसले की.....!
बस एक दफ़ा....रफ़ा-दफ़ा...
मानना हो तो मान लो राय मेरी
वरना...आप भी स्वतंत्र हो प्यारे..
क्योंकि कहीं लिखी हुई.....!
मिलती ही नहीं किताबों में प्यारे..
मजबूत दफा जग की यह....!
रफा-दफा....रफा-दफा...
रचनाकार....
जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ
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