विश्व शांति की रक्षा,आर्थिक स्थिरता की सुरक्षा और मानवता के हित में युद्ध नहीं बल्कि कूटनीति ही सबसे प्रभावी मार्ग सिद्ध हो सकती है -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
नया सवेरा नेटवर्क
गोंदिया - वैश्विक स्तरपर मध्य पूर्व एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है जहां किसी भी छोटी चिंगारी से व्यापक क्षेत्रीय युद्ध की आग भड़क सकती है। अप्रैल 2026 से लागू अस्थायी संघर्ष विराम (सीजफायर) के बावजूद ईरान और इजराइल के बीच तनाव लगातार बना हुआ था,किंतु 8 जून 2026 को दोनों देशों के बीचप्रत्यक्ष मिसाइल और हवाई हमलों ने यह संकेत दे दिया कि संघर्ष विराम गंभीर संकट में पड़ गया है।विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार ईरान ने इजराइल के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हुए बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं, जबकि इजराइल ने जवाबी कार्रवाई में ईरान के कई सैन्य और रणनीतिक ठिकानों पर हवाई हमले किए। इससे पूरे मध्य पूर्व में अस्थिरता बढ़ गई है और दुनिया को एक बार फिर बड़े युद्ध की आशंका सताने लगी है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि यह संघर्ष केवल दो देशों के बीच सैन्य टकराव भर नहीं है,बल्कि इसके पीछे भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा,क्षेत्रीय प्रभाव की लड़ाई,सुरक्षा चिंताएं,परमाणु कार्यक्रमों को लेकर अविश्वास और अनेक प्रॉक्सी संगठनों की भूमिका भी जुड़ी हुई है।पिछले कुछ वर्षों में ईरान और इजराइल के बीच प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष संघर्ष लगातार बढ़ते रहे हैं। लेबनान में हिजबुल्लाह, यमन में हूती विद्रोही, सीरिया और इराक में विभिन्न सशस्त्र गुट तथा क्षेत्रीय शक्ति संतुलन की राजनीति ने इस पूरे संकट को और अधिक जटिल बना दिया है।
साथियों, मीडिया में अनुसार 8 जून 2026 को सामने आई घटनाओं के अनुसार ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने इजराइल के नेवातिम और तेल नोफ एयरबेस को लक्ष्य बनाकर मिसाइल हमले किए। ईरान का दावा है कि यह कार्रवाई लेबनान की राजधानी बेरूत पर इजराइली हमलों के जवाब में की गई। दूसरी ओर इजराइली सेना ने ईरान के पश्चिमी और मध्य भागों में स्थित रडार केंद्रों, सैन्य प्रतिष्ठानों तथा अन्य रणनीतिक ठिकानों पर व्यापक हवाई हमले किए। इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि संघर्ष विराम की व्याख्या दोनों पक्ष अलग-अलग तरीके से कर रहे थे। ईरान का आरोप है कि लेबनान पर इजराइली हमले सीजफायर की भावना के विरुद्ध थे,जबकि इजराइल का तर्क है कि उसकी सैन्य कार्रवाई उसकी सुरक्षा आवश्यकताओं के अनुरूप थी। इसी मतभेद ने अंततः स्थिति को फिर से युद्ध की दिशा में धकेल दिया। सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह संकट अब केवल ईरान और इजराइल तक सीमित नहीं रहा। यमन के हूती विद्रोहियों ने भी इजराइल पर मिसाइल हमले किए हैं तथा लाल सागर में इजराइली समुद्री गतिविधियों को बाधित करने की चेतावनी दी है। यदि लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग प्रभावित होते हैं, तो वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
साथियों अमेरिका इस पूरे संकट में अत्यंत चिंतित दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने सार्वजनिक रूप से दोनों पक्षों से संयम बरतने और तत्काल संघर्ष विराम की दिशा में आगे बढ़ने की अपील की है। रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने इजराइली प्रधानमंत्री से बातचीत कर आगे सैन्य कार्रवाई को सीमित रखने का आग्रह किया। अमेरिकी प्रशासन की सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि यह संघर्ष पूर्ण क्षेत्रीय युद्ध में बदलता है तो अमेरिका स्वयं भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इसमें उलझ सकता है। वास्तव में यह संकट ऐसे समय में उभरा है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले से ही अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है। रूस-यूक्रेन संघर्ष, व्यापारिक तनाव, मुद्रास्फीति, आपूर्ति श्रृंखला की समस्याएं और ऊर्जा बाजार की अनिश्चितता ने पहले ही विश्व अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया हुआ है।ऐसे में मध्य पूर्व में बड़े युद्ध की संभावना निवेशकों, व्यापारिक संस्थानों और सरकारों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गई है।
साथियों, तेल बाजार इस तनाव का सबसे पहला और सबसे संवेदनशील शिकार बनता दिखाई दे रहा है। मध्य पूर्व विश्व के सबसे बड़े तेल उत्पादक क्षेत्रों में से एक है। ईरान, सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात और कतर जैसे देशों की ऊर्जा आपूर्ति वैश्विक बाजार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। संघर्ष बढ़ने की खबरों के साथ ही अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में उछाल देखने को मिला। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संघर्ष लंबा खिंचता है या समुद्री मार्ग प्रभावित होते हैं तो तेल की कीमतें और अधिक बढ़ सकती हैं।तेल की कीमतों में वृद्धि का सीधा प्रभाव दुनिया के लगभग हर देश पर पड़ता है। परिवहन लागत बढ़ती है, उत्पादन महंगा होता है, महंगाई बढ़ती है और आर्थिक विकास की गति धीमी पड़ सकती है। विकासशील देशों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण होती है क्योंकि वे ऊर्जाआयात पर अधिक निर्भर रहते हैं।भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों के लिए भी यह स्थिति चिंता का विषय है।
साथियों,भारत की दृष्टि से यह संकट कई कारणों से महत्वपूर्ण है। एक ओर भारत के ईरान, इजराइल और खाड़ी देशों के साथ मजबूत आर्थिक एवं रणनीतिक संबंध हैं, वहीं दूसरी ओर लाखों भारतीय नागरिक मध्य पूर्व में कार्यरत हैं। यदि क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ती है तो भारतीय नागरिकों की सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और व्यापारिक हित प्रभावित हो सकते हैं। इसी संदर्भ में भारत सरकार द्वारा यात्रा संबंधी सलाह जारी करना स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संघर्ष इसी प्रकार बढ़ता रहा तो सीरिया, इराक, लेबनान और यमन जैसे देश भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इसकी चपेट में आ सकते हैं। ऐसी स्थिति में पूरा पश्चिम एशिया अस्थिरता के दौर में प्रवेश कर सकता है। इससे न केवल सैन्य संघर्ष बढ़ेगा बल्कि मानवीय संकट भी गहरा सकता है। लाखों लोगों के विस्थापन, शरणार्थी संकट और बुनियादी ढांचे की तबाही जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।
साथियों, इतिहास गवाह है कि युद्ध का सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिकों को उठाना पड़ता है। मिसाइलें और बम केवल सैन्य ठिकानों को ही नहीं, बल्कि शहरों, अस्पतालों, स्कूलों और नागरिक जीवन को भी प्रभावित करते हैं। ईरान और इजराइल दोनों ही उच्च तकनीक वाले हथियारों से लैस हैं। इसलिए यदि युद्ध व्यापक रूप लेता है तो इसका मानवीय नुकसान अत्यंत गंभीर हो सकता है।संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय देशों, एशियाई शक्तियों तथा अंतरराष्ट्रीय संगठनों के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे दोनों पक्षों को संवाद की मेज पर वापस लाएं। कूटनीति, मध्यस्थता और विश्वास निर्माण के उपाय ही इस संकट का स्थायी समाधान प्रदान कर सकते हैं। केवल सैन्य शक्ति के माध्यम से ऐसी जटिल समस्याओं का समाधान संभव नहीं है।
साथियों, विश्व राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में यह भी स्पष्ट है कि कोई भी बड़ा क्षेत्रीय युद्ध अब केवल क्षेत्रीय नहीं रह जाता। वैश्विक वित्तीय बाजार, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य आपूर्ति, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय निवेश सीधे प्रभावित होते हैं। इसलिए ईरान और इजराइल के बीच जारी तनाव केवल मध्य पूर्व का मुद्दा नहीं बल्कि वैश्विक चिंता का विषय बन चुका है।वर्तमान परिस्थितियों में सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता तत्काल और प्रभावी संघर्ष विराम की है। दोनों देशों को यह समझना होगा कि सैन्य टकराव की निरंतरता किसी पक्ष को स्थायी विजय नहीं दे सकती, लेकिन पूरे क्षेत्र को अस्थिर अवश्य कर सकती है। अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र और अन्य प्रभावशाली देशों को मिलकर एक ऐसा ढांचा तैयार करना होगा जो न केवल युद्ध रोक सके बल्कि भविष्य में ऐसे संघर्षों को दोबारा भड़कने से भी रोक सके।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि 8 जून 2026 की घटनाओं ने यह संकेत दे दिया है कि मध्य पूर्व की शांति अभी भी अत्यंत नाजुक स्थिति में है।ईरान और इजराइल के बीच बढ़ता सैन्य टकराव विश्व शांति, वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और मानवीय स्थिरता के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। तेल कीमतों में उछाल, व्यापारिक अनिश्चितता, क्षेत्रीय अस्थिरता और महायुद्ध की आशंकाएं इस संकट को और अधिक संवेदनशील बना रही हैं। इसलिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्राथमिकता यही होनी चाहिए कि दोनों देशों को संयम, संवाद और स्थायी शांति की दिशा में प्रेरित किया जाए। विश्व शांति की रक्षा, आर्थिक स्थिरता की सुरक्षा और मानवता के हित में युद्ध नहीं बल्कि कूटनीति ही सबसे प्रभावी मार्ग सिद्ध हो सकती है।
-संकलनकर्ता लेखक - क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425


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