मेढ़ा बाजार में दिन भर रहा धार्मिक माहौल, पूरे बाजार ने गांव की सीमा तक पैदल जाकर किया विदा
नया सवेरा नेटवर्क
जौनपुर।
“वाचक! प्रथम सर्वत्र ही ‘जय जानकी जीवन’ कहो,
फिर पूर्वजों के शील की शिक्षा तरंगों में बहो।
दुख, शोक, जब जो आ पड़े, सो धैर्य पूर्वक सब सहो,
होगी सफलता क्यों नहीं कर्त्तव्य पथ पर दृढ़ रहो।।“
महाकवि मैथिलीशरण गुप्त की यह कविता बदलापुर तहसील क्षेत्र के मेढ़ा बाजार निवासी अरविंद जायसवाल पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं, जो अपने पूर्वजों की दी गई शील शिक्षा के साथ दृढ़ कर्तव्य के पथ पर चलते हुए अपने खानदान के लिए नई मिसाल कायम की है, जिसकी चर्चा इन दिनों मेढ़ा बाजार ही नहीं, बल्कि आसपास के क्षेत्रों में भी हो रही है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ और रोजमर्रा की व्यस्तताओं के बीच अरविंद जायसवाल ने अपने पितरों और पूर्वजों को स्मरण करते हुए गया (बिहार) जाकर धार्मिक अनुष्ठान करने का संकल्प लिया। इस निर्णय को उन्होंने केवल व्यक्तिगत धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे पूरे खानदान को जोड़ने और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम बनाया।
स्वर्गीय दुर्गेश चंद्र जायसवाल के सुपुत्र अरविंद जायसवाल ने अपने परिवार की परंपराओं और पूर्वजों की स्मृतियों को संजोने की दिशा में एक ऐसा कदम उठाया, जिसे परिवार के लोगों ने भावनात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बताया। बताया गया कि उनके खानदान में इस तरह पूर्वजों को सामूहिक रूप से स्मरण करते हुए 'गया' जाकर धार्मिक अनुष्ठान करने की पहल पहले किसी ने नहीं की थी। ऐसे में अरविंद का यह निर्णय परिवार के लिए विशेष बन गया। 'गया' जाने की तैयारी कुछ महीने पहले से शुरू कर दी गई थी। दिन निश्चित होने के साथ ही परिवार में पूजा-पाठ और धार्मिक तैयारियां शुरू हो गईं। धीरे-धीरे रिश्तेदारों और शुभचिंतकों को इसकी जानकारी दी गई तो बड़ी संख्या में लोग इस धार्मिक यात्रा से भावनात्मक रूप से जुड़ते चले गए। अरविंद जायसवाल ने अपनी पत्नी बबिता जायसवाल, मां लीलावती जायसवाल और छोटे भाई अंजनी जायसवाल के साथ 'गया' जाने का निर्णय लिया। मंझले भाई अतुल जायसवाल ने भी इस पूजा को सम्पन्न कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
रविवार को मेढ़ा बाजार स्थित अरविंद जायसवाल के आवास पर 'गया' रवाना होने से पूर्व विशेष पूजा-पाठ का आयोजन किया गया। सुबह से ही घर पर रिश्तेदारों और शुभचिंतकों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया। प्रयागराज, ऊंचाहार, रायबरेली, गौरीगंज, सुल्तानपुर सहित जौनपुर जनपद के विभिन्न क्षेत्रों से दर्जनों रिश्तेदार और परिचित मेढ़ा बाजार पहुंचे। घर का वातावरण धार्मिक और भावुक माहौल में बदल गया। सभी ने पूजा-पाठ में शामिल होकर अरविंद जायसवाल के इस संकल्प के प्रति अपनी शुभकामनाएं व्यक्त कीं।
पूजा के दौरान परिवार के सदस्यों ने अपने पितरों और पूर्वजों का स्मरण किया। बुजुर्गों ने परिवार की सुख-समृद्धि और पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की। पूजा समाप्त होने के बाद अरविंद जायसवाल अपनी पत्नी, मां और छोटे भाई के साथ गांव स्थित डीह गोला दैत्य बाबा मंदिर पहुंचे। वहां भी विधि-विधान से पूजा-पाठ कर आशीर्वाद लिया गया। मंदिर परिसर में मौजूद लोगों ने भी उनके इस धार्मिक संकल्प की सराहना की।
इसके बाद जो दृश्य सामने आया, वह मेढ़ा बाजार के लोगों के लिए लंबे समय तक याद रहने वाला बन गया। अरविंद जायसवाल और उनके परिवार के सदस्य पूरे बाजार में स्थित अपने खानदान के लोगों के घर-घर पहुंचे। हर घर में उनका आत्मीयता के साथ स्वागत किया गया। लोगों ने फूल-माला पहनाकर उनका अभिनंदन किया और गया यात्रा के लिए शुभकामनाएं दीं।
इस दौरान अरविंद जायसवाल द्वारा घर-घर जाकर पीली सरसों से अभिसिंचित करने की परंपरा निभाई गई। मेढ़ा बाजार में जायसवाल परिवार के घरों के साथ-साथ अन्य परिवारों के यहां भी वे पहुंचे और पीली सरसों से अभिसिंचित किया। उनके इस भावनात्मक कार्यक्रम में बाजार के लोग भी लगातार साथ चलते रहे। धीरे-धीरे उनके साथ चलने वालों की संख्या बढ़ती गई और देखते ही देखते पूरा बाजार इस विदाई यात्रा का हिस्सा बन गया।
परिवार के छोटे-बड़े, महिलाएं, बुजुर्ग और युवा सभी इस अवसर पर साथ नजर आए। जिन घरों के सामने अरविंद जायसवाल पहुंचे, वहां लोगों ने आत्मीयता से उनका स्वागत किया। कहीं फूल-माला पहनाई गई तो कहीं आशीर्वाद दिया गया। कई लोगों ने उनके इस प्रयास को अपने खानदान और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का उदाहरण बताया। सबसे भावुक क्षण उस समय आया, जब अरविंद जायसवाल अपने परिवार के साथ मेढ़ा बाजार से गांव की सीमा की ओर बढ़े। इसी यात्रा के दौरान मौसम ने भी अपना रंग दिखाया और बारिश शुरू हो गई। बारिश लगातार होती रही, लेकिन श्रद्धा और अपनत्व से भरे लोगों के कदम नहीं रुके। लोग छाता लेकर, तो कई लोग बिना छाते के ही उनके साथ चलते रहे। बारिश भी लोगों के उत्साह और हौसले को डिगा नहीं सकी।
गांव की सीमा तक बड़ी संख्या में बाजारवासी और रिश्तेदार अरविंद जायसवाल को पैदल विदा करने पहुंचे। इस दौरान सड़क पर लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। हर तरफ एक ही चर्चा थी कि अरविंद जायसवाल ने अपने खानदान और पूर्वजों के लिए एक विशेष पहल की है। लोगों का कहना था कि आज की व्यस्त जीवनशैली में जहां लोग अपने जरूरी कामों में ही उलझे रहते हैं, वहीं अरविंद ने अपने पूर्वजों को याद करने और उनके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने के लिए समय निकाला।
बुजुर्गों ने इस अवसर पर कहा कि परिवार केवल वर्तमान पीढ़ी से नहीं बनता, बल्कि उसके पीछे कई पीढ़ियों का संघर्ष, संस्कार और योगदान जुड़ा होता है। पूर्वजों का स्मरण उस विरासत को याद करने का माध्यम है। अरविंद जायसवाल ने अपने कार्य से परिवार की नई पीढ़ी को भी अपनी जड़ों से जुड़ने का संदेश दिया है।
परिवार के लोगों का कहना था कि गया की यह यात्रा उनके लिए केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं है, बल्कि अपने पितरों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और पारिवारिक एकजुटता का प्रतीक है। अरविंद के साथ उनकी मां लीलावती जायसवाल का जाना भी इस यात्रा को और भावनात्मक बना रहा था। पत्नी बबिता जायसवाल, पुत्र अभिषेक जायसवाल, छोटे भाई अतुल जायसवाल, अंजनी जायसवाल, बहनें सीता देवी, रेनू देवी, सुमन देवी, तीनों बहनोई संजय जायसवाल, विष्णु जायसवाल और संतोष जायसवाल भी पूरे कार्यक्रम में उनके साथ रहे।
मेढ़ा बाजार से विदाई के दौरान लोगों के चेहरों पर जहां अपनत्व और खुशी दिखाई दे रही थी, वहीं कई लोगों की आंखें भी नम थीं। लोगों ने अरविंद जायसवाल को फूल-मालाओं से सम्मानित करते हुए यात्रा की सफलता और धार्मिक अनुष्ठान के निर्विघ्न संपन्न होने की कामना की। गांव की सीमा पर पहुंचकर लोगों ने उन्हें अंतिम विदाई दी और जल्द सकुशल लौटने की शुभकामनाएं दीं।
अरविंद जायसवाल की इस पहल ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि आधुनिकता और व्यस्तता के बीच भी परिवार की जड़ों, संस्कारों और पूर्वजों की स्मृतियों को जीवित रखा जा सकता है। मेढ़ा बाजार में रविवार को हुआ यह आयोजन केवल एक परिवार की धार्मिक यात्रा की शुरुआत नहीं रहा, बल्कि रिश्तों, परंपराओं और सामूहिक सहभागिता का ऐसा दृश्य बन गया, जिसमें पूरा बाजार एक परिवार की तरह साथ खड़ा नजर आया।
गया के लिए रवाना हुए अरविंद जायसवाल और उनके परिजनों को विदा करते समय लोगों की जुबान पर एक ही बात थी कि उन्होंने अपने खानदान के लिए एक ऐसा कार्य किया है, जिसे आने वाली पीढ़ियां भी याद रखेंगी। बारिश के बीच गांव की सीमा तक उमड़ा जनसमूह इस बात का गवाह बना कि जब किसी कार्य के पीछे श्रद्धा, परिवार और पूर्वजों के प्रति सम्मान की भावना हो तो उसे समाज का भी भावनात्मक समर्थन मिलता है।
