सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित नेशनल टास्क फ़ोर्स (एनटीएफ़) सर्वे ने बजाई खतरे की घंटी -छात्र जीवन की चमक के पीछे छिपता मानसिक अंधेरा!

Naya Savera Network

 2.43 लाख से अधिक विद्यार्थियों की आवाज़, हर 11 में लगभग 1 छात्र ने आत्महत्या के विचार आने की बात कही;31 अक्टूबर 2026 तक आएगी अंतिम रिपोर्ट -समग्र व्यापक विश्लेषण

नया सवेरा नेटवर्क

गोंदिया - वैश्विक स्तरपर आज का डिजिटल युग युवा पीढ़ी के सामने अवसरों का अभूतपूर्व संसार खोल रहा है। छोटे गांव की खेती-किसानी, पारंपरिक दुकानदारी या पारिवारिक व्यवसाय से आगे बढ़कर बड़ी शिक्षा, महानगरों की नौकरी,बहुराष्ट्रीय कंपनियों का आकर्षण और विदेशों में करियर बनाना आज करोड़ों युवाओं का सपना बन चुका है।गांव से महानगर और भारत से विदेश तक पहुंचने की यह यात्रा आर्थिक तथा सामाजिक प्रगति का प्रतीक दिखाई देती है,लेकिन इसी चमकदार यात्रा के पीछे एक ऐसा प्रश्न भी खड़ा हो रहा है,जिसे अब नजर अंदाज करना कठिन है,क्या हमारा शिक्षा तंत्र युवाओं को सफल पेशेवर तो बना रहा है,लेकिन मानसिक रूप से सुरक्षित और संतुलित इंसान बनाने में पीछे रह गया है? मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह बताना चाहता हूं कि 30 सितंबर 2026 के आसपास सामने आए सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित नेशनल टास्क फ़ोर्स (एनटी एफ़) ऑन मेन्टल हेल्थ कॉन्सरन्स ऑफ़ स्टूडेंट्स एंड प्रेवेंशन ऑफ़ सुसाइडस इन हायर एजुकेशनल इंस्टिट्यूशन्स के देशव्यापी सर्वेक्षण के प्रारंभिक निष्कर्षों ने इसी प्रश्न को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है।मीडिया में सामने आए इन निष्कर्षों के 

अनुसार 2.43 लाख सेअधिक उच्च शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थियों के जवाब सर्वे में शामिल हुए। इनमें लगभग 9 प्रतिशत विद्यार्थियों ने बताया कि पिछले एक वर्ष में उन्हें अक्सर या बहुत अक्सर आत्महत्या के विचार आए, जबकि लगभग 15 प्रतिशत विद्यार्थियों ने पिछले छह महीनों में कई सप्ताह तक अत्यधिक तनाव,बेचैनी, खराब मनोदशा अथवा चिंता जैसी स्थिति से गुजरने की बात कही। लगभग 34 प्रतिशत विद्यार्थियों ने किसी न किसी स्तर पर अपने परिसर में स्वयं को बाहरी व्यक्ति जैसा महसूस करने की बात भी कही। 

साथियों,यहां सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इसे अभी सुप्रीम कोर्ट की अंतिम रिपोर्ट नहीं कहा जाना चाहिए। 29-30 सितंबर 2026 को सामने आए आंकड़े एनटीएफ़ के सर्वेक्षण के प्रारंभिक/उभरते निष्कर्ष हैं, जिन्हें मीडिया ने रिपोर्ट किया है और जिन्हें अंतिम रिपोर्ट में शामिल किए जाने की उम्मीद है।एनटीएफ़ ने यह भी स्पष्ट किया है कि सर्वे में प्राप्त नमूना देश के संपूर्ण छात्र समुदाय का सांख्यिकीय रूप से प्रतिनिधित्व नहीं करता। इसलिए 9 प्रतिशत के आंकड़े को भारत के प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान के विद्यार्थियों पर सीधे लागू करना उचित नहीं होगा। यही सावधानी इस पूरे विषय को समझने के लिए अत्यंत आवश्यक है। 

साथियों बात अगर हम एनटीएफ़ बनी कैसे और इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी? इसको समझने की करें तो इस पूरी प्रक्रिया की जड़ 24 मार्च 2025 के सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णय में है।अमित कुमार एंड ऑदर्स बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया एंड ऑदर्स मामले में दो सदस्यीय न्यायमूर्ति की पीठ ने उच्च शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थियों की आत्महत्याओं के लगातार सामने आने पर गंभीर चिंता व्यक्त की।मामला आईआईटी दिल्ली सिटी के दो विद्यार्थियों की आत्महत्या से संबंधित था, लेकिन न्यायालय ने इसे केवल एक संस्थान अथवा दो घटनाओं तक सीमित नहीं रखा।न्यायालय ने देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य, भेदभाव शैक्षणिक दबाव और आत्महत्या की रोकथाम के लिए व्यापक व्यवस्था की आवश्यकता को देखते हुए राष्ट्रीय टास्क फोर्स का गठन किया। इस टास्क फोर्स की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति को सौंपी गई।इसमें मनोचिकित्सा नैदानिक मनोविज्ञान, शिक्षा, सामाजिक नीति, दिव्यांगता अधिकार, लैंगिक अध्ययन तथा कानून जैसे विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को शामिल किया गया। उपलब्ध विवरण के अनुसार मूल संरचना में 12 सदस्य तथा 6 पदेन सदस्य थे। 

साथियों बात अगर हम इस टास्क फोर्स का उद्देश्य केवल आत्महत्या के आंकड़े गिनना नहीं है इसको समझने की करें तो सुप्रीम कोर्ट ने एनटीएफ़ को व्यापक दायित्व दिया है।इसका उद्देश्य विद्यार्थियों की आत्महत्या के पीछे मौजूद प्रमुख कारणों की पहचान करना, वर्तमान कानूनों एवं संस्थागत व्यवस्थाओं का परीक्षण करना और भविष्य के लिए प्रभावी रोकथाम एवं सहायता प्रणाली की सिफारिश करना है। इसके दायरे में रैगिंग,जातिगत भेदभाव,लैंगिक भेदभाव, यौन उत्पीड़न,शैक्षणिक दबाव, आर्थिक कठिनाई, मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा कलंक, जातीय अथवा जनजातीय पहचान,दिव्यांगता और अन्य प्रकार के सामाजिक सटीक बहिष्करण जैसे विषय शामिल हैं। इसलिए 9 प्रतिशत का आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं है;इसके पीछे यह बड़ा प्रश्न छिपा है कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले युवाओं को आखिर किस प्रकार का वातावरण मिल रहा है। सर्वेक्षण में लगभग 32 प्रतिशत विद्यार्थियों ने कहा कि उनके संस्थान में परामर्श अर्थात काउंसलिंग की सुविधा उपलब्ध नहीं थी, जबकि लगभग 56 प्रतिशत विद्यार्थियों ने संस्थान के प्रशासन पर गंभीर मामलों को निष्पक्ष ढंग से संभालने के संबंध में विश्वास व्यक्त किया। लगभग 34 प्रतिशत विद्यार्थियों का परिसर में स्वयं को बाहरी व्यक्ति जैसा महसूस करना भी सामाजिक जुड़ाव और संस्थागत वातावरण के महत्व की ओर संकेत करता है। 

साथियों बात अगर हम गांव से महानगर और महानगर से विदेश,सफलता की कीमत कितनी? इसको समझने की करें तो, आज एक सामान्य भारतीय परिवार अपने बच्चे को बेहतर भविष्य देने के लिए अपनी आय का बड़ा हिस्सा उसकी शिक्षा पर खर्च करता है। गांव का विद्यार्थी पहले जिला मुख्यालय पहुंचता है,फिर किसी महानगर में प्रवेश लेता है और अंततः अमेरिका,ब्रिटेन,ऑस्ट्रेलिया, कनाडा,यूरोप अथवा किसी अन्य देश में उच्च शिक्षा और रोजगार का सपना देखता है।इस यात्रा में प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव,महंगी शिक्षा,छात्रावास जीवन, भाषा की समस्या,परिवार से दूरी, आर्थिक चिंता, सामाजिक तुलना, नौकरी का अनिश्चित भविष्य और लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन करने की अपेक्षा जुड़ सकती है।समस्या यह नहीं है कि युवा महानगर अथवा विदेश क्यों जाना चाहता है। समस्या तब पैदा होती है जब सफलता की परिभाषा केवल पैकेज,पद,डिग्री विश्वविद्यालय और सामाजिक प्रतिष्ठा तक सीमित हो जाए तथा विद्यार्थी के मन की स्थिति को सफलता का हिस्सा ही न माना जाए। जिस परिवार में बच्चे की परीक्षा के अंक पूछे जाते हैं, लेकिन यह नहीं पूछा जाता कि तुम भीतर से कैसे हो?, वहां शिक्षा अधूरी रह सकती है। जिस संस्थान में उपस्थिति, परीक्षा, रैंक और प्लेसमेंट का रिकॉर्ड रखा जाता है, लेकिन विद्यार्थी के अकेलेपन,भय और निराशा की नियमित पहचान नहीं होती, वहां मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था को और मजबूत करने की आवश्यकता दिखाई देती है। 

साथियों बात अगर हम सर्वे का आकार बड़ा है, लेकिन प्रतिनिधित्व की सीमा समझना जरूरी, इसको समझने की करें तो 2.43 लाख से अधिक विद्यार्थियों की प्रतिक्रियाएं निश्चित रूप से व्यापक स्तर का डेटा प्रदान करती हैं। इसके साथ ही लगभग 2,119 उच्च शिक्षण संस्थानों ने संस्थागत सर्वे में प्रतिक्रिया दी थी; यह उस समय देश में मौजूद कुल उच्च शिक्षण संस्थानों का लगभग 3.5 प्रतिशत बताया गया था। एनटीएफ़ ने विद्यार्थियों के अलावा संस्थानों, शिक्षकों, अभिभावकों और अन्य हितधारकों से भी जानकारी जुटाई तथा संस्थागत स्तर पर क्षेत्रीय दौरे और परामर्श किए।लेकिन यहीं वैज्ञानिक सावधानी जरूरी है।2.43 लाख उत्तरदाता होना अपने आप में यह सिद्ध नहीं करता कि 9 प्रतिशत पूरे भारत के सभी विद्यार्थियों का सटीक राष्ट्रीय अनुपात है।यदि सर्वेक्षण में भागीदारी स्वैच्छिक रही हो और संस्थानों तथा विद्यार्थियों का चयन पूर्णतः सांख्यिकीय राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व के अनुरूप न हो, तो निष्कर्षों में चयन संबंधी सीमाएं हो सकती हैं। इसलिए वर्तमान आंकड़े को चेतावनी और नीति-निर्माण के लिए महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखना सटीकता से अधिक उचित है। 

साथियों बात अगर हम अंतिम राष्ट्रीय प्रेवालेंस रेट के रूप में नहीं,31 अक्टूबर 2026 क्यों महत्वपूर्ण है? इसको समझने की करें तो, सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 को एनटीएफ़ को अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए 31 अक्टूबर 2026 तक का समय प्रदान किया था। उसी आदेश के तहत अंतरिम रिपोर्ट को एनटीएफ़ के आधिकारिक पोर्टल पर प्रकाशित करने की अनुमति भी दी गई। इसलिए 31 अक्टूबर की समयसीमा महत्वपूर्ण है, क्योंकि उस समय तक देश को केवल सर्वे के आंकड़े ही नहीं, बल्कि उनके आधार पर एनटीएफ़ की अंतिम सिफारिशों की अधिक स्पष्ट तस्वीर मिलने की उम्मीद है।वास्तविक सुधार का प्रश्न यहीं से शुरू होगा। यदि किसी विद्यार्थी में संकट के संकेत दिखाई देते हैं तो संस्थान के पास प्रशिक्षित कॉउंसलिंर,मनोवैज्ञानिक सहायता, गोपनीय सहायता व्यवस्था,शिक्षक-मार्गदर्शक, परिवार से समन्वय और आपातकालीन प्रतिक्रिया की स्पष्ट प्रणाली होनी चाहिए। मानसिक स्वास्थ्य को केवल आत्महत्या होने के बाद की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि प्रवेश से लेकर परीक्षा, छात्रावास, रोजगार और स्नातक होने तक विद्यार्थी की संपूर्ण यात्रा का हिस्सा बनाया जाना आवश्यक है। 

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि डिग्री के साथ मानसिक सुरक्षा भी जरूरी है,भारत आज ज्ञान, प्रौद्योगिकी नवाचार और वैश्विक रोजगार के क्षेत्र में नई पीढ़ी के माध्यम से आगे बढ़ रहा है। गांव का युवा महानगर और महानगर का युवा दुनिया तक पहुंच रहा हैयह भारत की आकांक्षाओं की शक्ति है।लेकिन किसी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति केवल इस बात से नहीं मापी जा सकती कि उसके कितने युवा विदेशों में पढ़ रहे हैं, कितने करोड़ रुपये का पैकेज प्राप्त कर रहे हैं या कितनी बड़ी कंपनियों में नौकरी कर रहे हैं। प्रगति का एक मानक यह भी होना चाहिए कि उन युवाओं का मन कितना सुरक्षित, सम्मानित, सुना और समर्थित है।सुप्रीम कोर्ट की एनटीएफ़ के प्रारंभिक सर्वेक्षण में सामने आए 2.43 लाख से अधिक विद्यार्थियों के अनुभव और लगभग 9 प्रतिशत का आत्महत्या-विचार संबंधी उत्तर देश के लिए अंतिम निष्कर्ष नहीं, लेकिन निश्चित रूप से एक गंभीर चेतावनी हैं। लगभग 15 प्रतिशत का लंबे समय तक तनाव या चिंता का अनुभव और 34 प्रतिशत का स्वयं को परिसर में बाहरी व्यक्ति महसूस करना यह संकेत देता है कि शिक्षा व्यवस्था को केवल प्रतियोगिता में आगे निकलने की संस्कृति से आगे बढ़कर मानवीय रूप से सुरक्षित और सहयोगी वातावरण की संस्कृति विकसित करनी होगी।अंततः प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि हमारे बच्चे कितनी ऊंचाई तक पहुंच गए? बल्कि यह भी होना चाहिए कि उस ऊंचाई तक पहुंचते समय वे भीतर से कितने सुरक्षित और स्वस्थ रहे? क्योंकि राष्ट्र का भविष्य केवल विश्वविद्यालयों की इमारतों,प्रयोगशालाओं और डिजिटल तकनीक में नहीं, बल्कि उन युवा मनों में बसता है जो इन संस्थानों से निकलकर भारत और विश्व का भविष्य निर्मित करेंगे।


-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

हमारे चैनल को फॉलो करें और हर खबर से अपडेट रहें। 

नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें और Join करें Naya Savera Network का WhatsApp Channel 


OPD Start : अशोक हॉस्पिटल महरुपुर वाराणसी-जौनपुर रोड जफराबाद जौनपुर | Emergency Contact : 7565955001, 7575955002
विज्ञापन



Gahna Kothi Jaunpur | गहना कोठी जौनपुर
विज्ञापन


#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!