बिहार में इस समय एक इनकाउंटर चर्चा का विषय बना हुआ है। पुलिस जिसे इनकाउंटर बता रही हैं,जनता उसे हत्या बता रही है।जगह जगह धरने प्रदर्शन हो रहे हैं पुलिस के खिलाफ और सरकार के खिलाफ भी।सोशल मिडिया का कोई ऐसा पटल नहीं है जिस पर सरकार की भर्त्सना न की जा रही हो।युवा वर्ग भरत भूषण के अधूरे कार्य को पूरा कराने की कसम खाते हुए विडियोज पटल पर डाल रहे हैं।तो सरकार लीपापोती व बचाव की मुद्रा में है। इनकाउंटर में शामिल पुलिस वाले सस्पेंड कर दिए गये।न्यायिक जाॅंच बैठा दी गई।मगर क्या फायदा।अब तो भारत भूषण जिन्दा नहीं हो सकता।उसके परिवार ने जो खोया उसे तो अब नहीं मिल सकता न।जिनके सुख दुख में वो मसीहा बनके खड़ा रहा। उन्हें तो वो फिर नहीं मिलेगा न।बड़े बड़े दुर्दांत अपराधी राजसी सुख भोग रहे हैं।सरकारी सुरक्षा प्राप्त किए हुए हैं।उनका तो इनकाउंटर नहीं हुआ न हो रहा है।माना कि उसने हथियार उठाकर गलती की।तो अनंत सिंह आनंद मोहन जैसे लोग जीवित क्यों हैं।वो तो हथियार ही नहीं हथियारबंद अपराधी भी साथ में रखते हैं।उनका इनकाउंटर कब करेंगे।अपराध मुक्त बिहार की बात करती है बिहार सरकार,तो जबतक अनंत सिंह आनंद मोहन जैसे रसूखदार अपराधी बिहार में हैं ,तो बिहार अपराध मुक्त कैसे होगा।क्या भारत भूषण जैसे निर्दोषों को मारकर अपराध मुक्त बिहार बनायेगी सरकार।प्राप्त सूचना के अनुसार भारत भूषण पर एक भी एफ आई आर किसी भी थाने में दर्ज नहीं है।भारत भूषण एक सामाजिक कार्यकर्ता था।जो सरकार का कान खींच रहा था।वह पिस्तौल लेकर पुलिस को या प्रशासन को क्यों ललकारा।आखिर जो बंदा देश पर न्योछावर होने की बात करता था।जिस बंदे को पुलिस अधिकारी खुद सम्मानित कर रहे हैं।जो कोरोना काल में जनता की सेवा कर रहा था। प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर वैक्सीन का ट्रायल अपने ऊपर करवाने की बात करता था,वो सरकार के खिलाफ हथियार क्यों उठाया।यह जानने की कोशिश क्यों नहीं की गई।उसकी बात क्यों नहीं सुनी गई।
जिस तरह का कार्य बिहार में हुआ वो १८५७ की याद ताजा कर गई।मंगल पांडे के विरोध को यदि ब्रिटिश सरकार समझदारी से सुलझा ली होती तो शायद १८५७ में भारत की आजादी का पौधा पनपता ही नहीं।अंग्रेजी हुकूमत इस मुगालते में रही कि यदि हम इसे मार देंगे तो लोग डर के मारे दुबक जायेंगे।मगर हुआ उसके उलट।वहीं से क्रांति की ज्वाला भड़क उठी।एक मंगल पांडे गये तो लाखों मंगल पांडे पैदा हो गये।अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों का परिणाम यह रहा कि उन्हें अपना बोरिया बिस्तर लेकर भागना पड़ा।
प्रशासन जब अंधा बहरा और अहंकारी हो जाता है तो, उसको सुनाने दिखाने के लिए भगत सिंह राजगुरु सुखदेव बिस्मिल अशफाक चंद्रशेखर जैसे लोग कुछ नया करते हैं।वही नया काम इस समय भारत भूषण कर रहा था।बाढ़ पिड़ितो के पुनर्वसन का काम आज तक नहीं हो रहा है।जिसको लेकर भारत भूषण अधिकारियों सांसदों विधायकों आदि के चक्कर लगा लगा कर थक गया। इसीलिए वो मानसिक तनाव में रहने लगा। प्रशासन को जगाने के लिए उसने हथियार का सहारा लिया।उसी तरह जैसे भगत सिंह आदि ने लिया था।बिहार सरकार ने वही व्यवहार किया जो अंग्रेजी सरकार ने उस समय किया था।अंतर सिर्फ इतना है कि भगत सिंह आदि का ट्रायल चला था।भारत भूषण को अपनी बात कहने का मौका तक नहीं दिया।और गोली मार दी गई।बिहार पुलिस ने अपनी पीठ तो एक बार थपथपा ली।मगर फॅंस गई।ऐसे नौजवान की हत्या कर दी जिसका कोई अपराधिक न रिकार्ड था न वो अपराधी था।वो तो समाज का हीरा था।अपना हीरा को खोकर कौन चैन से रह सकता है। हुआ वही,भारत भूषण के आस पास ही नहीं देश के अन्य हिस्सों से भी भारत भूषण को न्याय मिले।इसके लिए आंदोलन आदि होने लगे। बिहार पुलिस के सिपाहियों को बर्खास्त कर उनके ऊपर हत्या का मुकदमा चलाया जाय।ऐसी मांगे उठने लगी।जो आग दबी थी भारत भूषण के मरने से दहक उठी है।यह आग कहीं कहर न बन जाय।अंदेशा ऐसा ही दिख रहा है।कहीं भारत भूषण की शहादत एक नई क्रांति का बीजारोपण न कर दे।और सरकार को अपना बोरिया बिस्तर समेटना पड़ जाय। सावधान।
हम लाये हैं मझधार से कस्ती निकाल के।
इस देश को रखना मेरे बच्चों सम्हाल के।।
यह गीत आजादी के बाद से अब तक प्रासंगिक बना हुआ है।
हम लाए हैं पाताल से तुमको निकाल कर।
रखना तूॅं अपने आपको थोड़ा सम्हाल कर।।
कांग्रेस को मिलाए हैं गर्त में हम सब।
तुमको भी फेंक देंगे एक दिन उठाकर।।
अहंकार किसी का टिकता नहीं।और न जोड़ तोड़।समय हमेशा बराबर नहीं रहता।आज तुम्हारा है कल किसी और का होगा।इसलिए अभिमान अहंकार त्यागो,जिन्दगी बहुत कम होती है।मगर कटती नहीं है।सब कुछ यहीं देकर जाना पड़ेगा।एक और क्रांति न भड़के इसलिए भारत भूषण के सपनों को सरकार पूरा करे।और उसके हत्यारे पुलिस वालों को कठोर से कठोर दंड दिलवाए।जिससे जनाक्रोश कम हो।और भारत भूषण को न्याय मिले।पुलिस वालों की मनमानी पर रोक लगे।और अपनों के खिलाफ अपने न उठ खड़े हों।
पं.जमदग्निपुरी
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