समाज में धर्म, क्षेत्र, भाषा, पंथ, रंग या जाति से परे हम भारतीय हैं की सोच को बढ़ावा देना जरूरी - एड किशन भावनानी | #NayaSaberaNetwork

अध्यात्मिकता भारत की महान संस्कृति की प्रमुख कुंजी है - हर व्यक्ति सच्ची भावना से अपने धर्म का पालन करें तो धार्मिक, जातीय संघर्ष कभी नहीं होगा 
गोंदिया - भारत हज़ारों वर्ष पूर्व से ही महान संस्कृति की खान, अध्यात्मिकता की पहचान, संतों महात्माओं, गुरुओं की जन्मस्थली और एक सोने की चिड़िया के रूप में प्रख्यात ख़ूबसूरत देश है। बुजुर्गों के अनुसार हमारी भारतीय संस्कृति हज़ारों वर्ष पुरानी है और एकीकृत भारत की ख़ूबसूरती पर उस समय विदेशी शासकों की नज़र लगी और भारत को अपने अधीन किया। फिर भी भारतीय अध्यात्मिकता, आस्था, संस्कृति बनी रही जो अभी तक है हालांकि इस बीच मानवीय विचारों की परिस्थिति कुछ इस तरह बदली कि 1947 में भारत दो भागों में विभाजित हो गया,जो आज पड़ोसी मुल्कों के रूप में है...। साथियों बात अगर हम वर्तमान समय की करें तो भारत में आज भी वही धर्म, जातियां, भाषाएं, अनेकता में एकता के रूप में जस की तस ही है। परंतु माहौल कुछ इस तरह बदल गया है कि आज जातिगत, उपजाति, अवस्था पनपते जा रही है। हमने वर्षों पूर्व मंडल, कमंडल की स्थिति और उत्पन्न हिंसा देखें जो आज भूल नहीं सके हैं। अभी वर्तमान परिवेश में हम प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से सुन व देख रहे हैं कि जातिगत जनगणना, जातिगत आरक्षण, धर्म को लेकर कुछ बातों की चर्चा हमारे संज्ञान में आ रही है। हालांकि हर धर्म, समाज जाति में वहां के संस्कार इस बात की आज्ञा कभी नहीं देते कि इन बातों को लेकर कोई जातिगत,भाषाई या आरक्षण का दुवेश करे। हालांकि हमारे धर्म हमें धार्मिक संघर्ष नहीं सिखाते। हमारा देश हर भारतीय के लिए अध्यात्मिकता भारत की महान संस्कृति की प्रमुख कुंजी है। अगर हर व्यक्ति सच्ची भावना से अपने धर्म का पालन करें तो हम विश्वास के साथ कह सकते हैं कि, धार्मिक संघर्ष की स्थिति कभी उत्पन्न होगी ही नहीं, बल्कि हम सभी को भारतीयता की माला के धागे में पिरोकर एक भारतमाला बनकर रहना है, और अनेकता में एकता का भारतीय गुण कायम रखना है...। साथियों बात अगर हम वर्तमान राजनीतिक परिवेश के नज़रिए से इस विषय को देखें तो हमें महसूस होता है कि इस क्षेत्र में जातिगत रणनीति अधिक हावी होती दिख रही है। हालांकि खुलकर कोई पक्ष इस संबंध में नहीं कहेंगे परंतु, हक़ीक़त यह है कि परिपक्वता से यदि इन समीकरणों पर तालमेल बिठाकर रणनीतिक रोडमैप नहीं बनाएंगे तो पक्ष, विपक्ष सफलता प्राप्त नहीं कर सकेंगे, इसलिए न चाहते हुए भी जातिगत, भाषाई, धर्म का गणित संबंधित पक्षों को बैठाना पड़ता है...। साथियों बात अगर हम नागरिक अपने ऊपर लेकर निर्णय करेंतो स्थिति को हम बदल सकते हैं इसका निर्णय हम नागरिकों को करना है कि जाति भाषा और धर्म को आड़े नहीं आने देना है। भारत के उपराष्ट्रपति ने भी दिनांक 4 सितंबर 2021 को एक कुछल व्यक्तित्व के फोटो प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर अपने संबोधन में, आज लोगों से उन विभाजनकारी ताकतों केखिलाफ लड़ने का आह्वाहन किया, जो समाज को धर्म, क्षेत्र, भाषा,जाति पंथ या रंगके आधारपर विभाजित करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि हमारी आजादी के 75वें वर्ष में प्रत्येक भारतीय को हमारे बहुत अधिक विविध समाज में एकता व सद्भाव को और मजबूत करने का संकल्प लेना चाहिए। आगे कहा कि, भारत के आध्यात्मिक ज्ञान की समृद्ध विरासत के संदर्भ में फिर से एक पुनर्जागरण होने की जरूरत है, जिसे वैश्विक स्तर पर प्रासंगिक बनाने और समकालीन समय को ध्यान में रखते हुए नए रूपों व अभिव्यक्तियों में पुनर्निर्माण की आवश्यकता होगी। यह बताते हुए कि भारत माता को अपने स्वयं के खजाने में गहराई तक उतरने की जरूरत है, उन्होंने भारतीय युवाओं को अपनी सोच में स्वतंत्र और मौलिक होने का आह्वाहन किया, पश्चिम के मामूली नकलची के रूप में संतुष्ट होने की जगह स्वदेशी स्रोतों का उपयोग करने को कहा। उन्होंने युवा पीढ़ी के बीच हमारी गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत में गर्व की भावना पैदा करने के लिए भारतीय परिप्रेक्ष्य के साथ भारतीय इतिहास को फिर से लिखने का भी आह्वाहन किया। इस बात पर जोर देते हुए कि शिक्षा केवल रोजगार के लिए नहीं, बल्कि ज्ञान के लिए है, उपराष्ट्रपति ने भारत को फिर से विश्व गुरु बनाने का आह्वाहन किया। उन्होंने कहा, भारत को दुनिया पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए नहीं, बल्कि ज्ञान देने व प्रकाश फैलाने के लिए विश्व गुरु बनना चाहिए। उन्होंने अध्यात्मिकता को भारत की महान संस्कृति की प्रमुख कुंजी बताया और इसे हमारे दैनिक जीवन में पुनर्जीवित करके इसकी महानता को फिर से खोजने का आह्वाहन किया।उन्होंने कहा, पूरी मानव जाति को यह महसूस करने की जरूरत है कि आज जो आवश्यक है, वह केवल भौतिक धन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक संपत्ति भी है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत के भविष्य की महानता के लिए सभी विभाजनों को समाप्त करना जरूरी है। धर्म के सकारात्मक पहलुओं को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि अगर हर कोई अपने धर्म का सच्ची भावना से पालन करता है, तो कोई धार्मिक टकराव नहीं होगा। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि अध्यात्मिकता भारत की महान संस्कृति की प्रमुख कुंजी है। हर व्यक्ति सच्ची भावना से अगर अपने धर्म का पालन करें तो धार्मिक संघर्ष कभी नहीं होगा तथा समाज में धर्म, क्षेत्र, भाषा, पंथ, रंग या जाति से परे हम भारतीय हैं, ऐसी सोच को बढ़ावा देना जरूरी है।  

-संकलनकर्ता- कर विशेषज्ञ एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र


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