आक्सीजन संकट पर विशेष... | #NayaSaberaNetwork

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नया सबेरा नेटवर्क
चलो फिर कोई ‘चिपको आन्दोलन’ चलाया जाय
संजय सक्सेना
बोतल में आम ‘माजा’ है नाम। भले ही यह स्लोगन व्यवसायिक हो लेकिन इसमें कई निहितार्थ छिपे हुए हैं। कोरोना महामारी के दौर मे तो यह ‘स्लोगन’ और भी सामायिक हो जाता है। ठीक वैसे ही जैसे अक्सर यह कहा जाता है ‘जैसा खाएं अन्न, वैसा बने मन।’ या फिर अक्सर इसी तरह की कुछ और कहावतें सुनने को मिलती है जैसे ‘जो बोएंगे, वही काटेंगे।’ अथवा ‘बोया पेड़ बबुल का तो आम कहां से होएं।’ इन बातों और कहावतों में कुछ नया नहीं हैं। सब जानते हैं लेकिन इस पर अमल मुट्ठी भर लोग ही करते हैं, इसीलिए तो जो आक्सीजन हमें पेड़-पौधों से मिलती है, उसे सिलेंडर और कंसंट्रेटर में तलाश रहे हैं। ऐसा नहीं है कि हमें इस बात का अहसास नहीं था कि जिस तरह से जंगल और वन कट रहे हैं, विकास के नाम पर बड़े-बड़े पेड़ों को उखाड़ कर वहां कंकरीट का ‘जंगल’ बसाया जा रहा था। पहाड़ तोड़े जा रहे थे। उससे हमें कभी न कभी आक्सीजन की समस्या से जुझना ही पड़ेगा। अगर इस बात का अहसास नहीं होता तो आज से करीब 50 वर्ष पूर्व पर्यावरणविद्ों को पेड़ बचाने के लिए ‘चिपको आंदोलन’ नहीं चलाना पड़ता।
चिपको आन्दोलन एक पर्यावरण-रक्षा का आन्दोलन था। यह भारत के उत्तराखण्ड राज्य (तब उत्तर प्रदेश का भाग) में किसानों ने वृक्षों की कटाई का विरोध करने के लिए किया था। वे राज्य के वन विभाग के ठेकेदारों द्वारा वनों की कटाई का विरोध कर रहे थे और उन पर अपना परम्परागत अधिकार जता रहे थे। यह आन्दोलन तत्कालीन उत्तर प्रदेश के चमोली जिले में सन् 1973 में प्रारम्भ हुआ। एक दशक के अन्दर यह पूरे उत्तराखण्ड में फैल गया था। चिपको आन्दोलन की एक मुख्य बात थी कि इसमें स्त्रियों ने भारी संख्या में भाग लिया था। इस आन्दोलन की शुरुआत 1970 में भारत के प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुन्दर लाल बहुगुणा, कामरेड गोविन्द सिंह रावत, चण्डी प्रसाद भट्ट तथा श्रीमती गौरादेवी के नेत्रत्व मे हुई थी। कहा जाता है कि कामरेड गोविन्द सिंह रावत ही चिपको आन्दोलन के व्यावहारिक पक्ष थे, जब चिपको की मार व्यापक प्रतिबंधों के रूप में स्वयं चिपको की जन्मस्थली की घाटी पर पड़ी तब कामरेड गोविन्द सिंह रावत ने झपटो-छीनो आन्दोलन को दिशा प्रदान की। चिपको आंदोलन वनों का अव्यावहारिक कटान रोकने और वनों पर आश्रित लोगों के वनाधिकारों की रक्षा का आंदोलन था। इसकी वजह थी  रेणी में 2400 से अधिक पेड़ों को काटा जाना था, इसलिए इस पर वन विभाग और ठेकेदार जान लडाने को तैयार बैठे थे जिसे गौरा देवी जी के नेतृत्व में रेणी गांव की 27 महिलाओं ने प्राणों की बाजी लगाकर असफल कर दिया था। महिलाएँ पेड़ से चिपककर खड़ी हो गई थीं और पेड़ों को कटने नहीं दिया था। ‘चिपको आन्दोलन’ का स्लोगन काफी कुछ कहता था,’- क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार। मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार।
चिपको आंदोलन की याद ऐसे ही नहीं ताजा हो गई है। आज पूरे देश के शहरी इलाकों में आक्सीजन को लेकर त्राहिमाम मचा हुआ। तब हमें करीब आधे दशक पूर्व शुरू किए गऐ चिपको आंदोलन की सार्थकता समझ में आ जाना चाहिए। यह वह समय जब मरीज आक्सीजन के लिए तड़प रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट तक आक्सीजन की किल्लत कैसेे पूरी की जाय, इसमें उलझा हुआ है। वह सरकारों पर सख्ती बरत रहा हैं, सरकारें आक्सीजन के उत्पादन और वितरण में रात-दिन लगी हुई हैं। अस्पतालों में आक्सीजन के संयत्र लगाए जा रहे हैं, आक्सीजन वितरण के लिए विदेशों से टैंकर मंगाए जा रहे हैं। समाजसेवी संस्थाएं और सक्षम लोग इन आक्सीजन कंसंट्रेटर का वितरण कर रहे हैं। यहां पर कालाबाजारी पर चर्चा आवश्यक नहीं है। इस पर काफी कुछ लिखा जा चुका है। आक्सीजन बेहद आवश्यक यह बात हम समझते तो हैं परंतु इसके लिए गंभीर नहीं रहते हैं। क्या समय नहीं आ गया है कि हम सब गंभीरता से यह बात सोचे कि हमने प्रकृति के साथ अब तक क्या किया। क्या हमारे वायुमंडल में मौजूद आक्सीजन की मात्रा पर इन कंसंट्रेटर का असर नहीं पड़ेगा? गर्मी के बढ़ने के साथ एयरकंडीशनर का उपयोग बढ़ेगा और कार्बन उत्सर्जन में बढ़ोतरी होगी।
दरअसल आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम सब इतने अंधे हो गए कि हमें भारतीय मूल्यों की भी चिंता नहीं रह गई है। यह सब तब हो रहा है जबकि हमारे देश में प्रकृति को लेकर लगाव प्राचीन काल से रहा है। प्रकृति और पेड़ों को तो हमारे यहां भगवान मानकर पूजने की परंपरा है। हमारे पौराणिक ग्रंथों में वृक्षों और पौधों को लेकर कई तरह की मान्यताओं प्रचलित है। पीपल, वट, तुलसी, आदि की तो पूजा तक की जाती रही है। इन वृक्षों और पौधों को लेकर मृत्यु लोक में जो मान्यता है, वह उनको धर्म से भी जोड़ती हैं। वैदिक साहित्य में भी वृक्ष की महिमा का विस्तार से उल्लेख मिलता है। हिंदू धर्म के अलावा बौद्ध, सिख और जैन धर्म में भी वृक्षों की पूजा की परंपरा रही है। बुद्ध और तीर्थंकर के नाम के साथ एक पवित्र वृक्ष भी जुड़ा हुआ है जिसे बोधिवृक्ष कहते हैं। हिंदू धर्म में भी कल्पवृक्ष की मान्यता है। इस मान्यता के अनुसार देवता और असुरों के समुद्र मंथन के समय ही कल्पवृक्ष का जन्म हुआ जिसको स्वर्ग में इंद्र देवता के नंदनवन में लगा दिया गया। लोक में इस कल्पवृक्ष की मान्यता के अलावा इसका उल्लेख कई ग्रंथों में मिलता है।
पेड़ों-पौधों को लेकर हमारे पूर्वज कितना जागरूक थे, यह किताबों में भी पढ़ने और बुजुर्गों से सुनने को मिल जाता है। आधुनिकता और शहरीकरण के अंधानुकरण के दबाव में हमने खुद को प्रकृति के दूर करना आरंभ किया। विकास के नाम पर प्रकृति से खिलवाड़ का खेल खतरनाक स्तर पर पहुंच गया। पेड़ों की जगह गगनचुंबी इमारतों ने ले ली। हाइवे और फ्लाईओवर के चक्कर में हजारों पेड़ काटे गए। ये ठीक है कि विकास होगा तो हमें इन चीजों की जरूरत पड़ेंगी लेकिन विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बनाना भी तो हमारा ही काम है। यह काम कोई मुश्किल भी नहीं है। अगर हम पेड़ों को काट रहे हैं तो क्या उस अनुपात में पेड़ लगा नहीं सकते हैं? इसमें क्या समस्या है। यह जन-भागीदारी का काम है। हमने नीम, पीपल और बरगद के पेड़ हटाकर फैशनेबल पेड़ लगाने आरंभ कर दिए थे। बगैर यह सोचे-समझे कि इसका पर्यावरण और प्रकृति पर क्या असर पड़ेगा? आज जब आक्सीजन को लेकर हाहाकार मचा है तो हमें फिर से नीम और पीपल के पेड़ों की याद आ रही है। आज मरीज की जान बचाने के लिए कंसंट्रेटर का उपयोग जरूरी है परंतु उतना ही जरूरी है जितना उसके उपयोग को लेकर एक संतुलित नीति बनाने की भी।
आज हम कोरोना की महामारी से लड़ रहे हैं, ये दौर भी निकल जाएगा। हम इस महामारी के प्रकोप से उबर भी जाएंगे लेकिन प्रकृति को जो नुकसान हमने पहुंचा दिया है उसको जल्द पाटना मुश्किल होगा। कोरोना की महामारी ने हमें एक बार इस बात की याद दिलाई है कि हम भारत के लोग अपनी जड़ों की ओर लौटें, हमारी जो परंपरा रही है, हमारे पूर्वजों ने जो विधियां अपनाई थीं, उसको अपनाएं। हम पेड़ों से फिर से रागात्मक संबंध स्थापित करें, उनको अपने जीवन का हिस्सा बनाएं। इसके अलावा पेड़ों को बचाने के लिए हमें यह कहने में कतई संकोच नहीं होना चाहिए, चलो एक बार फिर चिपको आंदोलन चलाया जाय, ताकि हमारी धरा फिर हरी-भरी आक्सीजन युक्त और प्रदूषण मुक्त हो सकें।

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