अब एथेनॉल से दौड़ेंगी कारें;क्या घटेगी विदेशी तेल पर निर्भरता और बदलेगी किसानों से लेकर ऑटोमोबाइल जगत तक की तस्वीर? -समग्र व्यापक महा-विश्लेषण
नया सवेरा नेटवर्क
गोंदिया - वैश्विक स्तरपर भारत की ऊर्जा सुरक्षा के इतिहास में 26 अक्टूबर 2026 एक महत्वपूर्ण तारीख़ के रूप में सामने आया है।केंद्र सरकार ने केंद्रीय मोटर वाहन नियम,1989 में संशोधन करके 100 प्रतिशत तक एथेनॉल वाले ई100 ईंधन पर चलने वाले वाहनों के लिए नियामकीय रास्ता साफ कर दिया है।सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की अधिसूचना में ई100 को ई 85 के साथ वाहन उत्सर्जन और परीक्षण संबंधी नियमों में शामिल किया गया है। इसका अर्थ है कि वाहन निर्माता अब निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुसार ई100 और अन्य उच्च एथेनॉल मिश्रणों पर चलने वाले फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों का परीक्षण, प्रमाणन और बाजार में प्रवेश करने की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकते हैं।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र बताना चाहूंगा कि,यह फैसला ऐसे समय आया है,जब पश्चिम एशिया में संघर्ष और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर अनिश्चितताएं भारत सहित अनेक देशों के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं। हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि दुनिया में तेल की भारी किल्लत होना निश्चित है। वास्तविक स्थिति संघर्ष की अवधि, तेल उत्पादक देशों की आपूर्ति, समुद्री परिवहन मार्गों और अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगी। लेकिन एक बात स्पष्ट है,जो देशअपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए एक ही प्रमुख आयातित ईंधन पर निर्भर रहते हैं,वे अंतरराष्ट्रीय संकटों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।इसी चुनौती के बीच एथेनॉल भारत के लिए केवल वैकल्पिक ईंधन नहीं,बल्कि ऊर्जा आत्मनिर्भरता, कृषि आधारित उद्योग और परिवहन क्षेत्र में तकनीकी बदलाव का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।
साथियों बात अगर हम ई 20 से ई 100 तक:आखिर क्या बदल गया? इसको समझने की करें तो,भारत में पेट्रोल के साथ एथेनॉल मिलाने की व्यवस्था पहले से लागू है। ई 20 पेट्रोल में लगभग 20 प्रतिशत एथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल होता है। भारत ने 2025 में पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य निर्धारित समय से पहले हासिल कर लिया था। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की जानकारी के अनुसार,एथेनॉल आपूर्ति वर्ष 2024-25 में औसत मिश्रण क़रीब 19.24 प्रतिशत तक
पहुंच गया था और 2025-26 में 20 प्रतिशत का स्तरहासिल किया गया। अब ई 100 की व्यवस्था इस दिशा में अगला कदम है। ई 100 का अर्थ लगभग शुद्ध एथेनॉल ईंधन है, जबकि ई 85 में लगभग 85 प्रतिशत एथेनॉल और शेष मुख्यतः पेट्रोल होता है। इन ईंधनों के लिए विशेष रूप से तैयार किए गए फ्लेक्स-फ्यूल वाहन अलग- अलग एथेनॉल-पेट्रोल मिश्रणों पर चलने के लिए डिजाइन किए जाते हैं। यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। सरकार की नई अधिसूचना का अर्थ यह नहीं है कि भारत की सभी पेट्रोल कारें अब ई 100 पर चल सकती हैं या पेट्रोल पंपों पर ई 100 हर जगह उपलब्ध हो गया है।फिलहाल यह बदलाव उच्च एथेनॉल मिश्रणों के लिए वाहनों के नियामकीय परीक्षण और प्रमाणन ढांचे को स्पष्ट करता है। ईंधन की व्यापक उपलब्धता और नए वाहनों का व्यावसायिक विस्तार अलगअलग चरणहैं।
साथियों बात अगर हम भारत को एथेनॉल से होने वाले चार सबसे बड़े फायदों को समझने की करें तो पहला फायदा: कच्चे तेल के आयात और विदेशी मुद्रा पर दबाव कम करना-भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। जब पेट्रोल में घरेलू स्तर पर उत्पादित एथेनॉल मिलाया जाता है,तो समान मात्रा में पेट्रोल तैयार करने के लिए आवश्यक जीवाश्म ईंधन की जरूरत घट सकती है। इससे तेल आयात बिल और विदेशी मुद्रा पर दबाव कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि वास्तविक बचत एथेनॉल की मात्रा, उत्पादन लागत और अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों पर निर्भर करेगी।गन्ना, मक्का और निर्धारित मानकों के अनुरूप अतिरिक्त या अनुपयोगी अनाज एथेनॉल उत्पादन के प्रमुख स्रोत हैं। इससे किसानों को कृषि उपज के लिए अतिरिक्त बाजार मिल सकता है।चीनी मिलों, डिस्टिलरी परिवहन और भंडारण उद्योगों में निवेश तथा रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं। लेकिन किसानों को वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब उचित खरीद मूल्य, समय पर भुगतान और टिकाऊ कृषि व्यवस्था सुनिश्चित हो।तीसरा फायदा: प्रदूषण और जीवाश्म कार्बन उत्सर्जन घटाने की संभावना-एथेनॉल में ऑक्सीजन की मौजूदगी दहन को प्रभावित करती है और उपयुक्त इंजन में कुछ प्रदूषकों, विशेषकर कार्बन मोनोऑक्साइड, के उत्सर्जन में कमी संभव है। लेकिन सभी प्रदूषक हर परिस्थिति में समान रूप से नहीं घटते। कुल पर्यावरणीय लाभ का आकलन एथेनॉल के उत्पादन, कृषि, परिवहन और इंजन से निकलने वाले उत्सर्जन को मिलाकर करना चाहिए।चौथा फायदा: ऊर्जा सुरक्षा और वैकल्पिक ईंधन का मजबूत नेटवर्क-यदि पेट्रोल की आपूर्ति या अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बड़ा व्यवधान आता है,तो घरेलू एथेनॉल उत्पादन एक अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध करा सकता है। इससे ऊर्जा के स्रोतों में विविधता आएगी और भारत को केवल आयातित कच्चे तेल पर निर्भर रहने के बजाय घरेलू कृषि तथा जैव-ईंधन उद्योग की क्षमता का उपयोग करने का अवसर मिलेगा। हालांकि, एथेनॉल स्वयं भी कृषि उपज, पानी, बिजली, परिवहन और उत्पादन क्षमता पर निर्भर करता है।इन चारों लाभों का सबसे बड़ा महत्व यह है कि एथेनॉल नीति ऊर्जा, कृषि, उद्योग और पर्यावरण को एक साथ जोड़ती है।भारत सरकार के अनुसार, 2013–14 में पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण लगभग 1.5 प्रतिशत था, जो 2025–26 में 20 प्रतिशत तक पहुंच गया। इस विस्तार के साथ घरेलू उत्पादन क्षमता भी बढ़ी है।
साथियों बात अगर हम क्या ई 100 से पेट्रोल का विकल्प पूरी तरह तैयार हो जाएगा? इसको समझने की करें तोइसका उत्तर है,अभी नहीं, लेकिन भारत ने एकमहत्वपूर्ण कदम आगे बढ़ाया है। ई100 का उपयोग तभी व्यापक स्तर पर संभव होगा,जब पर्याप्त प्रमाणित वाहन, भरोसेमंद ईंधन आपूर्ति,उपयुक्त पेट्रोल पंप, प्रतिस्पर्धी कीमत और उपभोक्ताओं के लिए सुविधा जनक रखरखाव उपलब्ध हों।एथेनॉल की ऊर्जा मात्रा प्रति लीटर पेट्रोल से कम होती है। इसलिए समान दूरी तय करने के लिए ई 100 पर चलने वाले वाहन को सामान्य पेट्रोल कार की तुलना में अधिक ईंधन की जरूरत पड़ सकती है। इसका अर्थ है कि कम कीमत वाला एथेनॉल भी हर परिस्थिति में कम यात्रा-लागत की गारंटी नहीं देता। असली तुलना प्रति किलोमीटर खर्च के आधार पर होनी चाहिए।इसी तरह, ई 100 को केवल सामान्य पेट्रोल में अधिक एथेनॉल मिला देने की प्रक्रिया समझना भी गलत होगा। इसके लिए उपयुक्त ईंधन गुणवत्ता,मानक,भंडारण और वाहन की तकनीकी अनुकूलता सटीकता से आवश्यक है।
साथियों बात अगर हम फ्लेक्स-फ्यूल कारें कैसे काम करेंगी और मौजूदा वाहनों का क्या होगा? इसको समझने की करें तो,फ्लेक्स-फ्यूल वाहन यानी फ्लेक्स- फ्यूल व्हीकल ऐसे वाहन होते हैं, जिनका इंजन और ईंधन तंत्र पेट्रोल तथा अलग-अलग अनुपात वाले एथेनॉल -पेट्रोल मिश्रणों के अनुरूप बनाया जाता है। इनमें विशेष सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक इंजन कंट्रोल यूनिट,अनुकूल ईंधन इंजेक्टर, ईंधन पंप और एथेनॉल के अनुकूल सामग्री का इस्तेमाल किया जा सकता है। सेंसर ईंधन में एथेनॉल का अनुपात पहचानने में मदद करता है और इंजन नियंत्रण प्रणाली उसी के अनुसार दहन को समायोजित करती है।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ई 20 के लिए प्रमाणित सामान्य कार को ई85 या ई100 के लिए स्वतः उपयुक्त नहीं माना जा सकता। ज्यादा एथेनॉल वाले ईंधन का उपयोग तभी करना चाहिए, जब वाहन निर्माता ने उस विशिष्ट मॉडल को उसके लिए प्रमाणित किया हो। अन्यथा ईंधन प्रणाली, सील, पाइप, इंजन के संचालन और टिकाऊपन से संबंधित समस्याएं पैदा हो सकती हैं। मौजूदा वाहन मालिकों को केवल इस सरकारी फैसले के कारण अपनी गाड़ी बदलने या उसमें कोई संशोधन कराने की जरूरत नहीं है।
साथियों बात हम ऑटोमोबाइल कंपनियों के लिए खुला नया बाजार इसको समझने की करें तो,भारत में फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक अब केवल प्रयोगशालाओं और प्रोटोटाइप तक सीमित नहीं है। जून 2026 में मारुति सुजुकी ने वेगोंनं फ्लेक्स फ्यूल पेश की,जो उच्च एथेनॉल मिश्रणों के लिए विकसित की गई है।कंपनी कीजानकारी के अनुसार, यह वाहन ई 20 से ई 100 तक के मिश्रणों के अनुकूल बनाया गया है। हालांकि, इसके वास्तविक उपयोग में संबंधित वाहन का आधिकारिक प्रमाणन और लागू ईंधन मानक महत्वपूर्ण हैं। इस बदलाव से टोयोटा, टाटा मोटर्स और हुंडई जैसी कंपनियों के लिए भी नए उत्पाद विकसित करने का अवसर पैदा होता है। हालांकि प्रत्येक कंपनी के नए मॉडल की लॉन्च तारीख, कीमत और निजी ग्राहकों के लिए उपलब्धता अलग- अलग होगी। सभी कंपनियों के ई 100 मॉडल जल्द लॉन्च होने का दावा करना अभी उचित नहींहै।निर्माताओं को नए इंजन, ईंधन प्रणाली,परीक्षण, उत्सर्जन प्रमाणन और बिक्री के बाद की सेवा पर निवेश करना होगा। शुरुआत में फ्लेक्स-फ्यूल वाहन सामान्य पेट्रोल मॉडलों से महंगे हो सकते हैं, क्योंकि इनके लिए अतिरिक्त तकनीकी बदलाव आवश्यक हैं। बड़े पैमाने पर उत्पादन, बेहतर आपूर्ति श्रृंखला और बढ़ती मांग से लागत में कमी आने की संभावना है।
साथियों बात अगर हम क्या ई100 कारों का रखरखाव महंगा होगा? इसको समझने की करें तो,इसका निश्चित उत्तर किसी एक मॉडल की तकनीकी जानकारी के बिना नहीं दिया जा सकता। एथेनॉल की प्रकृति के कारण ठंडे मौसम में इंजन स्टार्ट करने, ईंधन की गुणवत्ता, नमी,ईंधन प्रणाली की सामग्री और लंबे समय तक वाहन खड़ा रहने जैसी परिस्थितियों पर विशेष ध्यान देना पड़ सकता है। इसी कारण फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों में विशेष इंजेक्टर, पंप, सेंसर और इंजन नियंत्रण प्रणाली की जरूरत हो सकती है।वाहन मालिकों के लिए सबसे व्यावहारिक तरीका होगा कि वे निर्माता के सर्विस शेड्यूल का पालन करें और केवल निर्धारित ईंधन का उपयोग करें। वारंटी की शर्तें, सर्विस सेंटर की उपलब्धता और स्पेयर पार्ट्स की लागत भी वाहन खरीदने से पहले जांचनी चाहिए। एथेनॉल से चलने वाली प्रत्येक कार का रखरखाव महंगा ही होगा,ऐसा कहना भी सही नहीं है; वास्तविक खर्च वाहन की बनावट और उपयोग पर निर्भर करेगा।माइलेज भी एक अहम मुद्दा है।एथेनॉल में प्रति लीटर ऊर्जा पेट्रोल से कम होती है,इसलिए ई100 पर चलने वाले वाहन में प्रति लीटर दूरी कम हो सकती है। इसीलिए ग्राहकों को केवल ईंधन की प्रति लीटर कीमत नहीं, बल्कि प्रति किलोमीटर खर्च, सर्विस लागत और वाहन की शुरुआती कीमत को एक साथ सटीकता से देखना चाहिए।
साथियों बात अगर हम एथेनॉल उत्पादन और उपलब्धता क्या भारत तैयार है? इसको समझने की करें तो भारत ने एथेनॉल उत्पादन में उल्लेखनीय विस्तार किया है सरकारी तथ्यों के अनुसार, 2014 में उत्पादन क्षमता लगभग 421 करोड़ लीटर के स्तर पर थी, जो 2026 तक लगभग 2,000 करोड़ लीटर तक पहुंच गई। यह क्षमता सभी क्षेत्रों में समान रूप से उपलब्ध ईंधन का प्रमाण नहीं है, क्योंकि उत्पादन, अन्य उपयोगों की मांग, परिवहन, भंडारण और वितरण के बीच तालमेल भी जरूरी हैएथेनॉल उत्पादन के प्रमुख स्रोतों में गन्ने का रस, शीरा, मक्का और नीति के तहत अनुमत अनाज शामिल हैं। अलग- अलग कच्चे माल से उत्पादन की लागत और पर्यावरणीय प्रभाव भी अलग हो सकते हैं। यदि ई 100 की मांग तेजी से बढ़ती है, तो डिस्टिलरी क्षमता के साथ-साथ गुणवत्ता नियंत्रण भंडारण टैंक, परिवहन और समर्पित ईंधन डिस्पेंसर की जरूरत भी बढ़ेगी।भारत में ई 85 और ई 100 की उपलब्धता अभी सामान्य ई 20 पेट्रोल जैसी व्यापक नहीं है। जून 2026 में सरकार और उद्योग की ओर से फ्लेक्स-फ्यूल ईंधन वितरण नेटवर्क के विस्तार की योजनाएं सामने आई थीं, जिनमें 2027 के अंत तक 5,000 ईंधन डिस्पेंसर का लक्ष्य भी बताया गया। यह एक लक्ष्य है, उपलब्ध स्टेशनों की वर्तमान सत्यापित संख्या नहीं। इसलिए किसी भी ग्राहक के लिए कार खरीदने से पहले अपने शहर और नियमित यात्रा मार्ग पर संबंधित ईंधन की वास्तविक उपलब्धता जांचना बेहद जरूरी होगा।
साथियों बात अगर हम क्या एथेनॉल पर्यावरण के लिए पूरी तरह प्रदूषण-मुक्त है? इसको समझने की करें तो एथेनॉल जैव-ईंधन है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं किइसके उत्पादन और उपयोग से कोई पर्यावरणीय प्रभाव नहीं पड़ता। वाहन के एग्जॉस्ट से निकलने वाले कुछ प्रदूषक घट सकते हैं,मगर संपूर्ण कार्बन लाभ इस बात पर निर्भर करता है कि फसल कैसे उगाई गई, कितना पानी और उर्वरक इस्तेमाल हुआ, उत्पादन में किस प्रकार की ऊर्जा लगी और ईंधन कितनी दूर पहुंचाया गया।यदिएथेनॉल उत्पादन के लिए कृषि भूमि, पानी और खाद्य फसलों पर अत्यधिक दबाव पड़ता है, तो इसके लाभ सीमित हो सकते हैं। इसलिए भारत के लिए गन्ने और मक्का के साथ कृषि अवशेषों तथा अन्य टिकाऊ जैविक स्रोतों से ईंधनउत्पादन की संभावनाओं पर काम करना महत्वपूर्ण होगा।ऊर्जा नीति की सफलता का पैमाना केवल एथेनॉल का अधिक उत्पादन नहीं, बल्कि कम पर्यावरणीय लागत पर विश्वसनीय ईंधन उपलब्ध कराना होना चाहिए।
-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318
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