भारत की सड़कों पर ट्रैफ़िक कानून बनाम लापरवाही- क़्या ट्रैफिक कानून हार रहा है? पैसा, पहुंच,पहचान,दबंगई जीत रही है? -लोकतंत्र,जनसंख्या और ट्रैफिक अनुशासन का गहन विश्लेषण

Naya Savera Network

केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के हालिया आंकड़े सड़क सुरक्षा,पर्यावरण संरक्षण और विधि शासन के लिए गंभीर चुनौती है।

ट्रैफिक अधिनियमों का सख़्ती से क्रियान्वयन नहीं करना यह केवल प्रशासनिक शिथिलता का प्रश्न नहीं,बल्कि शासकीय मानसिकता,तकनीकी ढांचे, राजनीतिक इच्छाशक्ति और नैतिक अनुशासन का भी मुद्दा है -एडवोकेट किशन षणमुख दास भवानी गोंदिया महाराष्ट्र

 नया सवेरा नेटवर्क

गोंदिया - वैश्विक स्तरपर भारत आज 142.6 करोड़ से अधिक आबादी वाला विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है।इतनी विशाल जनसंख्या,विविध सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ ,तीव्र शहरीकरण और तेजी से बढ़ते मोटर वाहनों के बीच कानून-व्यवस्था को सुचारू रूप से लागू करना किसी भी सरकार के लिए असाधारण चुनौती है।भारत में हजारों केंद्रीय और राज्य कानून लागू हैं और अधिकांश क्षेत्रों में उनका पालन संतोषजनक रूप से होता भी है। किंतु सड़क परिवहन और ट्रैफिक कानूनों का क्रियान्वयन एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ व्यवस्था और वास्तविकता के बीच गंभीर अंतर दिखाई देता है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह बताना चाहता हूं कि जनता पर लागू प्रमुख सड़क परिवहन कानून और नियम:(1)मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम, 2019:यह कानून सड़क सुरक्षा बढ़ाने और नियमों के उल्लंघन (जैसे- बिना हेलमेट /सीटबेल्ट,शराब पीकर गाड़ी चलाना) पर भारी जुर्माने के लिए लागू है।(2)केंद्रीय मोटर वाहन नियम,1989:यह वाहन के तकनीकी मानकों (जैसे- प्रदूषण, लाइट,सुरक्षा उपकरण) को निर्धारित करता है।(3) राष्ट्रीय राजमार्ग नियंत्रण (भूमि और यातायात) अधिनियम, 2002: यह राजमार्गों पर अतिक्रमण हटाने और यातायात के सुचारू संचालन को नियंत्रित करता है।(4)सड़क मार्ग द्वारा वहन अधिनियम, 2007:यह माल परिवहन करने वाले वाहकों के नियमों और दायित्वों से संबंधित है।(5)परिवहन परमिट (धारा 66-70): व्यावसायिक वाहनों  के लिए वैध परमिट अनिवार्य है।इन अधिनियमों का सख़्ती से क्रियान्वयन नहीं करना यह केवल प्रशासनिक शिथिलता का प्रश्न नहीं है,बल्कि सामाजिक मानसिकता, तकनीकी ढांचे, राजनीतिक इच्छाशक्ति और नैतिक अनुशासन का भी मुद्दा है।भारत में सड़क सुरक्षा का मूल कानूनी ढांचा मोटर व्हीकलस एक्ट पर आधारित है,जिसे समय-समय पर संशोधित किया गया है, इन अधिनियमों का उद्देश्य वाहन पंजीकरण,ड्राइविंग लाइसेंस बीमा,फिटनेस, प्रदूषण नियंत्रण और सड़क सुरक्षा मानकों को सुनिश्चित करना है। 2019 में इस कानून में व्यापक संशोधन किए गए,जुर्मानों को बढ़ाया गया,डिजिटल प्रवर्तन को प्रोत्साहित किया गया और राज्यों को अधिक दायित्व सौंपे गए।इसके बावजूद जमीनी स्तर पर स्थिति चिंताजनक बनी हुई है।केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के हालिया आंकड़ों के अनुसार देश में पंजीकृत लगभग 40.7 करोड़ वाहनों में से 70 प्रतिशत से अधिक वाहन किसी न किसी वैधानिक आवश्यकता का पालन नहीं कर रहे हैं। इनमें प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र,वैध बीमा,फिटनेस सर्टिफिकेट और समय पर पंजीकरणनवीनीकरण जैसी अनिवार्य शर्तें शामिल हैं। केवल लगभग 8 करोड़ वाहन ही पूर्णतः अनुपालन की श्रेणी में आते हैं,जबकि 30 करोड़ से अधिक वाहन अधूरे दस्तावेजों के साथ सड़कों पर चल रहे हैं।इसके अतिरिक्त 2 करोड़ से अधिक वाहन ऐसे हैं जिनका पंजीकरण पहले ही निरस्त किया जा चुका है,किंतु वे डेटाबेस में दर्ज हैं।यह स्थिति केवल प्रशासनिक आंकड़ों कीसमस्या नहीं है;यह सड़क सुरक्षा,पर्यावरण संरक्षण और विधि शासन के लिए गंभीर चुनौती है।भारत में सबसे बड़ी चिंता दोपहिया वाहनों को लेकर है। गैर- अनुपालन वाले वाहनों में लगभग 23.5 करोड़ दोपहिया वाहन शामिल हैं।हेलमेट का उपयोग न करना,तीन-तीन लोगों का बैठना,नाबालिगों द्वारा वाहन चलाना,बीमा या फिटनेस न होना,ये दृश्य देश के हर छोटे-बड़े शहर में सामान्य हो चुके हैं। महाराष्ट्र के छोटे शहर गोंदिया से लेकर महानगरों तक ट्रैफिक अनुशासन की कमी स्पष्ट दिखाई देती है।सिग्नल तोड़ना,गलत दिशा में वाहन चलाना मोबाइल पर बात करते हुए ड्राइविंग करना, सोशल मीडिया रील्स बनाने के लिए स्टंट करना,ये सब अब केवल अपवाद नहीं रहे,बल्कि एक व्यापक सामाजिक प्रवृत्ति बनते जा रहे हैं।द्वारका की घटना में मृतक की मां द्वारा कही गई बात,कि यह केवल दुर्घटना नहीं बल्कि मानसिकता का प्रश्न है,भारत की सड़क सुरक्षा बहस का केंद्रीय बिंदु है। सोशल मीडिया पर प्रसिद्धि पाने की होड़,तेज रफ्तार को स्टेटस सिंबल मानना,और कानून को चुनौती देने की प्रवृत्ति एक नई पीढ़ी के भीतर उभरती दिखाई देती है।डिजिटलप्लेटफॉर्म पर खतरनाक स्टंट्स के वायरल होने से युवाओं में जोखिम लेने की प्रवृत्ति बढ़ती है। इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए केवल दंड पर्याप्त नहीं; शिक्षा, जागरूकता और डिजिटल प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी भी आवश्यक है। 

साथियों बात अगर हम हाल की घटनाओं ने इस संकट को और भी स्पष्ट कर दिया है इसको समझने की करें तो फरवरी 2026 में दिल्ली के द्वारका क्षेत्र में एक 17 वर्षीय नाबालिग द्वारा तेज रफ्तार स्कॉर्पियो से बाइक सवार युवक को टक्कर मारने की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया। यह घटना उस समय हुई जब आरोपी कथित रूप से सोशल मीडिया के लिए रील बनाने के उद्देश्य से वाहन चला रहा था। मृतक युवक की मां का सार्वजनिक बयान इस घटना को महज दुर्घटना नहीं, बल्कि आपराधिक मानसिकता का परिणाम बताता है।उनका दर्द केवल व्यक्तिगत शोक नहीं था;वह एक ऐसी व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह था जहाँ कुछ लोग स्वयं को कानून से ऊपर समझने लगते हैं।इस घटना में आरोपी नाबालिग को किशोर न्याय प्रणाली के अंतर्गत प्रस्तुत किया गया। भारत में नाबालिगों से संबंधित मामलों का निपटान जुवेंइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रन ) एक्ट के तहत किया जाता है। इस कानून का उद्देश्य बच्चों के पुनर्वास और सुधार पर बल देना है, न कि दंडात्मक प्रतिशोध पर। किंतु जब अपराध की प्रकृति गंभीर हो, विशेषकर तब जब उसमें जान का नुकसान हुआ हो, तो समाज में न्याय और दया के बीच संतुलन को लेकर व्यापक बहस शुरू हो जाती है।द्वारका प्रकरण में आरोपी को बोर्ड परीक्षा के आधार पर अंतरिम जमानत दी गई,जिससे पीड़ित परिवार और आम जनता में मिश्रित प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं।इससे पहले पुणे में हुई चर्चित पोर्श दुर्घटना ने भी देश को झकझोरा था। वहाँ भी एक नाबालिग द्वारा तेज रफ्तार वाहन चलाने से गंभीर दुर्घटना हुई थी और आरोपों में साक्ष्य मिटाने की बात सामने आई थी। ऐसे मामलों में प्रश्न केवल व्यक्तिगत अपराध का नहीं, बल्कि अभिभावकीय जिम्मेदारी सामाजिक प्रतिष्ठा, धनबल और प्रभाव के दुरुपयोग का भी है। जब परिवार अपने नाबालिग बच्चों को उच्च क्षमता वाले वाहन चलाने की अनुमति देते हैं, तो यह केवल कानूनी उल्लंघन नहीं बल्कि नैतिक विफलता भी है। 

साथियों बात अगर हम भारत में प्रतिवर्ष लाखों सड़क दुर्घटनाएँ होती हैं इसको समझने की करेंतो,इसमें हजारों लोग अपनी जान गंवाते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखें तो विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्टें बताती हैं कि निम्न और मध्यम आय वाले देशों में सड़क दुर्घटनाएँ मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक हैं। भारत, जिसकी सड़क नेटवर्क लंबाई विश्व में सबसे अधिक में से एक है, सड़क सुरक्षा के मामले में अभी भी विकसित देशों से काफी पीछे है। विकसित देशों में सख्त प्रवर्तन,स्वचालित कैमरा प्रणाली, उच्च दंड और त्वरित न्यायिक प्रक्रिया के कारण अनुपालन दर अधिक है।भारत सरकार द्वारा हाल ही में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ बैठक में वाहन डेटाबेस को साफ करने और चरणबद्ध तरीके से गैर- अनुपालन वाहनों को स्वतः डी-रजिस्टर करने का प्रस्ताव इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। यदि तय समयसीमा के भीतर बीमा,फिटनेस और प्रदूषण प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं किए जाते,तो ऐसे वाहनों को स्वतः निष्क्रिय करने की व्यवस्था लागू की जा सकती है। यह कदम केवल तकनीकी सुधार नहीं होगा;यह प्रशासनिकइच्छाशक्ति की परीक्षा भी होगा। सड़क सुरक्षा का प्रश्न केवल कानून या पुलिस तक सीमित नहीं है। यह सामाजिक संस्कृति का प्रश्न भी है। भारत में कई लोग ट्रैफिक जुर्माने को मामूली खर्च या समझौते का अवसर मान लेते हैं। कुछ स्थानों पर ट्रैफिक विभाग को मलाईदार विभाग कहे जाने का कारण भी यही धारणा है कि प्रवर्तन पारदर्शी और निष्पक्ष नहीं है। जब कानून का पालन कराने वाला तंत्र ही विश्वास खो देता है, तो नागरिक अनुशासन भी कमजोर पड़ जाता है। 

साथियों बात कर हम पर्यावरणीय दृष्टि से इस पूरे मुद्दे को समझने की करें तो भी 30 करोड़ से अधिक गैर- अनुपालन वाले वाहनों की उपस्थिति गंभीर चिंता का विषय है। बिना वैध पीयूसी प्रमाणपत्र के वाहन वायु प्रदूषण बढ़ाते हैं,जो पहले से ही कई भारतीय शहरों में खतरनाक स्तर पर है। प्रदूषण और सड़क सुरक्षा दोनों ही सतत विकास लक्ष्यों से जुड़े मुद्दे हैं।यदि भारत को 21वीं सदी में एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में उभरना है,तो सड़क सुरक्षा और पर्यावरणीय अनुपालन को प्राथमिकता देनी ही होगी।यह भी ध्यान देने योग्य है कि कानूनों की संख्या पर्याप्त है; समस्या क्रियान्वयन की है। पुलिस बल की कमी,न्यायिक लंबित मामले, तकनीकी संसाधनों की असमान उपलब्धता और राजनीतिक हस्तक्षेप—ये सभी प्रवर्तन को प्रभावित करते हैं। यदि किसी राज्य में ट्रैफिक उल्लंघन के मामलों का शीघ्र निपटान नहीं होता, तो दंड का निवारक प्रभाव कम हो जाता है। 

साथियों बात अगर हम समाधान के रूप में कुछ ठोस सुझावों को समझने की करें तो, पहला, नाबालिग द्वारा वाहन चलाने पर अभिभावकों के लिए कठोर दंड का अनिवार्य प्रावधान और उसका वास्तविक क्रियान्वयन। दूसरा, सभी वाहनों के लिए डिजिटल अनुपालन ट्रैकिंग और गैर-अनुपालन पर स्वचालित जुर्माना। तीसरा, स्कूल स्तर से सड़क सुरक्षा शिक्षा कोअनिवार्य पाठ्यक्रम में शामिल करना। चौथा,सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के साथ समन्वय कर खतरनाक स्टंट्स के प्रचार पर रोक। 

पाँचवाँ  ट्रैफिक पुलिस की जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र निगरानी तंत्र।भारत का लोकतंत्र विशाल और जीवंत है। परंतु लोकतंत्र केवल मतदान का अधिकार नहीं; यह कानून के समक्ष समानता और नागरिक जिम्मेदारी का भी नाम है। जब सड़क पर कोई व्यक्ति नियम तोड़ता है, तो वह केवल व्यक्तिगत जोखिम नहीं लेता; वह दूसरों के जीवन को भी खतरे में डालता है। द्वारका की घटना में एक मां का आक्रोश हमें याद दिलाता है कि हर दुर्घटना के पीछे एक परिवार का बिखरना छिपा होता है।यदि 70 प्रतिशत वाहन नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं, तो यह केवल प्रशासनिक असफलता नहीं बल्कि सामूहिक चेतना का संकट है। भारत को आर्थिक महाशक्ति बनने की आकांक्षा के साथ-साथ सामाजिकअनुशासन और विधि-पालन की संस्कृति भी विकसित करनी होगी। सड़क सुरक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता घोषित कर केंद्र और राज्यों को समन्वित, तकनीक-समर्थित और पारदर्शी ढांचा अपनाना चाहिए। 

साथियों बात अगर हम अंतरराष्ट्रीय स्तरपर इसको समझने की करें तो अनुभव बताते हैं कि सड़क सुरक्षा सुधार के लिए बहु-स्तरीय रणनीति आवश्यक होती है—कानून का कठोर प्रवर्तन, तकनीकी निगरानी, सड़क अवसंरचना में सुधार, वाहन सुरक्षा मानकों का उन्नयन और नागरिक शिक्षा। भारत में भी ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन, ई-चालान प्रणाली, और एकीकृत वाहन डेटाबेस जैसी पहलों से सुधार संभव है। परंतु जब तक स्थानीय स्तर पर निरंतर निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक आंकड़ों में सुधार सीमित रहेगा।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि यह लेख किसी एक घटना की प्रतिक्रिया नहीं बल्कि एक व्यापकआह्वान है।सड़क पर चलने वाला प्रत्येक नागरिक, चाहे वह पैदल यात्री हो, साइकिल सवार, बाइक चालक या कार ड्राइवर सुरक्षा का अधिकार रखता है। कानून का सम्मान और अनुशासन का पालन ही उस अधिकार की रक्षा कर सकता है। यदि सरकार प्रस्तावित ढांचे को सख्ती से लागू करे, वाहन डेटाबेस को शुद्ध करे और गैर- अनुपालन पर वास्तविक दंड सुनिश्चित करे,तो भारत सड़क सुरक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय सुधार कर सकता है। भारत का भविष्य केवल उसकी जनसंख्या, अर्थव्यवस्था या तकनीकी क्षमता से नहीं तय होगा; वह इस बात से भी तय होगा कि वह अपने नागरिकों के जीवन की सुरक्षा को कितनी गंभीरता से लेता है। सड़क पर अनुशासन, कानून का निष्पक्ष प्रवर्तन और सामाजिक जिम्मेदारी—ये तीनों मिलकर ही उस सुरक्षित और जिम्मेदार भारत का निर्माण कर सकते हैं जिसकी कल्पना एक सशक्त लोकतंत्र करता है।

-संकलनकर्ता लेखक - क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425


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