फटे-चीथड़े मटमैले कुर्ते संग...
हाथ में बांस की....!
कामचलाऊ फट्टी लिए....
बैलगाड़ी पर मोरम लादे,
मंडी में अपने सौदे का.....
भाव लगने का....
इंतजार करते हुए,
"हरिया" को देखकर....!
अनायास विचार आया....
माँ गंगा का पेट चीरते हैं ये लोग..
खुद का पेट भरने को....
रातों की नींद खराब करते हैं....!
सुकून की दो रोटी पाने को....
दलाली मोल-तोल के बाद....!
भाव सेट हो जाने पर देखा....
"हरिया" की आँखों की चमक...
जैसे चूल्हा जलने की चमक...
देर शाम में मिलने वाली. ..
ताज़ी गरम रोटी की ऊर्जा.....
इतना ही नहीं.....देखा मैंने.....!
बैलों को भी...कंधे उचकाते हुए...
इन बेजुबानों को भी....!
घर जाने की जल्दी थी...क्योंकि..
इनकी आस.....पेट भर भोजन...
और..कंधों पर मिलने वाली...
मालकिन की गर्म हल्दी थी....
इसी बीच प्यारे....अचानक....
मन-मस्तिष्क में घूमा.....!
ट्रक-ट्रैक्टर-जेसीबी-डंपर...और..
ठेकेदार-पल्लेदार-पाटीदार...
साथ ही उनकी कृपा दृष्टि वाले, बिचौलिया-मुनीम-दलाल....
साथ मे सुबह-दोपहर-शाम में...
भोजन करने वाले मलाईदार...
विह्वल मन...सोचने पर विवश था
कि..."हरिया" तो बड़ा ही सच्चा है
दिल-दिमाग दोनों से ही कच्चा है
और मेरा मन अभी बच्चा है....
नदी और धरती को तो वास्तव में,
पर्दे के पीछे से चीरा जा रहा है....
सदियों से पेट भरा है जिनका...!
उनका ही पेट भरा जा रहा है. ..
हाड़ तोड़ता "हरिया".....!
हमेशा की तरह अब भी बाजार में
कर चोरी के लिए कसा जा रहा है
मौका दर मौका....वही.....
मोहरा बना जा रहा है....
उससे ही यह पूछा जा रहा है...
कि...मेहनत क्यों नहीं करता....?
"हरिया" ....विकास के बाजार में..
विकास के इस दौर में....
अमानुष सा.....क्यों लगा है....?
चोरी के व्यापार में....
अमानुष सा.....क्यों लगा है....?
चोरी के व्यापार में....
रचनाकार.....
जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ



