बाल सुरक्षा, मानवाधिकार और वैश्विक डिजिटल जवाबदेही का नया अध्याय
गोंदिया - वैश्विक स्तरपर डिजिटल क्रांति ने मानव सभ्यता को संचार, व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक संपर्क के ऐसे अवसर दिए हैं, जिनकी कुछ दशक पहले कल्पना भी कठिन थी। आज अरबों लोग प्रतिदिन फेसबुक,इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर निर्भर हैं। व्यक्तिगत संवाद से लेकर सरकारी योजनाओं,व्यापारिक लेन-देन, शिक्षा, न्यायिक प्रक्रियाओं और वैश्विक कूटनीति तक डिजिटल माध्यमों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो चुकी है। किंतु मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि जितनी तीव्र गति से डिजिटल सुविधाएँ बढ़ी हैं, उतनी ही तीव्र गति से साइबर अपराध, भ्रामक सूचनाएँ,डीपफेक,ऑनलाइन ठगी, डेटा गोपनीयता के संकट तथा बाल यौन शोषण सामग्री (सीएसएएम) जैसी गंभीर चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। यही कारण है कि अब पूरी दुनियाँ में यह प्रश्न प्रमुखता से उठ रहा है कि क्या तकनीकी कंपनियाँ केवल प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराने तक सीमित रह सकती हैं अथवा उन्हें अपने प्लेटफॉर्म पर होने वाले अपराधों की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी भी उठानी होगी।हाल के घटनाक्रमों ने इस बहस को और तीखा कर दिया है। शुक्रवार दिनांक 7 अगस्त 2026 को इस पूरे मुद्दे पर कानूनी और मानवाधिकारों के संरक्षण की दिशा में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने एक ऐतिहासिक और बेहद कड़ा कदम उठाया है।आयोग ने इस विषय पर स्वतःसंज्ञान लेते हुए को मेटा इंडिया और भारत के आठ प्रमुख राज्यों (दिल्ली, पंजाब, तेलंगाना, महाराष्ट्र, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, हरियाणा और बिहार) के पुलिस महानिदेशकों को विस्तृत नोटिस जारी किया। एनएचआरसी ने जांच के लिए 50 विशिष्ट इंटरनेट लिंक कानून प्रवर्तन एजेंसियों और मेटा के साथ साझा किए हैं। आयोग का स्पष्ट मानना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बाल यौन शोषण सामग्री का लगातार बने रहना बच्चों की गरिमा, निजता और उनके मौलिक मानवाधिकारों का निरंतर उल्लंघन है। यह पूरी कार्रवाई मुख्य रूप से भारत के यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम यानी पोक्सो कानून, 2012 के कड़े नियमों के तहत की जा रही है। पोक्सो अधिनियम की धारा 19 के अंतर्गत, किसी भी व्यक्ति या मध्यवर्ती संस्था (जैसे मेटा) को यदि बच्चों के खिलाफ यौन अपराध या ऐसी सामग्री के प्रसार की जानकारी मिलती है, तो उसकी तुरंत रिपोर्ट करना अनिवार्य है। इस कानून के तहत बाल यौन शोषण सामग्री को देखना, संग्रहीत करना या उसका प्रसार करना एक गंभीर और गैर-जमानती आपराधिक कृत्य है एनएचआरसी ने अपने निर्देशों में स्पष्ट किया है कि संबंधित राज्यों की साइबर क्राइम इकाइयाँ और विशेष किशोर पुलिस इकाइयाँ इन लिंक्स की गहन जांच करें, दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करें और यदि मेटा की ओर से जानबूझकर अनदेखी या नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो उसके खिलाफ भी पोक्सो अधिनियम और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत आपराधिक मुकदमा चलाया जाए।यह दृष्टिकोण दर्शाता है कि भविष्य में डिजिटल कंपनियों की जवाबदेही केवल व्यावसायिक नहीं बल्कि सामाजिक और संवैधानिक भी होगी।
साथियों वर्तमान समय की एक और महत्वपूर्ण वास्तविकता यह है कि मनुष्य डिजिटल व्यवस्थाओं पर अभूतपूर्व रूप से निर्भर हो चुका है। परिवार, व्यापार, बैंकिंग, चिकित्सा, शिक्षा और प्रशासनिक कार्य अब मोबाइल एप्लीकेशनों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से संचालित होने लगे हैं।ऐसे में यदि किसीतकनीकी कारण से किसी उपयोगकर्ता का अकाउंट अचानक अंडर रिव्यू में चला जाए या बिना पूर्व सूचना के अस्थायी रूप से बंद हो जाए, तो उसका सामान्य जीवन प्रभावित हो जाता है।हाल ही में व्हाट्सएप द्वारा अनेक खातों को लगभग 24 घंटे के लिए समीक्षा के दायरे में रखने की घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि स्वचालित कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सुरक्षा प्रणालियाँ अपराधियों को रोकने के साथ-साथ कभी-कभी निर्दोष उपयोगकर्ताओं को भी प्रभावित कर सकती हैं। इससे यह प्रश्न और गंभीर हो जाता है कि डिजिटल सुरक्षा सुनिश्चित करते समय नागरिकों के अधिकारों और तकनीकी त्रुटियों के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए।दूसरी ओर, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अश्लील सामग्री, फर्जी विज्ञापनों और बाल यौन शोषण सामग्री के प्रसार ने सरकारों और नियामक संस्थाओं को कठोर रुख अपनाने के लिए प्रेरित किया है। खोजी रिपोर्टों में ऐसे आरोप सामने आए कि कुछ सशुल्क विज्ञापन अप्रत्यक्ष रूप से अवैध सामग्री तक पहुँचने का माध्यम बन रहे थे। यदि किसी डिजिटल विज्ञापन प्रणाली का उपयोग अपराधी संगठित रूप से कर सकें,तो यह केवल प्लेटफॉर्म की तकनीकी कमजोरी नहीं बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा का प्रश्न बन जाता है। इसी कारण संभवतः इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने मेटा से तत्काल स्पष्टीकरण माँगा तथा ऐसे विज्ञापनों को हटाने के निर्देश दिए। यह संदेश स्पष्ट है कि डिजिटल विज्ञापन से होने वाला आर्थिक लाभ सामाजिक उत्तरदायित्व से ऊपर नहीं हो सकता।
साथियों, इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण आयाम बाल अधिकारों की सुरक्षा है।भारत का पॉक्सो अधिनियम, 2012 बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों से संरक्षण हेतु विश्व के सबसे कठोर कानूनों में से एक माना जाता है। इसकी विभिन्न धाराएँ बाल यौन शोषण सामग्री के निर्माण, भंडारण, प्रसार अथवा व्यावसायिक उपयोग को गंभीर अपराध घोषित करती हैं। साथ ही यह भी अपेक्षा करती हैं कि यदि किसी डिजिटल मध्यस्थ को ऐसी सामग्री की जानकारी मिले तो वह तत्काल कानून प्रवर्तन एजेंसियों को सूचित करे। इस प्रकार कानून केवल अपराधियों को दंडित करने तक सीमित नहीं है बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को सक्रिय सहयोगी बनने की जिम्मेदारी भी सौंपता है। यही कारण है कि यदि किसी कंपनी द्वारा लापरवाही सिद्ध होती है तो उसके विरुद्ध सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम तथा पॉक्सो कानून के अंतर्गत कठोर कार्रवाई संभव हो सकती है।राष्ट्रीयमानवाधिकार आयोग द्वारा आठ राज्यों के पुलिस प्रमुखों को नोटिस जारी करना केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं बल्कि एक समन्वित राष्ट्रीय रणनीति का संकेत है। आयोग ने संदिग्ध इंटरनेट लिंक संबंधित एजेंसियों को उपलब्ध कराकर विस्तृत जांच,साइबर फॉरेंसिक विश्लेषण, आईपी एड्रेस ट्रैकिंग तथा आवश्यक होने पर प्राथमिकी दर्ज करने के निर्देश दिए हैं। विशेष किशोर पुलिस इकाइयों और साइबर अपराध शाखाओं की भूमिका इस मामले में अत्यंत महत्वपूर्ण होगी क्योंकि डिजिटल अपराध अक्सर अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के माध्यम से संचालित होते हैं। इसलिए केवल तकनीकी जांच ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग, डेटा साझा करने की व्यवस्था और डिजिटल साक्ष्यों का सटीकता से संरक्षण भी आवश्यक होगा।
साथियों, इस पूरे विवाद ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 के अंतर्गत मिलने वाले सेफ हार्बर संरक्षण पर भी नई बहस प्रारंभ कर दी है।अब यह विचार तेजी से उभर रहा है कि यदि कोई सोशल मीडिया कंपनी अपने प्लेटफॉर्म पर अवैध सामग्री को रोकने में बार-बार विफल रहती है या नियामकीय निर्देशों का पालन नहीं करती, तो उसे कानूनी संरक्षण का लाभ स्वतः नहीं मिलना चाहिए। प्रस्तावित आईटी नियमों में भ्रामक सामग्री, डीपफेक और बाल यौन शोषण सामग्री को निश्चित समय-सीमा के भीतर हटाने की अनिवार्यता, विज्ञापनदाताओं का केवाईसी सत्यापन, अधिक पारदर्शी कंटेंट मॉडरेशन प्रणाली तथा एल्गोरिदमिक जवाबदेही जैसे प्रावधान शामिल किए जाने पर विचार हो रहा है। यदि ये सुधार प्रभावी रूप से लागू होते हैं तो भारत डिजिटल नियमन के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की दिशा में सटीकता से महत्वपूर्ण कदम उठा सकता है।
साथियों,अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यही प्रवृत्ति दिखाई देती है। यूरोपीय संघ का डिजिटल सर्विसेज एक्ट, अमेरिका में बिग टेक कंपनियों पर बढ़ती संसदीय निगरानी,ऑस्ट्रेलिया तथा ब्रिटेन के ऑनलाइन सुरक्षा कानून और संयुक्त राष्ट्र द्वारा बच्चों की डिजिटल सुरक्षा पर लगातार दिए जा रहे दिशा-निर्देश इस बात का प्रमाण हैं कि विश्व समुदाय अब सोशल मीडिया कंपनियों से अधिक पारदर्शिता, जवाबदेही और सक्रिय सुरक्षा उपायों की अपेक्षा कर रहा है। अब यह युग समाप्त होता दिखाई दे रहा है जब तकनीकी कंपनियाँ स्वयं को केवल मध्यस्थ बताकर प्रत्येक जिम्मेदारी से अलग कर लेती थीं। वैश्विक लोकतंत्रों में यह सिद्धांत मजबूत हो रहा है कि जहाँ तकनीकी शक्ति है, वहाँ सामाजिक उत्तरदायित्व भी सटीकता से अनिवार्य होना चाहिए।
साथियों, हालाँकि, इस पूरे विमर्श में एक महत्वपूर्ण संतुलन बनाए रखना भी आवश्यक है। यदि सुरक्षा के नाम पर अत्यधिक स्वचालित नियंत्रण लागू कर दिएजाएँ तो निर्दोष उपयोगकर्ताओं के खाते निलंबित होने, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित होने तथा वैध सामग्री हटाए जाने जैसी समस्याएँ भी उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित कंटेंट मॉडरेशन को पारदर्शी, उत्तरदायी तथा मानवीय समीक्षा से युक्त बनाना होगा। उपयोगकर्ताओं को स्पष्ट अपील व्यवस्था, त्वरित शिकायत निवारण और निर्णय प्रक्रिया की जानकारी उपलब्ध कराना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि अवैध सामग्री को रोकना। डिजिटल शासन का उद्देश्य केवल नियंत्रण नहीं बल्कि विश्वास स्थापित करना होना चाहिए।आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार, न्यायपालिका नियामक संस्थाएँ तकनीकी कंपनियाँ, शिक्षण संस्थान, अभिभावक और सामान्य नागरिक सभी मिलकर डिजिटल नागरिकता की नई संस्कृति विकसित करें। बच्चों को साइबर सुरक्षा, ऑनलाइन शिष्टाचार और डिजिटल जोखिमों के प्रति जागरूक बनाना, अभिभावकों को तकनीकी निगरानी के आधुनिक साधनों की जानकारी देना तथा समाज में जिम्मेदार डिजिटल व्यवहार को बढ़ावा देना उतना ही आवश्यक है जितना कि कठोर कानून बनाना।तकनीक तभी मानव कल्याण का माध्यम बन सकती है जब उसके साथ नैतिकता संवेदनशीलता और उत्तरदायित्व भी समान रूप से जुड़े हों।
-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318



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