एक व्हाट्सएप चैट,स्क्रीनशॉट हत्या का आरोप और सुप्रीम कोर्ट का फैसला! -हत्या के केस में फैसले ने बढ़ाई हलचल

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आखिर क्यों रद्द हुई आरोपी की सजा? -भारतीय साक्ष्य अधिनियम,1872 की धारा 6 की व्याख्या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड धारा 65-बी -डिजिटल सबूतों पर बड़ा सवाल? -समग्र व्यापक महा-विश्लेषण

नया सवेरा नेटवर्क

गोंदिया - वैश्विक स्तरपर डिजिटल क्रांति ने मानव जीवन की कार्यशैली से लेकर अपराधों की जांच और न्यायिक प्रक्रिया तक सब कुछ बदल दिया है।आज मोबाइल फोन,व्हाट्सएप चैट, ई-मेल,सीसीटीवी फुटेज, डिजिटल लोकेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से तैयार सामग्री जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं।लेकिन डिजिटल युग में एक बुनियादी सवाल लगातार गंभीर होता जा रहा है,क्या किसी मोबाइल फोन में मौजूद संदेश को हीकिसी व्यक्ति के अपराधी होने का निर्णायक प्रमाण मान लिया जाए? क़्या किसी संदेश का तकनीकी रूप से भेजा जाना यह भी साबित कर देता है कि उसमें लिखी गई हर बात सच है? मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह बताना चाहूंगा कि इसी महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने नई चर्चा को जन्म दिया है। शुक्रवार दिनांक 23 अक्टूबर 2026 को कुसुमलाल साव बनाम छत्तीसगढ़ राज्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने हत्या के एक मामले में आरोपी की दोषसिद्धि रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि विवादित व्हाट्सएप संदेश,जिनकी प्रामाणिकता और जानकारी के स्रोत की पुष्टि नहीं हुई थी,अपने आप में हत्या का दोष साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं थे।यह निर्णयडिजिटल साक्ष्यों की विश्वसनीयता,गवाहों की भूमिका और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी कड़ी स्थापित करने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।मीडिया में आई जानकारी के अनुसार क्रिमिनल अपील नंबर 4894 ऑफ़ 2026 एसएलपी(क्रल) नंबर 11542 ऑफ़ 2026 से उत्पन्न न्यायालय एवं पीठ भारत का सर्वोच्च न्यायालय न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई निर्णय की तारीख 13 अक्टूबर 2026 न्यूट्रल साइटेशन: 2026 आईं एनंएससी 1148 इसलिए यह कहना अधिक सटीक होगा कि फैसला 13 अक्टूबर 2026 को सुनाया गया और इसकी चर्चा 23 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित समाचारों में भी हुई।बता दें कि यह पूरी जानकारी मीडिया से दी गई है। 

साथियों बात अगर हम हत्या का मामला क्या था?व्हाट्सएप संदेशों ने कैसे खड़ा किया कानूनी सवाल? इसको समझने की करें तो, इस मामले की शुरुआत 9 फरवरी 2019 को हुई,जब सौरभ पांडा नामक व्यक्ति का शव एक खुले मैदान में मिला।शव के पास उसकी मोटरसाइकिल और रस्सी भी थी।पोस्टमार्टम के बाद मामला हत्या का मानकर अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई। पुलिस जांच के दौरान अभियोजन पक्ष ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर कुसुमलाल साव को इस अपराध से जोड़ने का प्रयास किया। जांच में अभियोजन पक्ष के दो गवाहों, जिन्हें न्यायालयीन रिकॉर्ड में पीडब्ल्यू-5 और पीडब्ल्यू-6 कहा गया, के मोबाइल फोन जब्त किए गए। फोरेंसिक जांच में उनके फोन के बीच 7 और 8 फरवरी 2019 की दरमियानी रात एक व्हाट्सएप संदेश मिलने की बात सामने आई। अभियोजन पक्ष के अनुसार, उस संदेश में मृतक और आरोपी के बीच कथित विवाद तथा मारपीट का उल्लेख था। अभियोजन ने इस संवाद को आरोपी की कथित संलिप्तता से जोड़ने के लिए महत्वपूर्ण आधार बनाया।इसके अतिरिक्त, आरोपी के घर से लोहे की रॉड, पेचकस, खून के निशान वाली शर्ट और खून लगी मिट्टी मिलने का दावा किया गया। निचली अदालत ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) और धारा 201 (साक्ष्य मिटाने से संबंधित अपराध) के तहत दोषी ठहराया। हाईकोर्ट ने भी दोषसिद्धि बरकरार रखी।फ़िर इसके बाद आरोपी ने विश्वास से  सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 

साथियों बात अगर हम अदालत ने व्हाट्सएप चैट को पर्याप्त सबूत क्यों नहीं माना? इसको समझनेकी करें तो इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि दोनों गवाहों ने कथित घटना के बारे में अभियोजन पक्ष के दावे का समर्थन नहीं किया। उन्होंने आरोपी और मृतक के बीच उस रात कथित झगड़े को अपनी आंखों से देखने की पुष्टि नहीं की। संदेश भेजने के आरोप से जुड़े गवाह ने यह भी कहा कि उसने ऐसा संदेश भेजा ही नहीं था। सुप्रीम कोर्ट के सामने इसलिए केवल यह सवाल नहीं था कि मोबाइल फोन में संदेश मौजूद था या नहीं, बल्कि यह भी था कि संदेश किसने लिखा, वह किस जानकारी पर आधारित था और क्या उसमें वर्णित घटना वास्तव में हुई थी।न्यायालय ने माना कि पीडब्ल्यू-5 और पीडब्ल्यू-6 के बीच संदेशों का आदान-प्रदान यह साबित नहीं करता कि मृतक उस रात आरोपी के घर मौजूद था अथवा आरोपी ने उस पर हमला किया था। संदेश अधिकतम संदेह पैदा कर सकते थे, लेकिन संदेह और दोष सिद्ध होने के बीच महत्वपूर्ण अंतरहै।आपराधिक न्याय व्यवस्था में दोष सिद्धि के लिए अभियोजन को अपराध संदेह से परे साबित करना होता है। 

साथियों बात अगर हम साक्ष्य अधिनियम की धारा 6: एक ही घटनाक्रम का हिस्सा होना क्यों जरूरी? इसको समझने की करें तो,इस निर्णय का कानूनी महत्व भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 6 की व्याख्या में भी है। यह प्रावधान सामान्यतः उन तथ्यों को प्रासंगिक बनाने से संबंधित है जो किसी विवादित तथ्य या घटना से इतने निकटता से जुड़े हों कि एक ही लेन-देन या घटनाक्रम का हिस्सा माने जा सकें। इसे अक्सर रेस गेस्टएके सिद्धांत के रूप में समझाया जाता है।अदालत ने पाया कि इस मामले में मौत का सही समय ठोस साक्ष्य से निर्धारित नहीं हो पाया था। इसलिए यह स्थापित करना कठिन था कि विवादित संदेश अपराध के समय या उसके आसपास भेजे गए थे और उसी घटनाक्रम का हिस्सा थे।धारा 7 के संदर्भ में भी अदालत ने स्पष्ट किया कि संदेश के तकनीकी रूप से एक फोन से दूसरे फोन तक पहुंचने की बात, उसमें वर्णित घटना की सत्यता को अपने आप साबित नहीं करती। संदेश भेजने वाले की जानकारी का स्रोत और उसके कथन का आधार जानना जरूरी था। यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना चाहिए: किसी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड का अस्तित्व साबित करना और उस रिकॉर्ड में लिखी बात को सच साबित करना दो अलग-अलग प्रश्न हैं। 

साथियों बात अगर हम खून के निशान,बरामदगी और डीएनए जांच पर भी उठे सवाल इसको समझने की करें तो, सुप्रीम कोर्ट ने केवल व्हाट्सएप संदेशों का परीक्षण ही नहीं किया, बल्कि अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की विश्वसनीयता भी जांची। आरोपी के घर से खून लगी मिट्टी और अन्य वस्तुओं की बरामदगी के संबंध में गवाहों के बयानों में विरोधाभास थे। एक जब्ती गवाह के बयान से इस बात पर संदेह पैदा हुआ कि मिट्टी वास्तव में आरोपी के घर से मिली थी या उस खुले मैदान से, जहां शव बरामद हुआ था।इसके अलावा, बरामद खून को मृतक से जोड़ने वाला निर्णायक डीएनए मिलान उपलब्ध नहीं था। अदालत ने यह भी विचार किया कि मेडिकल साक्ष्य के आधार पर मोटरसाइकिल से गिरने जैसी वैकल्पिक संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सका।इन परिस्थितियों में अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ संदेह से परे एक पूरी और विश्वसनीय कड़ी स्थापित करने में असफल रहा।अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालत और हाईकोर्ट के फैसले रद्द कर दिए तथा फ़िर आरोपी को बरी करने का आदेश दिया। 

साथियों बात अगर हम डिजिटल साक्ष्य और आम नागरिक :इस फैसले का क्या प्रभाव पड़ेगा? इसको समझने की करें तो, इस निर्णय का अर्थ यह नहीं है कि व्हाट्सएप चैट, ई-मेल, मोबाइल रिकॉर्ड या अन्य डिजिटल साक्ष्य अदालत में स्वीकार नहीं किए जा सकते। डिजिटल साक्ष्य आज भी महत्वपूर्ण और कई मामलों में निर्णायक हो सकते हैं।लेकिन उनकी प्रामाणिकता संदर्भ, लेखक की पहचान, सामग्री के स्रोत और अन्य साक्ष्यों के साथ उनके संबंध का परीक्षण आवश्यक है।इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की स्वीकार्यता के लिए लागू कानूनी आवश्यकताओं का पालन भी महत्वपूर्ण है। पुराने भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अंतर्गत इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के लिए धारा 65- बी की आवश्यकताएं प्रासंगिक रही हैं। 1 जुलाई 2024 से लागू भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 में इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल रिकॉर्ड से संबंधित प्रावधान मुख्यतः धारा 61 से 63 में हैं। इस मामले की घटना 2019 की थी, इसलिए फैसले में पुराने कानून के प्रावधानों पर विचार किया गया। अलग-अलग मामलों में लागू कानून का निर्धारण उनकी परिस्थितियों और संक्रमण संबंधी नियमों के अनुसार किया जाएगा।

पुलिस और जांच एजेंसियों के लिए संदेशों के स्रोत,डिजिटल रिकॉर्ड की अखंडता,फोरेंसिक परीक्षण और स्वतंत्र साक्ष्यों के बीच संबंध स्थापित करना अहम है। वकीलों के लिए यह निर्णय याद दिलाता है कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड प्रस्तुत कर देना और उसके माध्यम से आरोप साबित कर देना एक ही बात नहीं है। आम नागरिकों के लिए भी संदेश है कि डिजिटल सामग्री का अर्थ और विश्वसनीयता उसके संदर्भ के साथ ही समझी जानी चाहिए। 

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि डिजिटल युग में भी न्याय का आधार ठोस प्रमाण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डीपफेक, बदले जा सकने वाले स्क्रीनशॉट और तेजी से विकसित होती डिजिटल तकनीकों के दौर में अदालतों के सामने साक्ष्यों की सत्यता जांचने की चुनौती और गंभीर होती जा रही है। लेकिन तकनीक के विकास के साथ न्याय के मूल सिद्धांत नहीं बदलते:अभियोजन को अपराध साबित करना होता है, गवाहों की विश्वसनीयता परखनी होती है और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी पूरी करनी होती है।कुसुमलाल साव बनाम छत्तीसगढ़ राज्य का फैसला इसी मूल सिद्धांत कोरेखांकित करता है,डिजिटल संदेश संदेह पैदा कर सकते हैं, लेकिन जब उनकी प्रामाणिकता  लेखक की जानकारी और घटना से उनका संबंध स्थापित नहीं होता, तो वे अकेले दोषसिद्धि का पर्याप्त आधार नहीं बन सकते।यह फैसलाव्हाट्सएप के विरुद्ध नहीं, बल्कि बिना पर्याप्त प्रमाण के किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के विरुद्ध न्यायिक सावधानी का उदाहरण है। डिजिटल युग में न्याय की विश्वसनीयता इसी संतुलन पर निर्भर करती है: तकनीक का पूरा उपयोग हो, लेकिन तकनीकी रिकॉर्ड को सत्य का निर्विवाद पर्याय न मान लिया जाए।


-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

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