शिवपूजन पांडे @ नया सवेरा
मुंबई। मुंबई निवासी अंकुर शर्मा और उनके परिवार की यह सच्ची कहानी केवल एक सड़क दुर्घटना की नहीं, बल्कि अदम्य साहस, पारिवारिक प्रेम, धैर्य और ईश्वर की कृपा की मिसाल है। यह घटना सिद्ध करती है कि जब इंसान का हौसला अडिग हो और परिवार एकजुट हो, तो जीवन की सबसे कठिन परीक्षाएं भी पार की जा सकती हैं। 24 दिसंबर 2025 की सुबह लगभग 6:30 बजे राजस्थान के एक राष्ट्रीय राजमार्ग पर अंकुर शर्मा अपनी पत्नी पूनम शर्मा, 12 वर्षीय पुत्री वंशिका शर्मा, 4 वर्षीय पुत्र देवांश शर्मा और चालक संजय के साथ यात्रा कर रहे थे। यात्रा सामान्य रूप से चल रही थी कि अचानक सामने चल रहे ट्रक ने तेज ब्रेक लगा दिए। इससे उनकी कार ट्रक के पीछे जा टकराई और देखते ही देखते एक भयावह दुर्घटना घट गई।हादसे में पूनम शर्मा, वंशिका शर्मा और चालक गंभीर रूप से घायल हो गए।
स्वयं अंकुर शर्मा को भी अंदरूनी चोटें आईं। सौभाग्यवश छोटे देवांश को गंभीर चोट नहीं लगी। दुर्घटना के दौरान मात्र 12 वर्ष की वंशिका ने जिस साहस और सूझबूझ का परिचय दिया, वह किसी बड़े व्यक्ति से कम नहीं था। उसने अपने छोटे भाई की सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। घायल होने के बावजूद अंकुर शर्मा ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने सबसे पहले अपने परिवार को बचाने का संकल्प लिया। इसी बीच अश्विन नामक एक सज्जन व्यक्ति देवदूत बनकर सामने आए।
उनकी मदद से सभी घायलों को तत्काल निकटवर्ती अस्पताल पहुंचाया गया, जहां प्राथमिक उपचार दिया गया। संकट की उस घड़ी में अश्विनी का सहयोग शर्मा परिवार कभी नहीं भूल सकता। स्थिति की गंभीरता को समझते हुए अंकुर शर्मा ने तुरंत एम्बुलेंस की व्यवस्था की और लगभग 70 किलोमीटर दूर जोधपुर स्थित मथुरादास माथुर अस्पताल में परिवार को भर्ती कराया। यहां डॉक्टरों ने गहन चिकित्सा शुरू की, लेकिन सबसे चिंताजनक स्थिति पूनम शर्मा की थी। उनके सिर में गंभीर चोट लगी थी और उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया। पूरा परिवार अनिश्चितता और चिंता के दौर से गुजर रहा था।
कई दिनों तक चले इलाज के बाद अंकुर शर्मा ने अपनी पत्नी को बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने का कठिन निर्णय लिया। 29 दिसंबर 2025 को विशेष व्यवस्था के तहत पूनम शर्मा को एयरलिफ्ट कर मुंबई लाया गया और उन्हें लीलावती अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहां प्रसिद्ध न्यूरोसर्जन डॉ. अतुल गोयल के मार्गदर्शन में उनका उपचार प्रारंभ हुआ।
अंकुर शर्मा बताते हैं कि उनके जीवन का यह सबसे कठिन समय था। एक ओर पत्नी जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रही थीं, दूसरी ओर चार वर्षीय पुत्र की देखभाल की जिम्मेदारी थी। अस्पताल और घर के बीच उनका जीवन सीमित हो गया था। प्रतिदिन लगभग 17 घंटे अस्पताल में बिताना उनकी दिनचर्या बन गई थी। जब वे घर जाते, तब उनके पिता अस्पताल में रहकर परिवार का संबल बनते। इस कठिन दौर में अंकुर शर्मा के माता-पिता और पुत्री वंशिका ने असाधारण धैर्य और साहस का परिचय दिया। अंकुर शर्मा स्वीकार करते हैं कि यदि परिवार का साथ न होता तो इस संघर्ष को पार कर पाना संभव नहीं था। पहले 108 दिनों तक उन्हें पर्याप्त नींद और आराम भी नसीब नहीं हुआ।
लगभग 35 दिनों बाद जब पूनम शर्मा को आईसीयू से सामान्य वार्ड में स्थानांतरित किया गया, तब परिवार को पहली बार राहत की किरण दिखाई दी। इसके बाद धीरे-धीरे स्वास्थ्य में सुधार होता गया।आखिरकार 10 अप्रैल 2026 को 108 दिनों तक चले लंबे उपचार, चिकित्सकों के अथक प्रयास और परिवार की अटूट सेवा के बाद पूनम शर्मा को लीलावती अस्पताल से छुट्टी मिल गई। आज वे पूर्णतः स्वस्थ होकर अपने परिवार के साथ सामान्य जीवन व्यतीत कर रही हैं।
यह कहानी केवल एक दुर्घटना से बच निकलने की नहीं है। यह कहानी है एक पति के समर्पण की, एक पिता के उत्तरदायित्व की, एक बेटी के साहस की, माता-पिता के त्याग की और उस विश्वास की, जो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी मनुष्य को टूटने नहीं देता।
अंकुर शर्मा ने जिस प्रकार विपरीत परिस्थितियों में अपने परिवार का साथ निभाया, वह आज के समाज के लिए एक प्रेरणा है। उनका संघर्ष हमें सिखाता है कि सच्चा पारिवारिक प्रेम केवल सुख के दिनों में नहीं, बल्कि संकट की घड़ी में अपने वास्तविक स्वरूप में दिखाई देता है।

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