कविता-शिनाख्त: एक मृत गणतंत्र की

 नया सवेरा नेटवर्क

 कविता-

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शिनाख्त: एक मृत गणतंत्र की

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सुनिए सरकार

इस मूक देह से संवाद कीजिए

ज़िंदगी तो कब की तटस्थ हो चुकी

पर यह लाश अब भी धारदार सच की अंतिम गवाह है

खिंच आई है इसकी ठंडी पड़ चुकी पुतलियों में

कत्ल की एक मुकम्मल दास्तान

साहस है तो नज़रें मिलाइए और पढ़िए

हुक्मरानों की चुप्पी और खंजरों का भूगोल

पूछिए इससे उस कातिल का हुलिया

जो सत्ता की गलियों में आज भी बेखौफ है

शिनाख्त कीजिए उस हाथ की

जिसने न्याय की तराजू को अपनी ओर झुका रखा है

पर सावधान रहिएगा

संदेह की सुई जब घूमेगी तो आपके दामन को भी छुएगी

हे सरकार

वक्त की रेत निरंतर फिसल रही है

पूछिए इससे पहले कि यह देह सड़ जाए

क्योंकि जब लाशें सड़ने लगती हैं

तो उनकी गंध तख्तों को हिलाने वाली चीख बन जाती है

इसे किसी लावारिस मवेशी का अवशेष मत समझिए

यह कोई साधारण देह नहीं है

यह जनवरी उन्नीस सौ पचास के छब्बीसवें दिन

बड़ी हसरतों से जन्मे लोक और विश्वास की लाश है

कंधा तो खैर क्या ही देंगे आप इसे

कम से कम इसकी आँखों में जमा सच ही दर्ज कर लीजिए।


शुचि मिश्रा 

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