बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 धारा 10 और 11-प्रिंटिंग प्रेस मालिक,मैरिज हॉल संचालक कैटरर्स, बैंड संचालक, फोटोग्राफर,पंडित,मौलवी,पादरी व अन्य सेवा प्रदाता इस कानून के तहत उत्तरदायी हैं
गोंदिया - वैश्विक स्तरपर भारत आज विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है। ऐसे समय में जब देश विकसित भारत 2047 की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब बाल विवाह जैसी सदियों पुरानी सामाजिक कुप्रथा का अस्तित्व केवल सामाजिक चिंता का विषय नहीं,बल्कि मानवाधिकार, लैंगिक समानता,शिक्षा,स्वास्थ्य और आर्थिक विकास के लिए भी गंभीर चुनौती है। संविधान द्वारा प्रदत्त समानता, स्वतंत्रता और गरिमामय जीवन के अधिकार के बावजूद देश के अनेक हिस्सों में बाल विवाह आज भी विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कारणों से जारी हैं। यही कारण है कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2030 तक बाल विवाह मुक्त भारत का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है,बल्कि ऐसे व्यावहारिक और तकनीक-संचालित उपायों की आवश्यकता है जो समाज के प्रत्येक स्तर पर जवाबदेही सुनिश्चित करें। बाल विवाह प्रतिबंध कानून में अनेक लोगों पर अनेक जवाब दहिया निर्धारित की गई है जो मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि शायद अनेक लोगों को यह मालूम नहीं होगा इसलिए मैं बता देना चाहूंगा कि मैरिज हॉल,बैंड और कार्ड विक्रेताओं की कानूनी जिम्मेदारी (पूरे भारत में)भले ही कार्ड पर जन्मतिथि लिखने का नियम हर राज्य में न हो, लेकिन बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 के तहत सेवा प्रदाताओं पर सख्त कानूनी कार्रवाई का प्रावधान पूरे भारत में समान रूप से लागू है: यदि भारत के किसी भी राज्य में बाल विवाह (लड़की 18 से कम या लड़का 21 से कम) होता है,तो केंद्रीय कानून के तहत मैरिज हॉल संचालक, बैंड वाले, टेंट वाले, कैटरर्स और कार्ड प्रिंट करने वाले सभी को अपराध को बढ़ावा देने का दोषी माना जाता है।उम्र की पुष्टि किए बिना बाल विवाह में सेवा देने या उसे बढ़ावा देने पर देश के किसी भी कोने में 2 साल की कठोर जेल और 1 लाख रुपये का जुर्माना हो सकता है। इसलिए, कानूनी रूप से सुरक्षित रहने के लिए पूरे भारत के सभी मैरिज हॉल और लॉन संचालकों को बुकिंग के समय दूल्हा-दुल्हन के आयु प्रमाण पत्र (आधार, जन्म प्रमाण पत्र आदि) की जांच करनी ही पड़ती है,चाहे वे किसी भी राज्य में हों।इसी संदर्भ में राजस्थान द्वारा लागू तथा महाराष्ट्र द्वारा विचाराधीन वह व्यवस्था अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जिसके तहत विवाह निमंत्रण पत्र पर दूल्हा-दुल्हन की जन्मतिथि अनिवार्य रूप से छापने का प्रावधान किया जा रहा है। यह कदम केवल एक प्रशासनिक नियम नहीं, बल्कि बाल विवाह रोकने की दिशा में एक दूरदर्शी सामाजिक नवाचार के रूप में सटीकता से देखा जा सकता है।
साथियों, बाल विवाह की समस्या केवल कम उम्र में विवाह तक सीमित नहीं है। यह लड़कियों की शिक्षा में बाधा उत्पन्न करती है,किशोरावस्था में मातृत्व के जोखिम बढ़ाती है, मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को प्रभावित करती है, घरेलू हिंसा की संभावनाओं को बढ़ाती है तथा महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता को सीमित कर देती है। संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों में भी बाल विवाह उन्मूलन को प्राथमिकता दी गई है। भारत ने पिछले वर्षों में इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति अवश्य की है, किंतु अभी भी कई राज्यों और जिलों में बाल विवाह की घटनाएं चिंताजनक स्तरपर बनी हुई हैं। महाराष्ट्र में बाल विवाह दर 21.9 प्रतिशत से घटकर 19.6 प्रतिशत होने का तथ्य प्रगति का संकेत है, लेकिन यह भी दर्शाता है कि समस्या अभी समाप्त नहीं हुई है। इसलिए नए और प्रभावी उपायों की आवश्यकता लगातार बनी हुई है।
साथियों, विवाह निमंत्रण पत्र पर दूल्हा दुल्हन की जन्मतिथि छापने का प्रस्ताव पहली दृष्टि में साधारण प्रतीत हो सकता है, लेकिन इसके दूरगामी प्रभाव अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकते हैं। भारतीय समाज में विवाह कार्ड केवल निमंत्रण का माध्यम नहीं होता, बल्कि वह विवाह की सार्वजनिक घोषणा भी होता है।जब कार्ड पर वर-वधू की जन्मतिथि स्पष्ट रूप से अंकित होगी, तब परिवारों के लिए उम्र छिपाना कठिन हो जाएगा। रिश्तेदार,पड़ोसी, समाज के लोग तथा प्रशासनिक अधिकारी भी आसानी से यह सत्यापित कर सकेंगे कि विवाह करने वाले युवक-युवती कानूनी आयु के हैं या नहीं। इस प्रकार विवाह कार्ड स्वयं एक प्रारंभिक सत्यापन दस्तावेज का स्वरूप ग्रहण कर सकता है।डिजिटल युग में यह व्यवस्था और अधिक प्रभावी सिद्ध हो सकती है। यदि विवाह कार्ड पर जन्मतिथि के साथ क्यूआर कोड अथवा डिजिटल सत्यापन व्यवस्था जोड़ी जाए तो आयु प्रमाणन की प्रक्रिया और पारदर्शी बन सकती है। भविष्य में यह प्रणाली विवाह पंजीकरण, जन्म प्रमाणपत्र और आधार आधारित सत्यापन सेee भी जोड़ी जा सकती है। इस प्रकार तकनीक और कानून का समन्वय बाल विवाह रोकने के लिए एक सशक्त मॉडल प्रस्तुत कर सकता है।
साथियों,बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 ने केवल माता-पिता या अभिभावकों को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया है, बल्कि विवाह से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति और संस्था को कानूनी दायरे में रखा है। यही इस कानून की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है।अधिनियम की धाराएं 10 और 11 स्पष्ट करती हैं कि जो भी व्यक्ति बाल विवाह को आयोजित करने,प्रोत्साहित करने या उसमें सहयोग करने का कार्य करेगा, वह दंड का भागीदार होगा। इस दृष्टि से प्रिंटिंग प्रेस मालिक, मैरिज हॉल संचालक,कैटरर्स, बैंड संचालक, फोटोग्राफर, पंडित, मौलवी, पादरी तथा अन्य सेवा प्रदाता केवल व्यवसायी नहीं, बल्किr कानून के तहत उत्तरदायी हितधारक भी हैं।
साथियों, प्रिंटिंग प्रेस मालिकों की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि विवाह कार्ड छापने से पहले आयु प्रमाण पत्र की जांच अनिवार्य कर दी जाती है, तो बाल विवाह की तैयारी प्रारंभिकr चरण में ही पकड़ी जा सकती है। विवाह कार्ड किसी भी विवाह प्रक्रिया का पहला औपचारिक दस्तावेज होता है। यदि इसी स्तर पर सत्यापन सुनिश्चित हो जाए, तो बाल विवाह की संभावना काफी हद तक कम की जा सकती है। साथ ही रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की व्यवस्था जांच एजेंसियों को भी आवश्यक साक्ष्य उपलब्ध करा सकती है। यह व्यवस्था केवल दंडात्मक नहीं बल्कि निवारक दृष्टिकोण का उदाहरण है।इसी प्रकार मैरिज हॉल, लॉन, होटल और विवाह स्थलों के संचालकों पर भी अत्यंत महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। वे किसी भी विवाह समारोह के आयोजक नहीं होते, लेकिन आयोजन के लिए आवश्यक मंच उपलब्ध कराते हैं। यदि बुकिंग के समय आयु प्रमाणपत्र स्व-घोषणा पत्र और पहचान दस्तावेजों की जांच अनिवार्य रूप से की जाए तो अनेक संभावित बाल विवाहों को रोका जा सकता है। कानून ने उन्हें केवल सत्यापन तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि संदेह की स्थिति में पुलिस अथवा बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी को सूचना देना भी उनकी कानूनी जिम्मेदारी बनाया है। यह व्यवस्था नागरिक सहभागिता आधारित शासन का उत्कृष्ट उदाहरण है।
साथियों, धार्मिक नेताओं की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।भारतीय समाज में विवाह धार्मिक औरसांस्कृतिक परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।जब पंडित, मौलवी, पादरी या अन्य धार्मिक अधिकारी विवाह संपन्न कराते हैं तब समाज उन्हें नैतिक मार्गदर्शक के रूप में देखता है। इसलिए यदि धार्मिक नेतृत्व स्वयं आयु सत्यापन को अनिवार्य मान ले और नाबालिगों का विवाह कराने से स्पष्ट इनकार करे, तो सामाजिक स्तर पर बड़ा परिवर्तन संभव है। यही कारण है कि बाल विवाह मुक्त भारत अभियान में धार्मिक एवं सामुदायिक नेताओं की सक्रिय भागीदारी पर विशेष बल दिया गया है।
साथियों, भारत सरकार द्वारा शुरू किया गया बाल विवाह मुक्त भारत अभियान केवल कानून आधारित कार्यक्रम नहीं है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का राष्ट्रीय आंदोलन है। वर्ष 2030 तक बाल विवाह समाप्त करने का लक्ष्य संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप है। इस अभियान के अंतर्गत चलाया गया 100 दिवसीय विशेष जागरूकता कार्यक्रम इस बात का संकेत है कि सरकार केवल दंडात्मक उपायों पर निर्भर नहीं रहना चाहती, बल्कि समाज की सोच बदलने का भी प्रयास कर रही है। स्कूलों,कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, पंचायतों और सामुदायिक संगठनों को जोड़ना इसी रणनीति का हिस्सा है।
साथियों, महाराष्ट्र सरकार द्वारा अपनाई गई बहुस्तरीय निगरानी प्रणाली भी उल्लेखनीय है। जिला, तालुका और ग्राम स्तर पर गठित समितियां बाल विवाह रोकने की दिशा में स्थानीय प्रशासन को अधिक प्रभावी बनाती हैं। विशेष रूप से उन जिलों पर ध्यान केंद्रित करना जहां बाल विवाह की दर अधिक है, एक लक्ष्य आधारित प्रशासनिक दृष्टिकोण को दर्शाता है। गन्ना कटाई के लिए पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों में बाल विवाह की अधिक संभावना को पहचानकर उनके बच्चों के लिए विशेष आवासीय और डे-केयर सुविधाएं विकसित करना यह दर्शाता है कि सरकार समस्या की जड़ तक पहुंचने का प्रयास कर रही है।बाल विवाह के विरुद्ध लड़ाई केवल कानून और प्रशासन के सहारे नहीं जीती जा सकती। इसके लिए शिक्षा, आर्थिक सशक्तिकरण और सामाजिक जागरूकता भीe उतनी ही आवश्यक है। अनेक अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि जहां लड़कियों की शिक्षा का स्तर ऊंचा होता है, वहां बाल विवाह की घटनाएं स्वतः कम हो जाती हैं। इसलिए विद्यालयों में बाल अधिकारों की शिक्षा, किशोर-किशोरियों के लिए परामर्श कार्यक्रम और परिवारों के लिए जागरूकता अभियान अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, आशा कार्यकर्ता, शिक्षक और स्वयंसेवी संस्थाएं इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
साथियों, 18 अक्टूबर 2024 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए ऐतिहासिक निर्देशों ने बाल विवाह उन्मूलन की दिशा में एक नया अध्याय जोड़ा है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बाल विवाह केवल एक सामाजिक समस्या नहीं बल्कि बच्चों की गरिमा, स्वायत्तता और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। न्यायालय द्वारा सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पूर्णकालिक बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारियों की नियुक्ति तथा विशेष इकाइयों के गठन के निर्देश इस बात को रेखांकित करते हैं कि समस्या के समाधान के लिए संस्थागत ढांचे को मजबूत बनाना आवश्यक है। यह निर्णय बाल विवाह विरोधी कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए एक मजबूत न्यायिक आधार प्रदान करता है।भारतीय न्याय संहिता और पॉक्सो कानून के प्रावधानों ने भी बाल विवाह के प्रति कानूनी दृष्टिकोण को और कठोर बनाया है। अब यह स्पष्ट रूप से स्थापित हो चुका है कि नाबालिग पत्नी के साथ यौन संबंध भी गंभीर अपराध की श्रेणी में आ सकता है। इसका अर्थ यह है कि बाल विवाह को केवल पारिवारिक या सांस्कृतिक मुद्दे के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह बाल संरक्षण और मानवाधिकार से जुड़ा गंभीर कानूनी प्रश्न भी है।
साथियों, भारत में बाल विवाह के विरुद्ध संघर्ष कोई नया नहीं है। राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर और महात्मा ज्योतिराव फुले जैसे महान समाज सुधारकों ने 19वीं शताब्दी में ही इस कुप्रथा के विरुद्ध आवाज उठाई थी। शारदा अधिनियम से लेकर बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 तक की यात्रा यह दर्शाती है कि भारत ने समय-समय पर अपने कानूनों को अधिक प्रगतिशील बनाया है। किंतु इतिहास यह भी सिखाता है कि कानून तभी सफल होते हैं जब समाज उनका समर्थन करे।आज आवश्यकता इस बात की है कि राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों द्वारा विकसित किए जा रहे नवाचारों को राष्ट्रीय स्तर पर अपनाने पर गंभीर विचार किया जाए। विवाह निमंत्रण पत्र पर जन्मतिथि छापने का नियम, डिजिटल सत्यापन प्रणाली, सेवा प्रदाताओं की जवाबदेही, सामुदायिक निगरानी और तकनीकी रिपोर्टिंग जैसे उपाय मिलकर एक ऐसा मॉडल तैयार कर सकते हैं जो बाल विवाह उन्मूलन की दिशा में निर्णायक साबित हो।
-संकलनकर्ता लेखक - क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318
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