नया सवेरा नेटवर्क
गोंदिया - वैश्विक स्तरपर भारत की हजारों वर्षों पुरानी सभ्यता में माता-पिता,गुरु और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता को केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं,बल्कि जीवन-मूल्य माना गया है।इसी भावना का एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्वरूप है पितृ पक्ष,जिसमें मनुष्य अपने दिवंगत पूर्वजों को स्मरण कर उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करता है।वर्ष 2026 में तिथियों को लेकर 26 और 27 सितंबर का कुछ भ्रम दिखाई दे रहा है,किंतु मीडिया में आई पंचांग गणना के अनुसार 26 सितंबर 2026,शनिवार को भाद्रपद पूर्णिमा और पूर्णिमा श्राद्ध है,जबकि मुख्य पितृ पक्ष का आरंभ 27 सितंबर 2026, रविवार को प्रतिपदा श्राद्ध से होगा और 10 अक्टूबर 2026,शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ इसका समापन होगा।पूर्णिमा श्राद्ध 26 सितंबर को पितृ पक्ष से ठीक पहले पड़ता है।प्रतिपदा तिथि 26 सितंबर की रात प्रारंभ होने के कारण भी दोनों तारीखों को लेकर भ्रम पैदा होता है।सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को है। इस प्रकार धार्मिक दृष्टि से 26 सितंबर का भी श्राद्ध संबंधी महत्व है,लेकिन प्रतिपदा से आरंभ होने वाला पितृ पक्ष 27 सितंबर से माना जाना अधिक सटीक है।परंतु मैं एडवोकेट क़िशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र बताना चाहूंगा कि पितृ पक्ष 2026 का सबसे बड़ा प्रश्न पंचांग की तारीख नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक चरित्र की तारीख बदलने का है। जिस देश की संस्कृति “मातृ देवो भव,पितृ देवो भव” का संदेश देती है,उसी समाज के सामने आज यह असहज प्रश्न खड़ा है कि कहीं हम मृत्यु के बाद माता-पिता के प्रति श्रद्धा प्रदर्शित करने में तो आगे नहीं बढ़ रहे, लेकिन उनके जीवित रहते हुए उनके लिए समय, संवाद, सम्मान और सहारा देने में पीछे तो नहीं हट रहे? तकनीकी और डिजिटल युग ने दुनिया को हथेली पर ला दिया है, परंतु कई परिवारों में एक ही घर के सदस्यों के बीच भावनात्मक दूरी बढ़ने की चिंता भी लगातार व्यक्त की जाती है।नई पीढ़ी शिक्षा, रोजगार, व्यवसाय और वैश्विक अवसरों के कारण शहरों तथा विदेशों तक पहुंच रही है जो स्वयं में सकारात्मक सामाजिक-आर्थिक प्रगति है लेकिन इस प्रगति का अर्थ माता-पिता और बुजुर्गों से भावनात्मक संबंध समाप्त होना नहीं हो सकता।तकनीक समस्या नहीं है; समस्या तब है जब सुविधा संवेदना की जगह लेने लगे।
साथियों बात अगर हम 26 सितंबर से 10 अक्टूबर 2026 तक प्रत्येक दिन क़े श्राद्ध को समझने की करें तो 26 सितंबर 2026, शनिवार- पूर्णिमा श्राद्ध,27 सितंबर, रविवार-प्रतिपदा श्राद्ध, 28 सितंबर,सोमवार- द्वितीया श्राद्ध, 29 सितंबर, मंगलवार- तृतीया श्राद्ध और महाभरणी श्राद्ध 30 सितंबर,बुधवार- चतुर्थी और पंचमी श्राद्ध, 1 अक्टूबर, गुरुवार- षष्ठी श्राद्ध, 2 अक्टूबर, शुक्रवार- सप्तमी श्राद्ध, 3 अक्टूबर, शनिवार- अष्टमी श्राद्ध, 4 अक्टूबर, रविवार- नवमी श्राद्ध, 5 अक्टूबर, सोमवार- दशमी श्राद्ध, 6 अक्टूबर, मंगलवार- एकादशी श्राद्ध, 7 अक्टूबर, बुधवार- द्वादशी और मघा श्राद्ध, 8 अक्टूबर, गुरुवार- त्रयोदशी श्राद्ध, 9 अक्टूबर, शुक्रवार- चतुर्दशी श्राद्ध, 10 अक्टूबर शनिवार सर्वपितृ अमावस्या
साथियों,सोशल मीडिया पर समय-समय पर ऐसे मार्मिक वीडियो,समाचार और दावे सामने आते रहते हैं जिनमें कहीं वृद्ध माता-पिता को अकेला छोड़ने, कहीं बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार और कहीं संतान द्वारा अंतिम समय में भी उपस्थित न हो पाने जैसी घटनाएं दिखाई जाती हैं। प्रत्येक वायरल वीडियो की स्वतंत्र सत्यता जांचे बिना उसे पूरे समाज का प्रतिनिधि तथ्य नहीं माना जा सकता, लेकिन ऐसी घटनाएं एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न अवश्य खड़ा करती हैं,यदि माता-पिता जीवित रहते हुए हमारी उपस्थिति, प्रेम और सहारे के लिए तरसते रहें, तो उनके निधन के बाद विशाल आयोजन महंगे कर्मकांड और सार्वजनिक प्रदर्शन क्या उस अनुपस्थिति की भरपाई कर सकते हैं?श्राद्ध की आत्मा “श्रद्धा” है और श्रद्धा का पहला प्रमाण जीवित माता-पिता के प्रति व्यवहार होना चाहिए। मृत्यु के बाद फूल चढ़ाना सुंदर परंपरा हो सकती है, किंतु जीवन रहते हुए प्रेम के दो शब्द, साथ बैठकर भोजन, बीमारी में सेवा, नियमित संवाद और सम्मान कहीं अधिक जीवंत श्रद्धांजलि हैं।
साथियों,यहीं पितृ पक्ष का आध्यात्मिक संदेश आधुनिक सामाजिक विमर्श में असाधारण रूप से प्रासंगिक हो जाता है। यदि कोई व्यक्ति अपने बुजुर्ग माता-पिता को अकेलेपन,आर्थिक असुरक्षा या अपमान में छोड़कर बाद में भव्य श्राद्ध आयोजित करता है,तो समाज कोकर्मकांड के साथ उसके मूल उद्देश्य पर भी विचार करना चाहिए। इसका अर्थ धार्मिक अनुष्ठानों को कमतर आंकना नहीं है; बल्कि उनके भीतर निहित कर्तव्य, सेवा और कृतज्ञता को व्यवहार में उतारना है।जिस पिता ने अपनी आवश्यकताओं को सीमित करके संतान की शिक्षा पर खर्च किया, जिस मां ने अपना सुख त्यागकर बच्चों का भविष्य बनाया,उनके वृद्ध होने पर उन्हें “बोझ” समझना केवल पारिवारिक विफलता नहीं,बल्कि सामाजिक मूल्यों के क्षरण का संकेत है।विदेश या दूसरे शहर में रहना उपेक्षा का पर्याय नहीं होना चाहिए।आज वीडियो संवाद,तत्काल धन हस्तांतरण,स्वास्थ्य निगरानी और अनेक डिजिटल सुविधाएं उपलब्ध हैं;अर्थात वही तकनीक जिसे दूरी का कारण माना जाता है, सही उपयोग से माता-पिता के साथ संबंध मजबूत करने का माध्यम भी सटीकता से बन सकती है।
साथियों, हिंदू धार्मिक परंपरा में पितृ पक्ष केवल कर्मकांड का समय नहीं,बल्कि अपनी जड़ों की ओर लौटने, अपने अस्तित्व में पूर्वजों के योगदान को स्वीकार करने और अगली पीढ़ी तक कृतज्ञता के संस्कार पहुंचाने का अवसर है।धार्मिक मान्यता है कि इस अवधि में पितर सूक्ष्म रूप से अपने वंशजों के निकट आते हैं और श्रद्धापूर्वक किए गए तर्पण, पिंडदान, अन्नदान तथा श्राद्ध को स्वीकार कर आशीर्वाद देते हैं। इसे वैज्ञानिक तथ्य के बजाय धार्मिक आस्था और परंपरा के रूप में समझना उचित है। किंतु इसके पीछे छिपा सामाजिक और दार्शनिक संदेश सार्वभौमिक है,मनुष्य अकेला नहीं बनता; उसके वर्तमान के पीछे माता-पिता और अनेक पीढ़ियों का त्याग,परिश्रम, संस्कार और संघर्ष खड़ा होता है। यही कारण है कि पूर्वज- स्मरण की परंपराएं केवल भारत तक सीमित नहीं हैं।दुनियाँ की अनेक संस्कृतियों में अलग-अलग रूपों में दिवंगत पूर्वजों को स्मरण करने, उनकी कब्रों या स्मृति-स्थलों पर जाने और परिवार के साथ उनकी स्मृतियां साझा करने की परंपराएं मिलती हैं। इसलिए पितृ पक्ष को भारतीय संस्कृति के साथ-साथ मानवीय कृतज्ञता के व्यापक दर्शन के रूप में भी सटीकता से देखा जा सकता है।
साथियों,भारत में बुजुर्गों के अधिकारों को केवल नैतिकता के भरोसे नहीं छोड़ा गया है। माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण- पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 जैसी कानूनी व्यवस्था संतान और रिश्तेदारों की जिम्मेदारियों के प्रश्न को विधिक आयाम भी देती है। लेकिन प्रत्येक पारिवारिक संबंध को कानून के सहारे जीवित नहीं रखा जा सकता। अदालत आर्थिक भरण- पोषण का आदेश दे सकती है, परंतु माता के अकेलेपन को पुत्र के स्नेह में और पिता की प्रतीक्षा को बेटी के संवाद में परिवर्तित करने का आदेश कोई कानून नहीं दे सकता। उसके लिए संस्कारों की सामाजिक पुनर्जागृति आवश्यक है।विद्यालयों, परिवारों, धार्मिक- सामाजिक संस्थाओं और जनसंचार माध्यमों को मिलकर ऐसी चेतना विकसित करनी होगी जिसमें बच्चों को सफलता का अर्थ केवल उच्च वेतन, बड़ा पद और विदेश में नौकरी नहीं, बल्कि उन हाथों का सम्मान करना भी सिखाया जाए जिन्होंने उन्हें वहां तक पहुंचाया है।
साथियों,आज आवश्यकता किसी हिंसक अथवा टकराव पूर्ण क्रांति की नहीं, बल्कि संवेदनाओं की विराट सामाजिक क्रांति की है,ऐसी क्रांति जिसमें पितृ पक्ष के सोलह दिनों की श्रद्धा वर्ष के शेष दिनों में भी माता-पिता की सेवा में दिखाई दे।परिवार सप्ताह में कम-से-कम कुछ निश्चित समय बुजुर्गों के साथ संवाद के लिए निर्धारित करें; दूर रहने वाली संतान नियमित संपर्क रखे; स्वास्थ्य, आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक सहभागिता की जिम्मेदारी साझा की जाए; बच्चों को दादा-दादी और नाना-नानी के जीवन-संघर्ष की कहानियां सुनाई जाएं। इससे पीढ़ियों के बीच केवल संबंध नहीं, बल्कि अनुभव और संस्कारों का हस्तांतरण भी होगा। डिजिटल युग को दोष देने के बजाय डिजिटल साधनों को “पीढ़ियों को जोड़ने वाला सेतु” बनाना आज की वास्तविक आवश्यकता है।
अतः 27 सितंबर से 10 अक्टूबर 2026 तक का पितृ पक्ष हमारे सामने केवल पूर्वजों का श्राद्ध करने का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का दर्पण लेकर आ रहा है। प्रश्न यह नहीं कि हमने पितरों के लिए कितने दीप जलाए, कितने लोगों को भोजन कराया अथवा कितना बड़ा अनुष्ठान किया; बड़ा प्रश्न यह है कि जब हमारे माता- पिता हमारे सामने थे, तब हमने उनके जीवन में कितनी रोशनी भरी? पितृ पक्ष की सार्थकता तभी पूर्ण होगी जब “मृत्यु के बाद श्रद्धा” के साथ “जीवन रहते सेवा” हमारी पारिवारिक संस्कृति का अटूट सिद्धांत बने। शायद आधुनिक भारत के लिए पितृ पक्ष का सबसे बड़ा संदेश यही है,श्राद्ध से पहले श्रद्धा, कर्मकांड से पहले कर्तव्य और मृत्यु के बाद सम्मान से पहले जीवन रहते माता-पिता का मान- सम्मान।
-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318
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