– डॉ मंजू मंगलप्रभात लोढ़ा, वरिष्ठ साहित्यकार
चातुर्मास केवल चार महीनों की अवधि नहीं, बल्कि आत्म-जागरण, आत्म-शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का अनुपम अवसर है। यह स्वयं भी एक महापर्व है और अनेक पावन पर्वों का समवाय भी। भारतीय संस्कृति और जैन दर्शन में इन चार महीनों का अत्यंत विशेष महत्व है, क्योंकि यही वह समय है जब मनुष्य बाहरी संसार से कुछ विराम लेकर अपने अंतर्मन की यात्रा करता है।
चातुर्मास का प्रारंभ आषाढ़ पूर्णिमा से माना जाता है। यह महर्षि वेदव्यास सहित अनेक महान ऋषियों की जन्मतिथि है तथा इसी दिन गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व भी मनाया जाता है। वैष्णव परंपरा के अनुसार आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) से भगवान विष्णु योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवोत्थान एकादशी) पर जागृत होते हैं। इसी कारण इन चार महीनों में विवाह एवं अन्य मांगलिक कार्य सामान्यतः नहीं किए जाते। इसका गूढ़ संदेश यह है कि यह समय बाहरी उत्सवों का नहीं, बल्कि आत्मोत्सव का है।
जैन परंपरा में भी चातुर्मास का महत्व अत्यंत विशिष्ट है। पर्युषण महापर्व, संवत्सरी तथा क्षमायाचना जैसे महान पर्व इन्हीं चार महीनों में आते हैं। यदि जीवन में ये चार महीने ही न हों, तो आत्मा अपने दोषों का परिमार्जन कैसे करेगी? आत्मा को ऊँचाइयों के शिखर तक पहुँचाने के लिए चातुर्मास एक आध्यात्मिक प्रशिक्षण काल है।
वर्ष भर हम भौतिक सुख-सुविधाओं, व्यवसाय, परिवार और सांसारिक व्यस्तताओं में उलझे रहते हैं, किंतु चातुर्मास हमें स्वयं के भीतर झाँकने का अवसर देता है। यह आत्मा को माँजने, तपाने और सोने से कुंदन बनाने का समय है।
यदि बारह महीनों में से ये चार महीने निकाल दिए जाएँ, तो जीवन का आध्यात्मिक पक्ष लगभग शून्य हो जाएगा। जैसे किसान वर्षा ऋतु में खेत में बीज बोता है और वही बीज आगे चलकर पूरे वर्ष के जीवन का आधार बनता है, उसी प्रकार चातुर्मास में किए गए तप, स्वाध्याय, संयम, ध्यान और सदाचार के संस्कार पूरे जीवन को प्रकाशित करते हैं। यह आत्मा की भूमि में धर्म के बीज बोने का श्रेष्ठ समय है। इन्हीं संस्कारों से जीवन में शांति, संतोष, समता, करुणा और आत्मिक आनंद का अमूल्य फल प्राप्त होता है।
वर्षा ऋतु में असंख्य सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति होती है। ऐसे समय में विहार करने से अनजाने में भी जीव हिंसा हो सकती है। इसलिए अहिंसा के परम उपासक जैन साधु-साध्वियाँ अपने शिष्यों सहित एक ही स्थान पर वर्षायोग की स्थापना कर चातुर्मास व्यतीत करते हैं। आषाढ़ पूर्णिमा से कार्तिक पूर्णिमा तक चलने वाला यह वर्षावास केवल उनकी साधना का समय नहीं, बल्कि समाज को धर्म, संयम और सदाचार की प्रेरणा देने का भी अवसर है।
केवल जैन धर्म ही नहीं, भारत की अनेक आध्यात्मिक परंपराओं में भी वर्षावास का विशेष महत्व है। संत-महात्मा इन महीनों में एक स्थान पर रहकर साधना, उपासना, जीवदया, सेवा, करुणा, व्रत, उपवास और लोककल्याण के कार्य करते हैं तथा समाज को धर्ममय जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं।
साधु का स्वभाव तो सदैव प्रवाहित नदी की निर्मल धारा के समान होता है—चलते रहना, बहते रहना। किंतु जन-जन में धर्मभाव जागृत हो, आत्मा का कल्याण हो और समाज सद्मार्ग पर अग्रसर हो, इसलिए वे चार महीने एक स्थान पर विराजते हैं। उनका सान्निध्य, प्रवचन और मार्गदर्शन ही समाज की आध्यात्मिक शक्ति है।
चातुर्मास गृहस्थों के लिए भी एक संदेश है कि जहाँ तक संभव हो अनावश्यक यात्राओं से बचें, एक स्थान पर रहकर अधिकाधिक स्वाध्याय, साधना, धर्माराधना, ध्यान और आत्मचिंतन में समय लगाएँ तथा जीवदया का विशेष ध्यान रखें। यह समय बाहरी व्यस्तताओं से विराम लेकर अंतर्मन की यात्रा करने और जीवन में संयम को उतारने का श्रेष्ठ अवसर है।
जैन परंपरा में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा भगवान नेमिनाथ के समक्ष यह संकल्प लेने का उल्लेख मिलता है कि वे चातुर्मास के चार महीने द्वारका में रहकर धर्मध्यान करेंगे। इसी प्रकार गुजरात के महान धर्मनिष्ठ राजा कुमारपाल ने अपने गुरु आचार्य श्री हेमचंद्राचार्य के समक्ष प्रतिज्ञा की थी कि चाहे युद्ध जैसी विकट परिस्थिति ही क्यों न आ जाए, वे चातुर्मास में पाटण नहीं छोड़ेंगे। उनके राज्य में जीवदया की ऐसी भावना थी कि पशुओं तक को छाना हुआ जल पिलाया जाता था। यह केवल नियमों का पालन नहीं, बल्कि प्रत्येक प्राणी के प्रति करुणा, अहिंसा और संवेदनशील जीवन-दृष्टि का जीवंत उदाहरण था।
जैन आगमों में चातुर्मास के दौरान श्रावक-श्राविकाओं के लिए नौ प्रकार के शुद्ध आचरण बताए गए हैं—
* सामायिक एवं प्रतिक्रमण
* आवश्यक क्रियाएँ
* पौषध
* देवपूजन
* स्नात्र पूजा
* ब्रह्मचर्य पालन
* धर्मक्रिया
* दान
* तप
ये नौ शुद्ध आचरण चातुर्मास के वास्तविक आभूषण हैं। इनका पालन आत्मा को निर्मल बनाता है और जीवन को आध्यात्मिक ऊँचाइयों की ओर ले जाता है।
चातुर्मास हमें यह भी स्मरण कराता है कि धर्म केवल मंदिर, उपाश्रय या पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन के प्रत्येक व्यवहार में उतरना चाहिए। जब संयम, करुणा, क्षमा, अहिंसा और सदाचार हमारे आचरण का अंग बन जाते हैं, तभी चातुर्मास की वास्तविक साधना सार्थक होती है।
चातुर्मास क्यों?
* आत्मा से परमात्मा की ओर बढ़ने के लिए।
* अहं से अर्ह की ओर अग्रसर होने के लिए।
* आसक्ति से अनासक्ति की यात्रा के लिए।
* हिंसा से अहिंसा की ओर बढ़ने के लिए।
* उपासना, स्वाध्याय, आराधना, तप, जप और ध्यान के लिए।
* सम्यग्दर्शन एवं धर्म-जागरण के लिए।
* संतों के सान्निध्य से जीवन को दिशा देने के लिए।
* आत्मशुद्धि एवं आत्मोत्थान के लिए।
* प्रत्येक क्षण का सदुपयोग कर प्रमादरहित जीवन जीने के लिए।
* संयम, करुणा, क्षमा और जीवदया को जीवन में उतारने के लिए।
वास्तव में चातुर्मास केवल चार महीने नहीं, बल्कि आत्मा का वसंत है। यही वह काल है जिसमें मनुष्य अपने भीतर छिपे दिव्य स्वरूप को पहचान सकता है। आइए, इस चातुर्मास में पूज्य आचार्य भगवंतों एवं साधु-साध्वियों के सान्निध्य का अधिकाधिक लाभ लें, संयम, सेवा, स्वाध्याय, तप, ध्यान और धर्ममय जीवन का संकल्प लें तथा आत्मा को परमात्मा बनने की दिशा में एक सार्थक कदम बढ़ाएँ।
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