धार्मिक ट्रस्ट के खिलाफ वैधानिक कार्यवाही को भगवान के खिलाफ कार्यवाही मानने से अधिकारी बचें - वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने की आवश्यकता - हाईकोर्ट | #NayaSaberaNetwork

धार्मिक ट्रस्ट के खिलाफ वैधानिक कार्यवाही को भगवान के खिलाफ कार्यवाही मानने से अधिकारी बचें - वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने की आवश्यकता - हाईकोर्ट | #NayaSaberaNetwork


नया सबेरा नेटवर्क
भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश - संविधान और कानून के दायरे में भारत की कार्यप्रणाली विश्वप्रसिद्ध है - एड किशन भावनानी
गोंदिया - भारत में अनेक धर्मों और जातियों के नागरिक भारतीय संविधान के दायरे में व केंद्रीय, राज्यस्तरीय एवं केंद्रशासित प्रदेश स्तरीय कानूनों के दायरों में एक साथ रहते हैं। यह भारत की विश्वप्रसिद्ध खूबियों में से एक है। वास्तव में यह कार्यपालिका व न्यायपालिका की तारीफ ए काबिल व्यवस्था है और इतने धर्म, जातियों, के बीच बड़ी खूबसूरती से तालमेल स्थापित कर विकास के पहिए को तीव्रता से आगे ले जाना बहुत सराहनीय कार्य है। भारतीय प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से अक्सर हम पढ़ते और सुनते हैं कि फलां धार्मिक ट्रस्ट(जो किसी भी जाति धर्म विशेष की हो) में यह चार बातें अवैधानिक है, जिसका उसमें उसका स्वामित्व, जमीन का स्वामित्व, प्रबंधन या अनेक ऐसी और बातें हैं जो उठाई जाती हैं और फिर मामला अदालतों की चौखट तक पहुंच जाता है और फिर ट्रायल कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक बात जा पहुंचती है।.... ऐसा ही एक मामला माननीय बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच में माननीय दो सदस्यीय बेंच जिसमें माननीय न्यायमूर्ति डी के नलवाडे और माननीय न्यायमूर्ति एम जी सेवालीकर की बेंच के सम्मुख आया, क्रिमिनल रिट पिटिशन क्रमांक 691/2019 याचिकाकर्ता बनाम महाराष्ट्र राज्य हस्ते, प्रिंसिपल सेक्रेटरी, गृह विभाग व चार अन्य के रूप में आया जो 15 जनवरी 2021 को सुनवाई पूर्ण कर फैसला रिजर्व रखा गया था, जिसकी घोषणा बुधवार 3 फरवरी 2021 को की गई जिसका माननीय बेंच ने अपने 26 पृष्ठों और 23 प्वाइंटों के आदेश में  बेंच ने कहा है कि पुलिस और न्यायिक अधिकारियों समेत पूरे सरकारी अमले को धर्मनिरपेक्ष भावना से काम करना चाहिए और धार्मिक भावनाओं से जुड़े मसले परेशानी पैदा कर सकते हैं, ऐसे सामान्य भय से बचना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि अधिकारियों को 'वैज्ञानिक दृष्टिकोण' रखने की आवश्यकता है और धार्मिक ट्रस्ट के खिलाफ वैधानिक कार्रवाई को भगवान के खिलाफ कार्रवाई मानने से बचना चाहिए। अदालत ने तदनुसार एक सार्वजनिक ट्रस्ट, के ट्रस्टियों के खिलाफ साजिश, धोखाधड़ी, गबल, विश्वासघात और काला जादू अधिनियम के तहत अपराध दर्ज करने का पुलिस को निर्देश दिया। माननीय बेंच ने याचिकाकर्ता की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई की, जिसमें उन्होंने ट्रस्ट के ट्रस्टियों पर 'अवैध कृत्य' करने का आरोप लगाया था। याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि 2011 के बाद से, ट्रस्टियों ने सुवर्ण यंत्रों के नाम पर समारोहों पर 25 लाख रुपए अतिरिक्त खर्च किया है और 2 किलोग्राम सोना दबा दिया है। याचिकाकर्ता ने वर्तमान मामले को उठाने में विभिन्न अधिकारियों की निष्क्रियता पर प्रकाश डाला। उन्होंने दलील दी कि ट्रस्ट के पदेन सदस्यों के रूप मे दो पॉवरफुल अधिकारियों की उपस्थिति के बावजूद ऐसे कृत्य किए गए। अदालत ने इस संबंध में कहा,यह आश्चर्य की बात है कि जब तक वो पॉवरफुल व्यक्ति ट्रस्ट के सदस्य थे, तब भी उन्होंने श्री शिंदे द्वारा‌ दिए गए सभी प्रस्तावों को स्वीकार किया। इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति (एएनआईएस) की शिकायत को दर्ज करने में पुलिस की निष्क्रियता पर भी अदालत का ध्यान आकर्षित किया। उस संबंध में, अदालत ने वर्तमान मामले में एएनआईएस के हस्तक्षेप की अनुमति दी और निर्देश दिया कि जांच शुरू करने के लिए उक्त शिकायत को आधार माना जाए। कोर्ट ने कहा,सामान्य भय विभिन्न प्रकार के हो सकते हैं, जैसे कि वे परेशानी पैदा कर सकते हैं क्योंकि मामले में धार्मिक भावनाएं शामिल हैं और इसे ईश्वर के खिलाफ कार्रवाई के रूप में देखा जा सकता है।भारत के संविधान के अनुच्छेद 51-ए को देखते हुए, यह न्यायालय यह मानता है कि अधिकारियों से ऐसे मामले में धर्मनिरपेक्ष भावना के साथ काम करने की उम्मीद की जाती है और उन्हें 'सच्चाई' का पालन करने की आवश्यकता है। आधिकारियों को ऐसे मामलों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने की आवश्यकता है और उन्हें कानून के प्रावधानों का पालन करने की आवश्यकता है। बेंच ने कहा कि ट्रस्ट की योजना यंत्रों के नाम पर सोने को दफनाने और समारोहों की अनुमति नहीं देती है। महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट एक्ट, 1950 के का उद्देश्य इस प्रकार ट्रस्टों के प्रशासन की गड़बड़‌ियों को रोकना है। बेंच ने आगे कहा कि ट्रस्टियों का, योगिनियों और तंत्रों के बारे में कहानियों का फैलाने का कार्य,काला जादू अधिनियम के दायरे में आता है। कोर्ट ने कहा,ट्रस्टियों के व्यक्तिगत विश्वास हो सकते हैं, लेकिन उनकी व्यक्तिगत मान्यताओं का उपयोग ट्रस्ट के प्रबंधन में नहीं किया जा सकता है। जो व्यक्ति प्रबंधन में है, उसे कुछ हासिल करने के लिए वर्तमान मामले में किए गए तरीके से संपत्ति को खर्च करने या निस्तारण करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है, जिसे वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं किया जा सकता है। बेंच ने ट्रस्टियों द्वारा कुप्रबंधन किए जाने के मामले में बढ़ती शिकायतों पर भी नाराजगी व्यक्‍त की और कहा, यदि कोई ऐसी गतिविधि का विरोध करता है तो उसकी यह कहकर निंदा की जाती है कि वह धार्मिक भावनाओं को आहत कर रहा है। ऐसी घटनाओं के बढ़ने के कारण, ऐसे ट्रस्टियों को सबक सिखाने का समय आ गया है। इस तरह की कार्रवाई से वर्तमान गतिविधि जैसी गतिविधियों को रोका जा सकेगा और इससे अंधविश्वास पर रोक लगाने में भी मदद मिलेगी।प्रतिवादियों ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत सुरक्षा की मांग के लिए मिसालों पर भरोसा किया। हालांकि, कोर्ट ने उन दलीलों को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट एक्ट और ब्लैक मैजिक एक्ट जैसे कानून, प्रतिबंधों की प्रकृति के हैं, जिन्हें कानून ने लागू करने के लिए चुना है। न्यायालय ने अधिकारियों द्वारा कार्रवाई नहीं करने की कड़ी निंदा की, और अधिकारियों के लिए 'धर्मनिरपेक्ष भावना' और 'सच्चाई का पालन करने' के साथ काम करना अनिवार्य समझा।बेंच ने मामले में अपराध दर्ज करने का निर्देश दिया, और आदेश दिया कि जांच अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक या पुलिस उपाधीक्षक रैंक का पुलिस अधिकारी करे। कोर्ट ने प्रतिवादियों के वकील द्वारा आदेश पर रोक लगाने की राहत देने से इनकार कर दिया।
संकलनकर्ता कर विशेषज्ञ एड किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

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