गोंदिया -वैश्विक स्तरपर भारत में प्याज केवल एक सब्जी नहीं,बल्कि अर्थव्यवस्था, राजनीति, कृषि और आम नागरिक की रसोई से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील विषय है। देश में कई बार प्याज की कीमतों ने सरकारों की नीतियों को प्रभावित किया है और चुनावी राजनीति तक में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।इसलिए जब 4 जुलाई 2026 से केंद्र सरकार ने बफर स्टॉक के लिए प्याज की सरकारी खरीद कीमत में लगभग 13.3 प्रतिशत की वृद्धि करते हुए 1,875 रूपए प्रति क्विंटल से बढ़ाकर 2,125 रूपए प्रति क्विंटल करने का निर्णय लिया जो आज 4 जुलाई 2026 से लागू हो चुका है,तो इसे केवल मूल्य वृद्धि के रूप में नहीं बल्कि किसानों,उपभोक्ताओं और कृषि बाजार के बीच संतुलन स्थापित करने वाले एक महत्वपूर्ण आर्थिक निर्णय के रूप में देखा गया। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि यह निर्णय स्पष्ट संकेत देता है कि सरकार उत्पादन बढ़ाने,किसानों को न्यूनतम लाभकारी मूल्य दिलाने तथाभविष्य में मूल्य स्थिरता सुनिश्चित करने की दिशा में सक्रिय कदम उठा रही है।भारत विश्व के सबसे बड़े प्याज उत्पादक देशों में शामिल है। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात और राजस्थान जैसे राज्य देश के अधिकांश प्याज उत्पादन में योगदान देते हैं। इनमें भी महाराष्ट्र का नासिक क्षेत्र एशिया के सबसे बड़े प्याज उत्पादन क्षेत्रों में गिना जाता है। विडंबना यह है कि भरपूर उत्पादन होने के बावजूद किसान कई बार लागत से भी कम कीमत पर प्याज बेचने को मजबूर हो जाते हैं। दूसरी ओर, जब उत्पादन कम होता है या आपूर्ति बाधित होती है, तो यही प्याज आम उपभोक्ता की पहुंच से बाहर हो जाता है इसलिए ही कई बार जुमला आता है कि प्याज ने आंसू निकल कर रुला दिया, यही असंतुलन वर्षों से भारतीय कृषि बाजार की सबसे बड़ी चुनौती रहा है।
साथियों, सरकार द्वारा खरीद मूल्य को 250 रूपए प्रति क्विंटल बढ़ाने का सबसे बड़ा लाभ उन किसानों को मिलेगा जो अपनी उपज सरकारी बफर स्टॉक योजना के अंतर्गत बेचते हैं। यदि कोई किसान 500 क्विंटल प्याज बेचता है, तो उसे पहले की तुलना में लगभग 1.25 लाख रूपए अतिरिक्त आय प्राप्त होगी। छोटे और मध्यम किसानों के लिए यह अतिरिक्त आय खेती की लागत निकालने,अगली फसल की तैयारी करने तथा परिवार की आर्थिक सुरक्षा मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इससे किसानों का सरकारी खरीद प्रणाली पर विश्वास भी बढ़ेगा।हालांकि केवल खरीद मूल्य बढ़ा देना किसानों की सभी समस्याओं का समाधान नहीं है।भारतीय किसान की सबसे बड़ी चुनौती उत्पादन लागत में लगातार वृद्धि है।बीज, उर्वरक, कीटनाशक, सिंचाई, बिजली, डीजल, मजदूरी और परिवहन का खर्च लगातार बढ़ रहा है। यदि उत्पादन लागत भी उसी अनुपात में बढ़ती रहे और विपणन व्यवस्था कमजोर बनी रहे, तो केवल 13 प्रतिशत मूल्य वृद्धि सीमित राहत ही दे पाएगी इसलिए आवश्यक है किसरकार लागत कम करने वालीतकनीकों आधुनिक कृषि यंत्रों तथा वैज्ञानिक खेती को भी समान प्राथमिकता दे।
साथियों, इस निर्णय का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू सरकारी बफर स्टॉक है। जब सरकार अच्छी कीमत पर किसानों से प्याज खरीदती है, तब वह उसे सुरक्षित भंडारण में रखती है। भविष्य में यदि किसी कारण से बाजार मेंप्याज की कमी हो जाती है या कीमतें अचानक बढ़ जाती हैं, तो यही बफर स्टॉक बाजार में उतारकर कीमतों को नियंत्रित किया जा सकता है।इस प्रकार सरकार किसानों को उचित मूल्य भी देती है और उपभोक्ताओं को अत्यधिक महंगाई से भी बचाती है। यही किसी भी सफल कृषि मूल्य नीति की सबसे बड़ी विशेषता होती है।
साथियों, उपभोक्ताओं के दृष्टिकोण से देखें तो इस निर्णय का अर्थ यह नहीं है कि 4 जुलाई से ही बाजार में प्याज 13 प्रतिशत महंगा हो जाएगा। सरकारी खरीद मूल्य और खुदरा बाजार मूल्य अलग-अलग कारकों पर निर्भर करते हैं।यदि उत्पादन पर्याप्त रहेगा और सरकार समय पर बफर स्टॉक जारी करती रहेगी,तो खुदरा कीमतों में अनावश्यक वृद्धि की संभावना कम होगी। अर्थात अल्पकाल में किसानों को राहत और दीर्घकाल में उपभोक्ताओं को स्थिर कीमत, दोनों उद्देश्यों को एक साथ साधने का प्रयास इस निर्णय में दिखाई देता है।हम देखते हैं कि, भारत में प्याज की सबसे बड़ी समस्या उत्पादन नहीं बल्कि भंडारण और आपूर्ति श्रृंखला है। अनुमान है कि हर वर्ष बड़ी मात्रा में प्याज उचित वैज्ञानिक भंडारण के अभाव में खराब हो जाती है।यदि आधुनिक कोल्डस्टोरेज वेंटिलेटेड गोदाम और वैज्ञानिक भंडारण प्रणाली का व्यापक विकास हो जाए तो किसानों को मजबूरी में सस्ते दाम पर बिक्री नहीं करनी पड़ेगी और उपभोक्ताओं को भी पूरे वर्ष संतुलित कीमत पर प्याज उपलब्ध हो सकेगा। इसलिए मूल्य वृद्धि के साथ-साथ भंडारण अवसंरचना में निवेश अनिवार्य है।
साथियों, कृषि अर्थशास्त्रियों का मानना है कि किसानों की आय दोगुनी करने या स्थायी रूप से बढ़ाने का सबसे प्रभावी तरीका केवल समर्थन मूल्य नहीं बल्कि मूल्य संवर्धन (वैल्यू एडिशन) और सप्लाई चेन का आधुनिकीकरण है।प्याज से निर्जलित (डिह्यद्रटेड )प्याज प्याज पाउडर, प्याज पेस्ट और निर्यात योग्य प्रसंस्कृत उत्पाद तैयार कर किसानों को कहीं अधिक लाभ दिलाया जा सकता है। भारत यदि कृषि प्रसंस्करण पर अधिक निवेश करे तो किसानों की आय में सटीक रूप से उल्लेखनीय वृद्धि संभव है।
साथियों, अंतरराष्ट्रीय बाजार भी इस निर्णय से जुड़ा हुआ है। भारत विश्व के प्रमुख प्याज निर्यातकों में शामिल है। कई देशों की खाद्य सुरक्षा भारतीय प्याज पर निर्भर रहती है। लेकिन घरेलू कीमतें बढ़ने पर भारत कई बार निर्यात पर प्रतिबंध या शुल्क लगा देता है, जिससे वैश्विक बाजार प्रभावित होता है। यदि देश में पर्याप्त बफर स्टॉक और संतुलित उत्पादन रहेगा तो भविष्य में निर्यात नीति अधिक स्थिर बनाई जा सकेगी। इससे विदेशी मुद्रा अर्जन बढ़ेगा और भारतीय किसानों को अंतरराष्ट्रीय बाजार का सटीकता से बेहतर लाभ मिलेगा।
साथियों जलवायु परिवर्तन भी प्याज उत्पादन के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। अनियमित वर्षा, ओलावृष्टि, अत्यधिक तापमान तथा सूखे जैसी घटनाएं उत्पादन को प्रभावित करती हैं। ऐसे समय में यदि किसानों को न्यूनतम लाभकारी मूल्य की गारंटी मिले तो उनका जोखिम कम होता है। इसलिए यह निर्णय केवल आर्थिक नहीं बल्कि जलवायु जोखिम प्रबंधन की दिशा में भी एक सकारात्मक कदम माना जा सकता है।इस नीति का सामाजिक प्रभाव भी महत्वपूर्ण है। जब किसान को उचित मूल्य मिलता है तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होती है। उसकी क्रय शक्ति बढ़ती है, स्थानीय बाजारों में व्यापार बढ़ता है, रोजगार के अवसर बढ़ते हैं और ग्रामीण विकास को गति मिलती है। दूसरी ओर यदि किसान लगातार घाटे में रहेगा तो कृषि छोड़ने की प्रवृत्ति बढ़ेगी, जिसका असर देश की खाद्य सुरक्षा पर पड़ेगा। इसलिए किसानों को लाभकारी मूल्य देना केवल कृषि का प्रश्न नहीं बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक स्थिरता का विषय भी है।
साथियों, हालांकि विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि सरकार को मूल्य वृद्धि के साथ पारदर्शी खरीद व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी। यदि खरीद केंद्र पर्याप्त नहीं होंगे या भुगतान समय पर नहीं होगा तो किसान इस योजना का पूरा लाभ नहीं उठा पाएंगे। डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन पंजीकरण, पारदर्शी गुणवत्ता परीक्षण तथा समयबद्ध खरीद व्यवस्था इस नीति की सफलता के लिए आवश्यक हैं।भविष्य की कृषि नीति में केवल समर्थन मूल्य पर निर्भर रहने के बजाय किसानों को बाजार से जोड़ने की रणनीति भी महत्वपूर्ण होगी।किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ ), ई-नाम (ई-नाम ), कृषि निर्यात केंद्र, प्रसंस्करण उद्योग और अनुबंध खेती जैसी व्यवस्थाओं का संतुलित विस्तार किसानों को बेहतर मूल्य दिला सकता है। यदि इन सभी सुधारों को सरकारी खरीद नीति के साथ जोड़ा जाए तो कृषि क्षेत्र में सटीकता से व्यापक परिवर्तन संभव है।
साथियों, भारत को आज ऐसी कृषि नीति की आवश्यकता है जो किसान, उपभोक्ता और बाजार तीनों के हितों का संतुलन बनाए। किसान को उचित मूल्य मिले, उपभोक्ता को उचित दर पर खाद्य सामग्री उपलब्ध हो और सरकार को बार-बार आपातकालीन हस्तक्षेप न करना पड़े। प्याज की सरकारी खरीद मूल्य में 13 प्रतिशत वृद्धि इसी संतुलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम प्रतीत होती है, लेकिन इसकी वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे कितनी पारदर्शिता, दक्षता और दूरदर्शिता के साथ लागू किया जाता है।
अतः अगर उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि कहा जा सकता है कि 2,125 रूपए प्रति क्विंटल की नई सरकारी खरीदकीमत केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि भारतीय कृषि व्यवस्था में संतुलन स्थापित करने का प्रयास है। यदि इसके साथ वैज्ञानिक भंडारण,आधुनिक कृषि तकनीक, बेहतर विपणन, स्थिर निर्यात नीति, प्रसंस्करण उद्योग और किसानों के लिए आसान बाजार व्यवस्था को भी समान गति से विकसित किया जाए, तो यह निर्णय भारत की कृषि अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकता है। तभी किसान समृद्ध होंगे, उपभोक्ता सुरक्षित रहेंगे और भारत की खाद्य मूल्य स्थिरता विश्व के लिए एक सफल मॉडल बन सकेगी। यही विकसित भारत की कृषि नीति का वास्तविक आधार भी होना चाहिए।
-संकलनकर्ता लेखक - क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

