काम,क्रोध,लोभ,मोह और अहंकार पांच विकार बनाम आपदा में अवसर- महाराष्ट्र कैबिनेट उपसमिति द्वारा 44 मामलों को वापस लेने की सिफारिश इसी प्रक्रिया का हिस्सा?

 नया सवेरा नेटवर्क

गोंदिया - वैश्विक स्तरपर मानव सभ्यता के विकास का इतिहास केवल भौतिक प्रगति का इतिहास नहीं है, बल्कि यह मानवीय भावनाओं,प्रवृत्तियों और मानसिक अवस्थाओं के निरंतर संघर्ष,संतुलन और परिष्कार का भी इतिहास है।भारतीय दर्शन में काम,क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार को सामान्यतःपंचविकार कहा गया है। धर्मग्रंथों,संत साहित्य और आध्यात्मिक परंपराओं में इनका उल्लेख ऐसे तत्वों के रूप में किया गया है जो मनुष्य को पतन की ओर ले जा सकते हैं।किंतु यदि इनका गहन अध्ययन किया जाए तो स्पष्ट होता है कि ये भाव स्वयं में न तो पूर्णतः अच्छे हैं और न ही पूर्णतःबुरे। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि इन पांच विकारों का सदुपयोग करने और उन्हें अवसर में बदलने की अवधारणा को हम इस प्रकार समझ सकते हैं: काम (इच्छा/उत्साह):इसे वासना के बजाय कुछ बड़ा हासिल करने या उत्कृष्ट लक्ष्य (जैसे रचनात्मक कार्य या समाज सेवा) के प्रति जुनून में बदलें।क्रोध (रोष):इसे दूसरों या स्वयं के विनाश के बजाय, अन्याय और अपनी कमियों के खिलाफ लड़ने की दृढ़ शक्ति में बदलें।लोभ (लालच): भौतिक वस्तुओं के लालच को ज्ञान, अच्छे कर्म, और आध्यात्मिक उन्नति के प्रति लालसा में बदलें,मोह (लगाव): सांसारिक मोह को अपने काम, परिवार और मानवता के प्रति सच्ची प्रेम भावना में बदलें अहंकार (घमंड): इसे मैं सबसे श्रेष्ठ हूँ के झूठे अहंकार से निकालकर मैं सब कुछ सीख सकता हूँ के आत्मविश्वास  में बदलें। 

साथियों वास्तव में ये मानव व्यक्तित्व की स्वाभाविक शक्तियां हैं, जिनका परिणाम इस बात पर निर्भर करता है कि उनका उपयोग किस उद्देश्य और किस दिशा में किया जा रहा है। यदि इन्हीं भावनाओं को समाज कल्याण,लोक कल्याण, धार्मिक सहायता,सांस्कृतिक संरक्षण और जनहित के कार्यों में नियोजित किया जाए,तो यही पंचविकार मानव उत्थान और सामाजिक परिवर्तन के साधन बन सकते हैं।भारतीय चिंतन सदैव यह कहता रहा है कि मनुष्य का मूल्यांकन केवल उसके भीतर उत्पन्न होने वाले भावों से नहीं,बल्कि उन भावों के उपयोग और परिणामों से किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए काम केवल भौतिक इच्छा नहीं है, बल्कि सृजन की प्रेरणा भी है। क्रोध केवल विनाश का माध्यम नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस भी बन सकता है। लोभ यदि व्यक्तिगत स्वार्थ तक सीमित रहे तो हानिकारक है, किंतु यदि वह समाज के लिए अधिक से अधिक संसाधन जुटाने की आकांक्षा में परिवर्तित हो जाए तो विकास का माध्यम बन सकता है। मोह यदि केवल व्यक्तियों तक सीमित न रहकर संस्कृति, समाज और राष्ट्र के प्रति समर्पण का रूप ले ले तो वह सामाजिक एकता का आधार बन जाता है। इसी प्रकार अहंकार यदि आत्ममुग्धता न बनकर आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता में परिवर्तित हो जाए तो समाज को दिशा देने का कार्य करता है। इसलिए यह मान लेना कि इन भावों का उदय होते ही व्यक्ति गलत मार्ग पर चल पड़ा है, एक अधूरी और सतही समझ होगी। 

साथियों बात अगर हम इन पांचो विकारों में से किसी एक की तुलना महाराष्ट्र शासन की एक कमेटी क़े निर्णय से करें तो 17 जून 2026 को महाराष्ट्र में मंत्री आशीष शेलार की अध्यक्षता वाली कैबिनेट उपसमिति द्वारा 44 मामलों को वापस लेने की सिफारिश इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। इससे पहले 29 सितंबर 2025 को भी 77 मामलों को वापस लेने की सिफारिश की गई थी। इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि सरकार केवल एक बार की कार्रवाई नहीं कर रही, बल्कि एक संस्थागत व्यवस्था विकसित करने का प्रयास कर रही है जिसके माध्यम से ऐसे मामलों की नियमित समीक्षा की जा सके। यह दृष्टिकोण प्रशासनिक संवेदनशीलता और लोकतांत्रिक परिपक्वता का परिचायक माना जा सकता है।इन मामलों की प्रकृति पर ध्यानदेना भी आवश्यक है।समिति द्वारा जिन मामलों को वापस लेने की सिफारिश की जाती है,वे मुख्य रूप से गणेशोत्सव, नवरात्रोत्सव, दहीहंडी, श्रमिक आंदोलनों, सामाजिक कार्यक्रमों तथा विभिन्न वैचारिक या जनहित आंदोलनों से जुड़े होते हैं। ऐसे आयोजनों में बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी होती है और कभी-कभी प्रशासनिक प्रक्रियाओं या स्थानीय परिस्थितियों के कारण मामले दर्ज हो जाते हैं। 

साथियों,यदि इन मामलों में कोई गंभीर आपराधिक मंशा नहीं है और वे केवल सार्वजनिक गतिविधियों के दौरान उत्पन्न परिस्थितियों से संबंधित हैं, तो उनकी पुनर्समीक्षा लोकतांत्रिक न्याय की भावना के अनुरूप मानी जा सकती है।हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें स्पष्ट सीमाएं और अपवाद निर्धारित किए गए हैं।महिलाओं के विरुद्ध अपराध, हत्या, गंभीर हिंसा, गंभीर मारपीट जैसे जघन्य अपराध तथा व्यक्तिगत या दीवानी विवादों से जुड़े मामलों को किसी प्रकार की राहत नहीं दी जाती। यह व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि सामाजिक या राजनीतिक गतिविधियों की आड़ में गंभीर अपराधों को संरक्षण न मिले। इसी प्रकार जनप्रतिनिधियों से जुड़े मामलों का अंतिम निपटारा न्यायालयों के निर्देशों के अनुसार किया जाता है। इससे यह संदेश जाता है कि कानून के शासन और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व के सिद्धांतों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। 

साथियों, महाराष्ट्र सरकार द्वारा गठित मंत्रिमंडलीय उपसमिति इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखी जा सकती है। इस समिति का उद्देश्य उन मामलों की पहचान करना है जो मुख्यतः सामाजिक धार्मिक या राजनीतिक गतिविधियों के दौरान दर्ज हुए हैं और जिनमें गंभीर आपराधिक तत्व नहीं हैं। समिति के समक्ष आने वाले प्रत्येक आवेदन की गहन जांच की जाती है। इसके बाद जिन मामलों को वापस लेने योग्य माना जाता है, उन्हें पुलिस उपायुक्त की अध्यक्षता वाली क्षेत्रीय समितियों के पास भेजा जाता है, जहां आगे की प्रक्रिया पूरी की जाती है। यह व्यवस्था यह सुनिश्चित करने का प्रयास करती है कि केवल उचित मामलों को ही राहत मिले और न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता बनी रहे। 

साथियो, विश्व इतिहास इस बात का साक्षी है कि अधिकांश सामाजिक आंदोलनों,स्वतंत्रता संघर्षों और जनजागरण अभियानों के पीछे मानवीय भावनाओं की प्रबल भूमिका रही है।अन्याय के विरुद्ध क्रोध,समाज के प्रति मोह, परिवर्तन की इच्छा और नेतृत्व का आत्मविश्वास ही बड़े-बड़े आंदोलनों को जन्म देता है।यदि महात्मा गांधी को अंग्रेजी शासन की अन्यायपूर्ण नीतियों पर नैतिक आक्रोश न होता,यदि नेल्सन मंडेला कोरंगभेद के विरुद्ध संघर्ष की तीव्र भावना न होती,यदि मार्टिन लूथर किंग जूनियर को सामाजिक समानता के लिए गहरा समर्पण न होता, तो इतिहास की दिशा संभवतः अलग होती। इसका अर्थ यह है कि मानवीय भावनाओं को केवल विकार कहकर नकार देना उचित नहीं है; उन्हें सकारात्मक दिशा देना अधिक महत्वपूर्ण है। 

साथियों, वास्तव में समाज कल्याण और लोकहित के लिए कार्य करने वाले लोगों को केवल इसलिए अपराधी की तरह देखना उचित नहीं हो सकता क्योंकि किसी आंदोलन या आयोजन के दौरान उन पर मामला दर्ज हो गया था। यदि उनके कार्यों का उद्देश्य समाज की भलाई, सांस्कृतिक संरक्षण, धार्मिक आयोजन या जनहित रहा हो और उन्होंने कोई गंभीर अपराध न किया हो, तो उन्हें सुधार और पुनर्विचार का अवसर मिलना चाहिए। यह दृष्टिकोण दंडात्मक न्याय के स्थान पर सुधारात्मक न्याय की अवधारणा को मजबूत करता है।आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज पंचविकारों को केवल नकारात्मक दृष्टि से देखने की बजाय उनके सकारात्मक रूपों को भी समझे। जब काम सेवा की आकांक्षा बनता है, क्रोध अन्याय के विरुद्ध संघर्ष बनता है, लोभ समाज के लिए संसाधन जुटाने की प्रेरणा बनता है, मोह संस्कृति और समाज के प्रति समर्पण बनता है तथा अहंकार आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता में परिवर्तित होता है, तब यही भाव मानवता के विकास के साधन बन जाते हैं। इसी प्रकार लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में भी केवल कानून का कठोर अनुपालन ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि परिस्थितियों, उद्देश्यों और सामाजिक हितों को ध्यान में रखते हुए न्यायपूर्ण निर्णय लेना भी आवश्यक है। 

साथियों, महाराष्ट्र सरकार की समिति द्वारा मामलों की समीक्षा और उपयुक्त मामलों को वापस लेने की सिफारिश इसी संतुलित दृष्टिकोण का उदाहरण है। यह पहल एक ओर कानून के शासन का सम्मान करती है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक कार्यकर्ताओं, धार्मिक आयोजकों और जनहित में कार्य करने वाले नागरिकों को अनावश्यक कानूनी बोझ से राहत देने का प्रयास भी करती है। यदि यह प्रक्रिया पारदर्शिता, निष्पक्षता और उत्तरदायित्व के साथ आगे बढ़ती है, तो यह लोकतांत्रिक शासन, सामाजिक न्याय और जनसहभागिता के बीच संतुलन स्थापित करने का एक प्रभावी मॉडल बन सकती है। 

साथियों, भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक आंदोलनों की एक लंबी परंपरा रही है। विभिन्न समुदाय,संगठन और नागरिक समूह समय-समय पर अपनी मांगों,अधिकारों और सामाजिक उद्देश्यों के लिए आंदोलन करते रहे हैं। गणेशोत्सव  नवरात्रोत्सव, दहीहंडी जैसे सांस्कृतिक आयोजनों से लेकर श्रमिक आंदोलनों,सामाजिक सुधार अभियानों और जनहित प्रदर्शनों तक,नागरिक सहभागिता लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। किंतु अनेक बार इन गतिविधियों के दौरान परिस्थितियां ऐसी बन जाती हैं कि प्रतिभागियों के विरुद्ध आपराधिक मामले दर्ज हो जाते हैं। इनमें से कई मामले ऐसे होते हैं जिनमें हिंसा, गंभीर अपराध या व्यक्तिगत स्वार्थ का तत्व नहीं होता, बल्कि वे प्रशासनिक नियमों के उल्लंघन, प्रदर्शन या सामूहिक गतिविधियों के दौरान उत्पन्न परिस्थितियों से जुड़े होते हैं।यहीं से न्याय और प्रशासन के बीच संतुलन का प्रश्न उत्पन्न होता है। क्या प्रत्येक ऐसा मामला, जो किसी सामाजिक या धार्मिक गतिविधि के दौरान दर्ज हुआ हो, जीवनभर व्यक्ति के साथ जुड़ा रहना चाहिए? क्या ऐसे मामलों के कारण सामाजिक कार्यकर्ताओं, धार्मिक आयोजकों या जनहित के लिए कार्य करने वाले व्यक्तियों का भविष्य प्रभावित होना चाहिए? लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में इन प्रश्नों का उत्तर केवल कानूनी दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय दृष्टिकोण से भी खोजा जाना आवश्यक है। इसी सोच के आधार पर महाराष्ट्र सरकार ने विभिन्न धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों के दौरान कार्यकर्ताओं पर दर्ज मामलों की समीक्षा और आवश्यक मामलों में उन्हें वापस लेने की प्रक्रिया सटीक रूप से प्रारंभ की है। 

साथियों, अंतरराष्ट्रीय स्तरपर भी कई लोकतांत्रिक देशों में ऐसी व्यवस्थाएं देखने को मिलती हैं जहां शांतिपूर्ण आंदोलनों से जुड़े मामलों की समीक्षा की जाती है। अनेक देशों में यह माना जाता है कि लोकतंत्र में नागरिकों को अपनी बात रखने, विरोध दर्ज कराने और सामाजिक परिवर्तन के लिए संगठित होने का अधिकार है। यदि इस प्रक्रिया में ऐसे मामले दर्ज हो जाते हैं जिनमें कोई गंभीर आपराधिक तत्व नहीं है, तो समय-समय पर उनकी समीक्षा लोकतांत्रिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक मानी जाती है। महाराष्ट्र की पहल को इसी व्यापक वैश्विक संदर्भ में देखा जा सकता है।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन करें इसका विशेषण करें तो हम पाएंगे के यह कहा जा सकता है कि मनुष्य के भीतर मौजूद काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसी शक्तियां स्वयं में शत्रु नहीं हैं। उनका स्वरूप इस बात से निर्धारित होता है कि वे किस दिशा में प्रयुक्त हो रही हैं। जब ये भाव समाज, संस्कृति, राष्ट्र और मानवता की सेवा में समर्पित हो जाते हैं, तब वे विकार नहीं बल्कि परिवर्तन और निर्माण की ऊर्जा बन जाते हैं। उसी प्रकार लोकतांत्रिक समाज में कानून का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि न्याय स्थापित करना भी है। महाराष्ट्र की वर्तमान पहल इस व्यापक सिद्धांत को व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत करती है कि समाज कल्याण, जनभागीदारी और न्याय व्यवस्था के बीच संतुलन स्थापित कर ही एक संवेदनशील, समावेशी और विकसित लोकतंत्र का निर्माण किया जा सकता है।


-संकलनकर्ता लेखक - क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318


ADMISSION OPEN Session 2026–27 :  SS PUBLIC SCHOOL-  Siddiqpur, Jaunpur – 222003 📞 7380691111, 9453567111  SS PUBLIC SCHOOL 📢 ADMISSION OPEN Session 2026–27 Classes: Bal Vatika to Class IX & XI Streams Offered (Class XI): 🔬 Science | 📊 Commerce | 📚 Humanities Affiliation: ✔ 10+2 Affiliated to C.B.S.E., New Delhi  Siddiqpur, Jaunpur – 222003 📞 7380691111, 9453567111  Babatpur, Varanasi 📞 0542-2622303, 0542-2622304
विज्ञापन

SPECIAL OFFER - No Admission Fee  - No June Month Fee - DALIMSS SUNBEAM SCHOOL, JAUNPUR
Advt