Article: भारत में 50 वर्ष पूर्व स्वर्गीय इंदिरा गांधी ने लगवाई थी इमरजेंसी!

Naya Savera Network

मुलायम सिंह यादव के  उपकार से अधिकांश भाजपाई लोकतंत्र सेनानी पा रहे हैं सरकारी पेंशन

निर्भय सक्सेना

देश मे आज से 50 वर्ष पूर्व 25 जून 1975 को आपातकाल (इमरजेंसी) लगाया गया था। पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव के उपकार से ही उत्तर प्रदेश में अधिकांश भाजपाई लोकतंत्र सेनानी आज भी  सरकारी लोकतंत्र सेनानी वाली पेंशन ले रहे हैं। उस समय वर्ष 1975 मैं दैनिक विश्व मानव  के संपादकीय विभाग में था। देश में 25 जून 1975 की मध्य रात्रि में इमरजेंसी की घोषणा होते ही दिल्ली के पंजाब केसरी, इंडियन एक्सप्रेस सहित कई दैनिक समाचार पत्रों ने संपादकीय वाला स्थान खाली छोड़कर अपना विरोध जताया था। जिस पर कुछ संपादकों की  गिरफ्तारी भी हुई थी। देश में इमरजेंसी को लोकतंत्र पर काला धब्बा कहा गया था। बरेली में पटेल चौक स्थित चाय घाट फाइव स्टार पर कवि स्वर्गीय कन्हैया लाल बाजपेई की कविता "बरुआ भैया कुछ तो जुगत बतावो जा राज नारायण को मीसा में अंदर करवावो" खूब चर्चित हुई। कुछ राजनैतिक लोग अपनी गिरफ्तारी से भूमिगत हो गये थे l कुछ डरे हुए भी थे। अब यह बात अलग है कि देश में इमरजेंसी हटने के बाद उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने उस काल में बंदी लोगो को लोकतंत्र सेनानी घोषित कर उनकी पेंशन भी बांध दी थी। मुलायम सिंह यादव के  उपकार से उत्तर प्रदेश में अधिकांश भाजपाई लोकतंत्र सेनानी वाली सरकारी पेंशन ले रहे हैं।

बरेली में उस समय दैनिक विश्व मानव का प्रबंधन स्वर्गीय लक्ष्मण दयाल सिंघल के हाथ मे था जो कांग्रेस के पक्षधर भी थे। मुझे याद है कि दैनिक विश्व मानव के समाचार संपादक स्वर्गीय जितेंद्र भारद्वाज एवम अब स्वर्गीय राम गोपाल शर्मा  ने संपादकीय के सभी लोगो से देश में लगी इमरजेंसी वाले काल में सरकार के विरोध में कुछ नही लिखने के निर्देश दिए थे। संपादकीय टीम को स्वर्गीय ज्ञानसागर वर्मा,  कन्हैया लाल बाजपेई  देखते थे। सिटी न्यूज़ को स्वतंत्र सक्सेना, राकेश कोहरवाल, निर्भय सक्सेना, कमल शर्मा, सतीश कमल आदि देखते थे। रात में इंटेलिजेंस के अधिकारी हर खबर पर पास या रद्द होने की मोहर लगाते थे। तत्कालीन  जिला सूचना अधिकारी स्वर्गीय वसंत वर्मा भी रात में शहर की न्यूज़ पर नजर रखते थे कि कही कोई गलत खबर नही छप जाए। एक दिन बाद जनसंघ के नेता अब स्वर्गीय सत्य प्रकाश अग्रवाल जेल भेजे गए। रिपोर्टर ने देर रात यह खबर ज्ञान सागर वर्मा से घसीटा राइटिंग में लिखवाई। मेने इंटेलिजेंस टीम को अन्य न्यूज़ के बंच के साथ भेज दी और अपठनीय होने पर वह गिरफ्तारी की न्यूज़ पर पास होने की मोहर झटके में लग कर वापस आ गई। जब सुबह सत्य प्रकाश अग्रवाल की न्यूज़ दैनिक विश्व मानव पेपर में छपी तो बरेली सहित राजधानी लखनऊ तक हड़कंप मच  गया। संपादक जी ने न्यूज़ पास होने की मोहर लगी कॉपी जिला सूचना अधिकारी को दिखा दी। जिस पर उस इंटेलिजेंस अधिकारी को हटाकर दूसरा व्यक्ति भेज गया। बरेली में उस समय जॉर्ज फर्नाडीस के साप्ताहिक 'प्रतिपक्ष' नामक समाचार पत्र के प्रतिनिधि अब स्वर्गीय वीरेन डंगवाल थे, जो रात में डरे हुए घबराहट में देर रात आकर दैनिक विश्व मानव की प्रिंटिंग मशीन के नीचे सोते थे। आपातकाल में मैने सुभाषनगर गुरुद्वारा में सरदार स्वर्गीय उपकार सिंह के साथ जाकर वहां रह रहे लोगो से भी बात की थी। कवि स्वर्गीय कन्हैया लाल बाजपेयी की इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा के दिए गए निर्णय के बाद लिखी कविता उन दिनों चाय घाट 'फाइव स्टार' पर बहुत सुनी जाती थी। वह थी ... 'बरुआ भैया कुछ तो जुगत बताओ, जा राजनारायण को जल्दी ही मीसा में जेल भिजवावो'। स्मरण रहे इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जग मोहन लाल सिन्हा ने राजनारायण बनाम श्रीमती इन्दिरा गाँधी केस की सुनवाई करने के बाद 12 जून 1975 के अपने ऐतिहासिक फैसले में रायबरेली संसदीय क्षेत्र से श्रीमती इन्दिरा गाँधी का निर्वाचन भ्रष्ट साधनों के उपयोग के कारण रद्द कर दिया था। जून माह में जब होटल उबेराय आनंद में सांसद रहे कुंवर सर्वराज सिंह ने राजनारायण की पत्रकार वार्ता कराई थी । जिस पर राजनारायण ने कहा था सच की ही जीत होगी। राजनारायण जी ने होटल से नीचे आकर झोली में भुने चने बेच रहे चने वाले से चार आने के चने खरीद कर मुझे एवम अन्य पत्रकारों को खिलाए भी थे। कहा था नेताओ का वास्तव में यही चना चबेना होता है।  इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा के द्वारा राजनरायण सिंह के पक्ष में दिए इस अभूतपूर्व फैसले से भारत  की राजनीति में भूचाल आ गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी को अदालत के इस निर्णय से काफी गहरा धक्का लगा था और इसी निर्णय से प्रधानमंत्री के सलाहकारों ने देश में इमरजेंसी लगाने की भूमिका बना दी और आखिर 25 जून को 1975 को देश पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी थोप कर देश के प्रमुख विपक्षी राजनेताओं को जेल में डाल दिया गया था। आजकल आपातकाल में जेल जाने वाले वही कुछ लालू प्रसाद यादव जैसे नेता भ्रष्टाचार में आरोपित होकर जेल में सजा काट रहे हैं या जमानत पर हैं। अपने कथित स्वार्थवश वर्तमान में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लोकसभा चुनाव में हटाने को इंडिया गठबंधन जैसे धड़े बनाकर गलवाहियां कर रहे हैं। पर बंगाल की चुनावी हार से सभी सदमे में हैं। 

इलाहाबाद हाई कोर्ट में यह साहसिक फैसला  सुनाने वाले जस्टिस स्वर्गीय जगमोहन लाल सिन्हा का बरेली के गुलाबनगर से भी गहरा नाता रहा था। उन्होंने बरेली कालेज में उच्च शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने सन् 1943 से 1955 तक बरेली में अधिवक्ता के रूप में कार्य किया था। आज जस्टिस सिन्हा हमारे मध्य नहीं हैं मगर अपने इस ऐतिहासिक और निष्पक्ष फैसले के लिए वे हमेशा याद किए जायेंगे।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद सभी को यह उम्मीद थी कि तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्रीमती इन्दिरा गाँधी नैतिकता के आधार पर प्रधानमन्त्री पद से इस्तीफा दे देंगी, मगर अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के कारण उन्होंने ऐसा नहीं किया। जिससे विपक्ष हमलावर हो गया। उनके इस्तीफे की मांग करते हुए पूरे विपक्ष ने देशभर में धरना, प्रदर्शन एवं रैलियां करना शुरू कर दीं। पूरे देश में श्रीमती इन्दिरा गांधी के खिलाफ आन्दोलन तेज होता गया। विपक्ष द्वारा चलाए जा रहे इस आन्दोलन की अगुवाई लोकनायक जयप्रकाश नारायण कर रहे थे। आन्दोलन को मिल रहे अपार जनसमर्थन को देखकर दिल्ली में सत्ता का सिंहासन हिलने लगा।

25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में उस समय के विपक्ष ने एक विशाल रैली का आयोजन किया। इस रैली में अपार जनसमूह उमड़ पड़ा। लोकनायक जय प्रकाश नारायण ने विशाल सभा को सम्बोधित करते हुए दिल को झकझोर देने वाला भाषण दिया।

इस सब से नाराज होकर श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने अपनी कुर्सी बचाने की खातिर संविधान के अनुच्छेद 352 का दुरुपयोग करते हुए पूरे देश में आपातकाल लगाने की घोषणा कर दी थी। आपातकाल लगाने के लिए सारे आवश्यक प्रावधानों को दरकिनार करते हुए यह घोषणा की गई थी। प्रावधानों के तहत देश के आधे से अधिक प्रान्त जब मांग करें, नोट भेजे कि कानून व्यवस्था संकट में है और केन्द्रीय कैबिनेट सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित करे तब आपातकाल लगता है। इन सबका उल्लंघन करते हुए इन्दिरा गाँधी ने आपातकाल लगाने का प्रस्ताव मंजूरी हेतु राष्ट्रपति के पास भेजा था। तत्कालीन राष्ट्रपति श्री फखरुद्दीन अली अहमद ने भी संवैधानिक औपचारिकताओं के निर्वाह न होने के बावजूद आपातकाल की घोषणा पर यत्रवत् हस्ताक्षर कर दिए थे। इस प्रकार चन्द घन्टों में ही सारी कार्यवाही निपटाकर देश पर आपातकाल थोप दिया गया। आपातकाल की यह घोषणा 25 जून 1975 को रात के 12 बजे की गई।

वर्तमान की नई पीढ़ी को लोकतन्त्र पर आई इस अमावस्या की शायद कम ही कोई जानकारी होगी मगर उस समय जो लोग किशोर, नौजवान या प्रौढ़ रहे होंगे उनके मन में इमर्जेन्सी की यादें आज भी सिहरन पैदा कर देती हैं। बहुत कठिन दौर था। पूरे देश में दमघोंटू माहौल था। कब किसे आकर पुलिस वाले गिरफ्तार कर लें किसी को कुछ पता नहीं था। अभिव्यक्ति की आजादी पर पाबन्दी लगी हुई थी।

पूरे देश में गिरफ्तारियों का दौर शुरू हो गया। संत- महन्त, राजनेता, समाजसेवी, छात्र नेता, पत्रकार सभी को अपराधी बनाकर जेलों में ठूंस दिया गया। इमरर्जेन्सी में किशोरों तक को नहीं बख्शा गया। उस समय के प्रतिपक्ष के नेता जेलों में ठूंस दिए गये। लोकनायक जय प्रकाश नारायण, अटल बिहारी बाजपेई, लालकृष्ण आडवाणी, मोरारजी देसाई, मुरली मनोहर जोशी, जार्ज फर्नांडीज, चोधरी चरण सिंह, राजनारायण सहित सभी प्रमुख नेताओं को जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया।

कोई अपील नहीं, कोई न्यायिक व्यवस्था नहीं, न्यायालयों के सारे अधिकार समाप्त। लाखों लोगों की गिरफ्तारी की गई। प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई। 250 से अधिक पत्रकार जेल में डाल दिए गये। निरपराध नागरिकों के साथ उत्पीड़न का ऐसा तांडव जनता ने कभी नहीं देखा था। देश के लाखों लोग जेल में सलाखों के पीछे कैद कर दिए गये। चारों तरफ भय और दहशत का माहौल था।

प्रेस की स्वतंत्रता का गला घोट दिया गया। छापेखानों की बिजली काट दी गई। समाचार पत्रों, पत्रिकाओं में छापने वाली सामग्री का प्रकाशन से पूर्व भी परीक्षण होने लगा। यदि किसी अखबार की सामग्री में आपातकाल की नीतियों की आलोचना शामिल पाई जाती तो उसका प्रकाशन बन्द कर दिया जाता था। आपातकाल लगाते समय श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने रेडियो पर भाषण देते हुए कहा था कि आपातकाल बहुत कम समय के लिए होगा।                                                                                       देश मे लोकतंत्र की बहाली के लिए हुए इस आंदोलन में देश में कई नेताओ का निधन भी हुआ।

आपातकाल के 19 महीनों तक देश में एक अजीब सी खामोशी रही जिससे श्रीमती इन्दिरा गाँधी को लगा कि विपक्ष का यह प्रचार खोखला ही था, जिसे अखबारों एवम आन्दोलनकारियों ने हवा हवाई बना दिया है। बाद में श्रीमती इंदिरा गांधी  ने 18 जनवरी 1977 को देश मे आम चुनाव की घोषणा कर दी।

एक बार फिर 21 जनवरी 1977 के बाद देश मे एक बार फिर राजनैतिक घटना चक्र तेजी से घूम गया। विपक्ष के चार दलों के विलय के बाद एक नया राजनीतिक दल के रूप में जनता पार्टी बनी। जनता पार्टी का देश भर में प्रचार हो गया। इस चुनाव में जनता पार्टी को बड़ी सफलता मिली। श्रीमती इंदिरा गांधी की कांग्रेस पार्टी चुनाव हार गई। इसके बाद 22 मार्च 1977 में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की अगुआई में देश में जनता पार्टी की सरकार बनी और लोकतंत्र की पुनः बहाली हुई। इसके बाद श्रीमती गांधी जी ने देश भर में दौरा शुरू कर अपनी बात को सही बताया था। उसी के तहत श्रीमती इंदिरा गांधी जी बरेली भी आई थीं। बरेली के त्रिशूल एयरपोर्ट पर श्रीमती इंदिरा जी से मेरी (निर्भय सक्सेना) काफी लंबी वार्ता भी हुई थी। इसके बाद मेने प्रदेश सरकार के मंत्री राम सिंह खन्ना की एंबेसडर कार से श्रीमती इंदिरा गांधी जी का नानकमत्ता का दौरा भी कबर किया था। मेरे साथ पत्रकार अशोक वैश्य एवम एक स्वीडिश टीवी पत्रकार भी था। इसके  कुछ समय बाद ही आपसी क्लेश में जनता पार्टी की सरकार जल्दी ही गिर गई। और फिर कांग्रेस सरकार बापस आ गई थी।  आजकल बीजेपी सरकार देश में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने धारा 370 हटा दी, तीन तलाक कानून बन गया। लाल चौक पर तिरंगा फहरा रहा है। तीसरी बार प्रधानमंत्री बन कर नरेन्द्र मोदी ने जवाहर लाल नेहरू का सबसे अधिक दिन देश में निर्वाचित होकर प्रधानमंत्री रहने वाला रिकॉर्ड तोड़ दिया। अब प्रधानमंत्री मोदी जी देश का सम्मान बढ़ा रहे हैं।


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