‘हिन्दी से है हिंदुस्तान’ | #NayaSaberaNetwork


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नया सबेरा नेटवर्क
देश के चार राज्यों से ग्यारह वरिष्ठ, युवा कवियों एवं कवियत्रियों ने की ऑनलाइन काव्यगोष्ठी में किया काव्यपाठ
लखनऊ। सप्रेम संस्थान एवं आस्थाना आर्ट फोरम के संयुक्त तत्वावधान मे हिन्दी सप्ताह पर एक विशेष कवि सम्मेलन एवं परिचर्चा “काव्याभिव्यक्ति” का आयोजन शुक्रवार को हुआ। देश के विभिन्न राज्यों के प्रतिष्ठित शहरों से कुल ग्यारह कवियों ने इस सम्मेलन मे प्रतिभाग किया। जिसमें पुष्पेंद्र कुमार आस्थाना ‘पुष्प’ (वाराणसी,उत्तर प्रदेश),विवेक ‘रफिक’(नई दिल्ली),दिनेश पाण्डेय (आरा, बिहार), विश्वंभर पाण्डेय (आरा, बिहार) गिरीश पाण्डेय (लखनऊ, उत्तर प्रदेश),सुचिता त्रिपाठी (लखनऊ, उत्तर प्रदेश), मुक्तिनाथ मिश्र (नई दिल्ली), स्वेता कृपलानी (लखनऊ, उत्तर प्रदेश), डाo सीमा अग्निहोत्री ‘अदिति’(नई दिल्ली), डाo मीनू मदान (मुबई, महाराष्ट्र),रोहित आस्थाना (वाराणसी,उत्तर प्रदेश) की गरिमामई उपस्थिती मंच पर रही। इस परिचर्चा मे कवि विद्वत जानो ने हिन्दी  विश्व पटल की भाषा बने इस बात के लिए सभी देश वासी द्वारा हिन्दी को गर्व के साथ अपनाये जाने का आवाहन किया। कार्यक्रम का आरंभ करते हुये वाराणसी उत्तर प्रदेश से डॉ पुष्पेंद्र अस्थाना "पुष्प" ने ग़ज़ल की लाइनें पढ़ीं - 
सच्ची पूजा सही बन्दगी देख ली, दूसरे की ख़ुशी में ख़ुशी देख ली।
मुस्कुराने लगे पुष्प पतझड़ में भी, शाख सुखी भी होती हरी देख ली।। 
नई दिल्ली से विवेक रफ़ीक ने " धीरे धीरे प्यार को दिल मे जगाते जाइए, नफरतों को थपकियाँ देकर सुलाते जाइए।“
गिरीश पाण्डेय ने अपनी कविता में हिन्दी का सम्मान करते हुये, शीर्षक ‘मेरी माँ का आँचल है हिन्दी’ एवं ‘स्वर्ण कमल सी पंक्तियाँ’ काव्य का पाठ कराते हुये कहा कि “ मेरे देश मे मेरी हिन्दी का, अस्तित्व अलग कुछ ऐसा है। मिट्टी लिपटे बच्चे के सिर एक माँ के आँचल जैसा है”।
आरा बिहार से दिनेश पांडेय जी ने अपनी रचना " 
“हिंदी से है हिंद बना, हिंदी से बना है हिन्दुस्तान,” का पाठ किया। 
आरा बिहार से ही विश्वम्भर पांडेय ने अपनी रचना प्रस्तुत करते कहा कि  
“यूँ तो भाषाएँ हैं अनेक, सबकी गरिमा है सभी नेक। 
चांदी सी चमक रही हिन्दी, हिन्दी माथे की है बिंदी।“ 
शुचिता त्रिपाठी की रचना गुलमोहर का पाठ करते कहा-
 “ शायद तुमने कभी बोला था, गुलमोहर मेरा पसन्दीदा पेड़ है। तभी से वो मेरा प्रिय हो गया, तुम्हें पता है.......
  अब मैं कहीं भी ज़ाती, मेरी आँखें गुलमोहर ढूँढ ही लेतीं, या यूँ कहो अब सारे पेड़ मुझे, गुलमोहर ही लगते....”
वाराणसी से युवा कवि रोहित अस्थाना ने अपनी रचना 
"भारत हमारी आन है, भारत हमारी शान है।
इसपर हमें अभिमान है, इसपर फ़िदा ये जान है।“ का उत्साह पूर्वक पाठ किया। 

मुम्बई से मीनू मदान ने अपनी रचना का सुमधुर स्वरों में पाठ कराते हुये कहा कि 
"वह हिंदी है,
गांधी और पटेल ने हिंदी की ताकत को पहचाना, काका कलेलकर ने हिंदी सेवा एक धरम माना। 
भारत के कोने-कोने ने हिंदी को अपनाया है, दयानन्द से लेकर विद्यासागर ने यश गाया है।  
डॉ सीमा अग्निहोत्री चड्ढा ‘अदिति’ ने अपनी रचना पढ़ी "हिंदी से है हिंदुस्तान। हिंदी है अपनी पहचान। 
हिंदी है तो होगा भारत , हिंदी से है हिंदुस्तान।
लखनऊ उत्तर प्रदेश से श्वेता कृपलानी की रचना " जीवन सीमित है, और पल असीमित, चलो जीते हैं कुछ क्षण अशेष।वैभव खूब जीया, इस दरिद्र मन से, चलो आज धारण करते हैं वो वैराग्य अशेष।
दिल्ली से पधारे मुक्तिनाथ मिश्रा ने अपनी रचना के माध्यम से अपने खूबसूरत उद्गार व्यक्त करते कहा कि –
“ ऐ बावरी कलम सच ना लिखना, सच का सच ये है कि सच ना लिखना।
जो जिम्मेदार है बस उनके गुनाह, उनके चालो - चलन को ना लिखना।
तन सफेद काले आदर्शों वाले, सत्ता के इस मरण को ना लिखना।
कार्यक्रम का सञ्चालन गिरीश पांडेय ने किया अंत में सभी उपस्थित कवियों का आभार भूपेंद्र कुमार अस्थाना ने किया |

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