हिन्दी दिवस के पूर्व अवसर पर अवधी के छन्द
जाइ बसी महाप्रान निराला में,अक्षर-अक्षर वन्दन हिन्दी।
नीरज बच्चन की
कविता इठलाती रहे,अभिनन्दन हिन्दी।।
हिन्द के सांस में वास सदा,उर में करती स्पन्दन हिन्दी।
शीतल गन्ध सुगंध सुबाषित,माथे गिरीश के चन्दन हिन्दी।।1।।
सात सुरों से सुशोभित जो,स्वर व्यंजन की परिधान है हिन्दी।
मोह रही जड़ चेतन को घनश्याम के बंशी की तान है हिन्दी।।
रीती नहीं जो अनादि अनन्त अखंड भरी रसखान है हिन्दी।।
जानकी राम की राधिका श्याम की,शक्ति गिरीश की प्रान है हिन्दी।।2।।
पोरइ -पोर भरी रसधार, सुशोभित अंगइ अंग है हिन्दी।
कोष अपार अलंकृत भूषण,भाव भरी सुचि रंग है हिन्दी।
अक्षर अक्षर अर्थ अनेक,गिरीश हिया की उमंग है हिन्दी।
लाख नदी धरती पे बहइ,महिमा जग जाहिर गंग है हिन्दी।।3।।
आनउ बान हउ शानउ देश क मान सदा अभिमान हउ हिन्दी।।
भाउ भरी हरषात हिया अनुराग भरी गुन खान हउ हिन्दी।।
सूर कबीर के मान दई रस की गगरी रसखान हउ हिन्दी।।
वास गिरीश के सांस करइ जग जाहिर हिन्द क प्रान हउ हिन्दी।। ------4
माई सरस्वती क वरदान हउ वीणा क झंकृत तान हउ हिन्दी।।
पोरइ पोर लसी रस से अंग अंग कसी उपमान हउ हिन्दी।।
भाषा के माथे क बिन्दी हउ हिन्दी सदा चमकैइ जस चांन हउ हिन्दी
मान करा अपमान किहा जिन, देश क ई सम्मान हउ हिन्दी।।---- ---5
गिरीश श्रीवास्तव "गिरीश"
जौनपुर

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