-डिजिटल लोकतंत्र को बचाने के लिए नया कानूनी ढांचा क्यों जरूरी? -समग्र व्यापक विश्लेषण
गोंदिया - वैश्विक स्तरपर आज का युग सूचना,संचार और डिजिटल तकनीक का युग है। मोबाइल फोन,इंटरनेट और सोशल मीडिया ने समाज में सूचना के प्रवाह को अभूतपूर्व गति प्रदान की है।कभी समाचारों के प्रसार का दायित्व मुख्यतः समाचारपत्रों, रेडियो,टेलीविजन और प्रशिक्षित पत्रकारों के हाथों में होता था, लेकिन आज प्रत्येक मोबाइलधारी व्यक्ति सूचना का उपभोक्ता ही नहीं, बल्कि उसका निर्माता,प्रसारक और प्रभावकर्ता भी बन गया है।यह परिवर्तन लोकतंत्र के लिए अनेक अवसर लेकर आया है।आम नागरिक को अपनी बात सार्वजनिक मंच तक पहुंचाने का अधिकार मिला,शासन की गतिविधियों पर निगरानी बढ़ी,जनसमस्याएं तेजी से सामने आने लगीं और सामाजिक भागीदारी का विस्तार हुआ। किंतु मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र अधिवक्ता होने के नाते यह कहना चाहूंगा कि तकनीक की यही शक्ति अब एक गंभीर चुनौती भी बन रही है।फर्जी समाचार,भ्रामक सूचनाएं, कृत्रिम बुद्धिमत्ता से निर्मित तस्वीरें,नकली आवाजें और डीपफेक वीडियो सत्य, विश्वास और लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने नई परीक्षा खड़ी कर रहे हैं।भारत ने वर्ष 2026 में सूचना प्रौद्योगिकी नियमों में संशोधन कर सिंथेटिकली जनरेटेड इंफॉर्मेशन अर्थात कृत्रिम या एल्गोरिद्मिक रूप से निर्मित अथवा परिवर्तित सामग्री के संबंध में नियामक ढांचे को मजबूत किया है। इन संशोधनों में एआई-निर्मित सामग्री की पहचान, स्पष्ट लेबलिंग और डिजिटल मध्यस्थों की जवाबदेही परविशेष ध्यान दिया गया है। सरकार ने मार्च 2026 में भी प्लेटफॉर्मों को भ्रामक, अपमान जनक और हानिकारक कृत्रिम सामग्री के संबंध में परामर्श जारी किया। यह महत्वपूर्ण कदम है, क्योंकि डिजिटल सामग्री का प्रभाव उसकी गति से जुड़ा होता है। यदि कोई झूठा वीडियो कुछ घंटों में लाखों लोगों तक पहुंच जाए, तो बाद में उसे हटाने के बाद भी उसका सामाजिक और मानसिक प्रभाव बना रह सकता है। विश्व स्तर पर यूरोपीय संघ का एआई एक्ट पारदर्शिता आधारित नियमन का एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है। 2 अगस्त 2026 से एआई एक्ट के अनुच्छेद 50 के अंतर्गत कुछ जनरेटिव एआई प्रणालियों और डीपफेक सामग्री के लिए पारदर्शिता संबंधी दायित्व लागू हुए हैं।
साथियों बात अगर हम इस तकनीकी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंसी के युग में पत्रकारिता को समझने की करें तो इसका मूल संबंध जनसरोकारों से है।पत्रकारिता केवल घटनाओं का वर्णन नहीं,बल्कि समाज की चेतना, जनहित की रक्षा और लोकतांत्रिक जवाबदेही का माध्यम है।कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका लोकतांत्रिक शासन के तीन प्रमुख आयाम हैं,जबकि पत्रकारिता इन संस्थाओं की गतिविधियों को जनता तक पहुंचाकर पारदर्शिता,सत्य और जवाबदेही को मजबूत करती है। यही कारण है कि स्वतंत्र और जिम्मेदार पत्रकारिता को राष्ट्र का चौथा स्तंभ कहा जाता हैपत्रकारिता निरंकुशता पर प्रश्न उठाती है, सत्ता के दुरुपयोग को उजागर करती है, वंचितों और पीड़ितों की आवाज बनती है तथा मानवीय मूल्यों की पक्षधरता करती है। हिंदी पत्रकारिता के लगभग दो शताब्दियों के इतिहास ने भी यह सिद्ध किया है कि पत्रकारिता केवल सूचना का व्यवसाय नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्रीय चेतना की महत्वपूर्ण शक्ति है।
साथियों, लेकिन आज पत्रकारिता के सामने चुनौती केवल समाचारों की गति नहीं,बल्कि सत्य की पहचान है।आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने ऐसी तकनीक विकसित कर दी है,जो किसी व्यक्ति के चेहरे,आवाज,हावभाव और बोलने की शैली की अत्यंत वास्तविक प्रतीत होने वाली प्रतिकृति तैयार कर सकती है।किसी नेता, न्यायाधीश पत्रकार, अभिनेता,अधिकारी या सामान्य नागरिक को ऐसा बोलते या करते हुए दिखाया जा सकता है, जो उसने कभी कहा या किया ही नहीं। जब कृत्रिम सामग्री वास्तविकता जैसी दिखाई देने लगे, तब सामान्य नागरिक के लिए सत्य और असत्य में अंतर करना कठिन हो जाता है। यही डीपफेक की सबसे गंभीर चुनौती है, यह केवल झूठी सूचना नहीं बनाता, बल्कि झूठ को विश्वसनीय दृश्य और श्रव्य रूप देकर उसे सटीकता से सत्य जैसा प्रतीत कराता है।
साथियों, फर्जी खबर और डीपफेक में तकनीकी अंतर हो सकता है, लेकिन दोनों का अंतिम प्रभाव सार्वजनिक विश्वास को कमजोर करना है। फर्जी खबर सामान्यतः ऐसी गलत, भ्रामक या मनगढ़ंत सूचना होती है, जिसे जानबूझकर या बिना पर्याप्त सत्यापन के प्रसारित किया जाता है। इसका उद्देश्य राजनीतिक लाभ, आर्थिक लाभ, सामाजिक तनाव, वैचारिक प्रचार या अधिक क्लिक और दर्शक प्राप्त करना हो सकता है। इसके विपरीत डीपफेक कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सहायता से तैयार या परिवर्तित तस्वीर, आवाज अथवा वीडियो है, जिसमें किसी व्यक्ति को ऐसी गतिविधि करते या ऐसा वक्तव्य देते हुए दिखाया जाता है जो वास्तविक नहीं होता। लिखित सूचना पर नागरिक संदेह कर सकता है, लेकिन जब वही सूचना किसी परिचित चेहरे और वास्तविक लगने वाली आवाज के साथ प्रस्तुत हो, तो उसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव कहीं अधिक हो सकता है।यूनेस्को ने डीपफेक को ज्ञान और सत्य को समझने के संकट से जोड़ा है। समस्या केवल नकली सामग्री की पहचान करने की नहीं है, बल्कि ऐसी डिजिटल दुनिया में प्रमाण, स्रोत और विश्वसनीयता की रक्षा करने की भी है, जहां कृत्रिम बुद्धिमत्ता वास्तविकता जैसी सामग्री तैयार कर सकती है।
साथियों, डीपफेक का सबसे बड़ा खतरा यह नहीं कि लोग केवल नकली वीडियो को सच मान लें। इससे भी गंभीर स्थिति तब उत्पन्न होती है, जब लोग वास्तविक वीडियो और वास्तविक प्रमाणों को भी डीपफेक बताकर अस्वीकार करने लगें। यदि किसी व्यक्ति का वास्तविक वीडियो सामने आए, तो वह यह दावा कर सकता है कि उसे एआई द्वारा बनाया या परिवर्तित किया गया है। इस स्थिति को लायर्स डिविडेंड कहा जाताहै,अर्थात तकनीक का ऐसा लाभ, जो झूठ बोलने वाले व्यक्ति को वास्तविक प्रमाणों से बचने का अवसर दे सकता है। परिणामस्वरूप समाज में कुछ भी पूरी तरह सच नहीं है जैसी मानसिकता विकसित हो सकती है। लोकतंत्र केवल मतदान की प्रक्रिया से संचालित नहीं होता; वह साझा तथ्यों, विश्वसनीय सूचना और नागरिक विश्वास पर भी आधारित होता है। यदि सत्य की पहचान ही विवादित हो जाए, तो लोकतांत्रिक संवाद और जनमत दोनों कमजोर पड़ सकते हैं।
साथियों, चुनावों और राजनीतिक व्यवस्था पर डीपफेक का प्रभाव विशेष रूप से गंभीर हो सकता है। किसी चुनाव से कुछ घंटे पहले यदि किसी राजनीतिक नेता का नकली वीडियो प्रसारित किया जाए, जिसमें वह किसी समुदाय के विरुद्ध बयान देता दिखाई दे या किसी संवेदनशील विषय पर विवादित टिप्पणी करता हुआ दिखाया जाए, तो उसका प्रभाव मतदाताओं की सोच पर पड़ सकता है।बाद में तथ्य-जांच या आधिकारिक स्पष्टीकरण आने पर भी गलत सूचना का प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं होता।एआई आधारित माइक्रो-टार्गेटिंग के माध्यम से अलग-अलग नागरिकों को उनकी रुचियों, भावनाओं और डिजिटल व्यवहार के अनुसार अलग राजनीतिक संदेश भेजे जा सकते हैं। इससे सार्वजनिक बहस के स्थान पर व्यक्तिगत मनोवैज्ञानिक प्रभाव का खतरा बढ़ सकता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सोशल मीडिया एल्गोरिद्म और स्वचालित डिजिटल प्रचार भ्रामक सूचना के प्रसार को असाधारण गति दे सकते हैं।
साथियों, भारत जैसे विशाल और बहुभाषी डिजिटल लोकतंत्र में यह चुनौती और व्यापक है। करोड़ों नागरिक मोबाइल और सोशल मीडिया के माध्यम से समाचार प्राप्त करते हैं। डिजिटल विस्तार ने लोकतांत्रिक भागीदारी को मजबूत किया है,लेकिन इसी के साथ फर्जी खबरों और डीपफेक के प्रसार का क्षेत्र भी बढ़ा है। एआई आधारित नकली सामग्री का उपयोग राजनीतिक भ्रम, वित्तीय धोखाधड़ी, नकली विज्ञापन, पहचान की चोरी, मानहानि, सामाजिक तनाव और व्यक्तिगत उत्पीड़न के लिए किया जा सकता है। किसी बैंक अधिकारी, सरकारी अधिकारी, रिश्तेदार या प्रसिद्ध व्यक्ति की आवाज की नकल करके धन या निजी जानकारी मांगी जा सकती है। किसी व्यक्ति की तस्वीर या वीडियो को गलत संदर्भ में प्रस्तुत कर उसकी प्रतिष्ठा और सामाजिक जीवन को गंभीर नुकसान पहुंचाया जा सकता है।
साथियों, फिर भी केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं होगा। डिजिटल अपराधों की कोई निश्चित भौगोलिक सीमा नहीं होती। सामग्री किसी देश में बनाई जा सकती है, किसी दूसरे देश के सर्वर परअपलोड हो सकती है और तीसरे देश के नागरिकों को प्रभावित कर सकती है। इसलिए प्रभावी कानूनी व्यवस्था के साथ तकनीकी पहचान प्रणाली, त्वरित जांच,डिजिटल साक्ष्य संरक्षण, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और सीमा-पार प्लेटफॉर्मों की जवाबदेही भी आवश्यक है। कानून में यह स्पष्ट अंतर होना चाहिए कि कौन-सी एआई सामग्री वैध और रचनात्मक उपयोग के अंतर्गत आती है और कौन-सी सामग्री जानबूझकर धोखा, आर्थिक नुकसान, हिंसा, चुनावी हस्तक्षेप या प्रतिष्ठा को हानि पहुंचाने के लिए बनाई गई है। एआई स्वयं समस्या नहीं है; उसका अनैतिक और हानिकारक उपयोग समस्या है।
साथियों, पत्रकारिता जगत को भी इस तकनीकी युग में आत्ममंथन करना होगा। दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस दिलीप पथपालिया द्वारा पत्रकारिता के नाम पर मोबाइल और माइक के अनियंत्रित उपयोग तथा लोगों को डराने-धमकाने से संबंधित टिप्पणी का व्यापक अर्थ है। प्रेस की स्वतंत्रता लोकतंत्र के लिए अनिवार्य है, लेकिन पत्रकारिता की आड़ में भय पैदा करना, बिना सत्यापन आरोप लगाना, निजी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना या कानून-व्यवस्था को प्रभावित करना स्वतंत्र पत्रकारिता नहीं कहा जा सकता। मोबाइल कैमरे ने नागरिक पत्रकारिता को शक्ति दी है, किंतु इसके साथ जिम्मेदारी भी बढ़ी है। प्रत्येक व्यक्ति जो कैमरा और माइक लेकर सार्वजनिक सामग्री बना रहा है, वह स्वतः पत्रकारिता के नैतिक मानदंडों का पालन नहीं कर रहा होता। पत्रकारिता की पहचान केवल उपकरण से नहीं, बल्कि सत्यापन, निष्पक्षता, जनहित, उत्तरदायित्व और नैतिक आचरण से होती है।
साथियो, डिजिटल लोकतंत्र की सबसे मजबूत सुरक्षा जागरूक नागरिक है। किसी भी सनसनीखेज वीडियो, तस्वीर या संदेश को साझा करने से पहले नागरिक को उसके स्रोत, तिथि, संदर्भ और विश्वसनीयता की जांच करनी चाहिए। क्या किसी प्रतिष्ठित समाचार संस्थान ने इसकी पुष्टि की है? क्या वीडियो का मूल स्रोत उपलब्ध है? क्या आवाज, चेहरे या हावभाव में अस्वाभाविकता दिखाई देती है? क्या संदेश भय या क्रोध उत्पन्न करके तुरंत साझा करने का दबाव बना रहा है? पहले सत्यापन, फिर प्रसारण डिजिटल नागरिकता का मूल सिद्धांत होना चाहिए। विद्यालयों और महाविद्यालयों में मीडिया साक्षरता, तथ्य- जांच और एआई जागरूकता को शिक्षा का अनिवार्य भाग बनाया जाना चाहिए।
-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318



