भारतीय कोचिंग सेंटरों से स्कूलों तक: कब मिलेगी सुशासन की सौगातें? कब रुकेंगी लापरवाही से होने वाली सामूहिक मौतें?

 लखनऊ मांगे जवाब: अग्निकांड या व्यवस्था की विफ़लता का हत्याकांड? -समग्र व्यापक विश्लेषण

गोंदिया - वैश्विक स्तरपर 22 जून 2026 को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक कोचिंग सेंटर में लगी भीषण आग ने पूरे देश को झकझोर दिया। इस दर्दनाक हादसे में 15 लोगों की मौत हो गई और अनेक लोग घायल हुए। घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या भारत में शिक्षा संस्थानों, व्यावसायिक भवनों और सार्वजनिक परिसरों में सुरक्षा नियम केवल कागजों तक सीमित रह गए हैं? दुखद तथ्य यह है कि यह कोई पहली घटना नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों में ऐसे अनेक हादसे हुए हैं जिनमें सैकड़ों लोगों ने अपनी जान गंवाई, लेकिन हर त्रासदी के बाद कुछ समय तक चर्चा होती है और फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र पूरे भारत को बताना चाहूंगा क़ि ध्यान देने योग्य बात है यह है कि इन सभी घटनाओं में एक समानता स्पष्ट दिखाई देतीहै,सुरक्षा नियमों की अनदेखी, अवैध निर्माण, अग्निशमन उपकरणों का अभाव, आपातकालीन निकास मार्गों की कमी और प्रशासनिक लापरवाही।हर हादसे के बाद जांच समितियां बनती हैं,दोषियों पर कार्रवाई की घोषणा होती है,लेकिन समय बीतने के साथ मामला ठंडा पड़ जाता है। परिणाम स्वरूप अगली त्रासदी किसी नए शहर, नए संस्थान और नए पीड़ितों के साथ सामने आ जाती है।लखनऊ हादसे से पहले जुलाई 2024 में दिल्ली के ओल्ड राजेंद्र नगर स्थित एक प्रसिद्ध कोचिंग संस्थान के बेसमेंट में जलभराव के कारण तीन प्रतिभाशाली छात्रों की मृत्यु हो गई थी। इस घटना ने कोचिंग उद्योग में अवैध निर्माण और सुरक्षा मानकों की अनदेखी को उजागर किया था। इसके पहले मई 2019 में गुजरात के सूरत स्थित तक्षशिला कोचिंग सेंटर में लगी आग में 22 छात्र- छात्राओं की जान चली गई थी। कई विद्यार्थियों ने जान बचाने के लिए ऊंची इमारत से छलांग लगा दी थी, जिसकी तस्वीरें पूरे देश को विचलित कर गई थीं। इस तरह की पिछले वर्षों में अनेक घटना हुई है जिन्हें नीचे पैराग्राफ में इतिहास के रूप में बताया गया है।आज आवश्यकता केवल शोक व्यक्त करने की नहीं, बल्कि कठोर और निरंतर कार्रवाई की है। प्रत्येक कोचिंग सेंटर, स्कूल, अस्पताल, मॉल, सिनेमा हॉल और व्यावसायिक भवन का नियमित सुरक्षा ऑडिट अनिवार्य किया जाना चाहिए। नियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों के लाइसेंस तत्काल निरस्त किए जाने चाहिए। जब तक सुरक्षा को लागत नहीं बल्कि जीवन रक्षा का अनिवार्य दायित्व नहीं माना जाएगा, तब तक लखनऊ, दिल्ली, सूरत, राजकोट और कुंभकोणम जैसी त्रासदियां दोहराती रहेंगी। देश को अब यह तय करना होगा कि विकास की इमारतें सुरक्षा की मजबूत नींव पर खड़ी हों, न कि लापरवाही की आग में झुलसते मानव जीवन की सटीकता से  कीमत पर।

साथियों, भारत में जिला कलेक्टर या जिलाधिकारी प्रशासन का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है। उनके पास कानून-व्यवस्था,आपदा प्रबंधन,विकास कार्यों और विभिन्न विभागों के समन्वय की जिम्मेदारी होती है। यदि प्रत्येक जिले में जिलाधिकारी नियमित रूप से स्कूलों, कॉलेजों, कोचिंग संस्थानों,सिनेमा हॉलों अस्पतालों मॉलों और भीड़भाड़ वाले व्यावसायिक प्रतिष्ठानों का औचक निरीक्षण करें तो सुरक्षा मानकों के पालन को लेकर एक सकारात्मक दबाव बनाया जा सकता है। जब निरीक्षण केवल कागजों पर नहीं बल्कि वास्तविक रूप से होने लगेंगे, तब नियमों की अवहेलना करने वालों में भय उत्पन्न होगा। यह केवल दंडात्मक व्यवस्था नहीं बल्कि जीवन रक्षा की रणनीति होगी। यहीं पर दिनांक 23 जून 2026 को 2024 क़े 183 प्रशिशु ऑफीसरों को संबोधित करते हुए पीएम  द्वारा युवा सिविल सेवकों को दिया गया संदेश अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है। उन्होंने कहा कि लोक सेवा की असली परीक्षा ईमानदारी, संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता के साथ वास्तविक परिस्थितियों को संभालने में है। उन्होंने नागरिक देवो भव का मंत्र देते हुए कहाकि प्रत्येक प्रशासनिक फाइल के पीछे किसी व्यक्ति की उम्मीदें, चिंताएं और जीवन छिपा होता है। यदि इस विचार को वास्तविक प्रशासनिक संस्कृति का हिस्सा बना लिया जाए तो शायद ऐसी घटनाओं की संख्या में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। क्योंकि किसी भवन की फाइल केवल कागज का टुकड़ा नहीं होती, वह उन सैकड़ों लोगों के जीवन से जुड़ी होती है जो उस भवन का उपयोग करने वाले हैं।

साथियों, यदि हम इतिहास पर नजर डालें तो 13 जून 1997 का दिल्ली का उपहार सिनेमा अग्निकांड आज भी देश के सबसे दर्दनाक हादसों में गिना जाता है। आग लगने के बाद आपातकालीन निकास मार्गों की कमी और अव्यवस्था के कारण 59 लोगों की मौत हो गई थी। वर्ष 2004 में तमिलनाडु के कुंभकोणम में एक विद्यालय में आग लगने से 94 मासूम बच्चों की मृत्यु हुई थी। फूस की छत और सुरक्षा प्रबंधों के अभाव ने इस त्रासदी को और भयावह बना दिया था।दिसंबर 2011 में कोलकाता के एएमआरआई अस्पताल में लगी आग ने स्वास्थ्य क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्थाओं की पोल खोल दी थी। इस हादसे में 90 से अधिक मरीजों और कर्मचारियों की मौत हुई। वर्ष 2016 में भुवनेश्वर के सुमा अस्पताल में भी आग लगने से 25 से अधिक लोगों की जान चली गई। अस्पताल जैसे संवेदनशील संस्थानों में भी सुरक्षा मानकों की घोर उपेक्षा सामने आई।दिसंबर 2019 में दिल्ली की अनाज मंडी स्थित एक फैक्ट्री में आग लगने से 43 मजदूरों की मृत्यु हो गई थी। संकरी गलियां, अवैध निर्माण और अपर्याप्त निकास मार्ग इस त्रासदी के प्रमुख कारण बने। मुंबई के कमला मिल्स कॉम्प्लेक्स में 2017 में लगी आग में 14 लोगों की जान चली गई, जबकि मई 2024 में गुजरात के राजकोट स्थित टीआरपी गेम जोन में लगी आग ने 27 से अधिक लोगों की जान ले ली। जांच में पाया गया कि कई सुरक्षा नियमों का पालन नहीं किया गया था। 

साथियों, यह घटनाएं केवल आग की दुर्घटनाएं नहीं है, बल्कि यह उस प्रशासनिक, नियामक और नैतिक विफलताओं का प्रतीक है जो वर्षों से देश के अनेक शहरों में पनप रही है। लखनऊव संपूर्ण भारत की हर आंख नम है, हर परिवार स्तब्ध है और हर नागरिक के मन में एक ही प्रश्न गूंज रहा है,क्या यह केवल अग्निकांड था या फिर लापरवाही,भ्रष्टाचार और नियमों की अनदेखी से हुआ एक संस्थागत हत्याकांड? प्रारंभिक जांच में सामने आए तथ्य किसी भी संवेदनशील समाज को झकझोरने के लिए पर्याप्त हैं। जिस भवन में यह हादसा हुआ,उसे मूल रूप से आवासीय उपयोग के लिएस्वीकृति मिली थी। लगभग 1992 वर्गफुट क्षेत्रफल वाली इस इमारत का नक्शा वर्ष 2014 में आवासीय भवन के रूप में पास हुआ था। बाद में यहां व्यावसायिक गतिविधियां शुरू हो गईं। भवन में कोचिंग, गेमिंग स्टूडियो, एनीमेशन स्टूडियो तथा अन्य व्यावसायिक गतिविधियां संचालित की जा रही थीं। सबसे गंभीर तथ्य यह है कि आग लगने के बाद छात्र जब अपनी जान बचाने के लिए ऊपर की ओर भागे तो छत का दरवाजा बंद मिला। निकास का केवल एक मार्ग था। बायोमेट्रिक एक्सेस सिस्टम भी काम नहीं कर पाया। परिणामस्वरूप अधिकांश लोगों की मौत आग से नहीं बल्कि धुएं में दम घुटने से हुई। यह स्थिति किसी प्राकृतिक आपदा की नहीं बल्कि मानवीय लापरवाही की कहानी कहती है। 

साथियों इस घटना के बाद मुख्यमंत्री ने सख्त रुख अपनाते हुए विशेष जांच दल का गठन किया, अधिकारियों को निलंबित किया और अवैध निर्माण को ध्वस्त करने के आदेश दिए।पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर कई लोगों को गिरफ्तार भी किया है।पीएम द्वारा मृतकों के परिजनों को आर्थिक सहायता की घोषणा की गई है। यह सभी कदम आवश्यक हैं, लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि 2016 में ही इस भवन के खिलाफ अवैध निर्माण का मामला दर्ज हो चुका था और ध्वस्तीकरण का आदेश भी जारी हो गया था,तो फिर 2026 तक यह भवन कैसे संचालित होता रहा? आखिर किसकी निगरानी में नियमों की इतनी खुली अवहेलना होती रही? यदि किसी भवन को खतरनाक या अवैध घोषित किया गया था तो वहां सैकड़ों छात्रों की आवाजाही क्यों जारी रही? इन सवालों के उत्तर केवल एक भवन या एक शहर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे देश की प्रशासनिक संस्कृति पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। 

साथियों, वास्तव में पिछले कुछ वर्षों में भारत के विभिन्न हिस्सों में हुई अनेक त्रासदियों का अध्ययन करने पर एक भयावह समानता दिखाई देती है।चाहे वह 2019 का सूरत तक्षशिला कोचिंग सेंटर अग्निकांड हो, 2024 का दिल्ली ओल्ड राजेंद्र नगर कोचिंग हादसा हो, 2024 का राजकोट टीआरपी गेम जोन अग्निकांड हो, 2019 की दिल्ली अनाज मंडी फैक्ट्री आग हो, 2017 का कमला मिल्स हादसा हो, 2011 का एएमआरआई अस्पताल अग्निकांड हो या 2004 का कुंभकोणम स्कूल अग्निकांड हर जगह कुछ बातें लगभग समान रही हैं।अग्निशमन नियमों की अनदेखी,अवैध निर्माण, अतिरिक्त मंजिलों का निर्माण, आपातकालीन निकास मार्गों की कमी, अग्निशमन उपकरणों का अभाव, क्षमता से अधिक भीड़ और प्रशासनिक निगरानी की विफलता। ऐसा लगता है जैसे देश के अलग-अलग शहरों में अलग-अलग समय पर एक ही कहानी बार-बार दोहराई जा रही हो।सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अधिकांश मामलों में दुर्घटना के बाद ही प्रशासन सक्रिय दिखाई देता है। जांच समितियां गठित होती हैं, अधिकारियों को निलंबित किया जाता है,निरीक्षण अभियान शुरू किए जाते हैं और सुरक्षा नियमों की समीक्षा की जाती है। लेकिन यदि यही सक्रियता पहले दिखाई जाती तो शायद अनेक जीवन बचाए जा सकते थे। लखनऊ हादसे के बाद बिहार में कोचिंग संस्थानों का निरीक्षण शुरू हुआ, फायर सेफ्टी की जांच तेज हुई और सुरक्षा मानकों की समीक्षा की जाने लगी। यह कदम स्वागत योग्य है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या ऐसी जांच किसी हादसे की प्रतीक्षा किए बिना नियमित रूप से नहीं हो सकती थी? क्या प्रशासन की जिम्मेदारी केवल दुर्घटना के बाद कार्रवाई करना है या दुर्घटना को रोकना भी उसका दायित्व है? 

साथियों, यह भी आवश्यक है कि सुरक्षा को केवल सरकारी जिम्मेदारी न माना जाए। भवन मालिकों, संस्थान संचालकों, स्थानीय निकायों, अभिभावकों और नागरिक समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। अभिभावकों को यह जानने का अधिकार है कि जिस संस्थान में उनके बच्चे पढ़ रहे हैं वहां अग्निशमन व्यवस्था है या नहीं। छात्रों को भी आपदा प्रबंधन और सुरक्षा प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। नियमित मॉक ड्रिल, आपातकालीन निकास का अभ्यास और सुरक्षा जागरूकता कार्यक्रम जीवन बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

-संकलनकर्ता लेखक - क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318



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