मुरलीधर पांडेय द्वारा रचित सात सौ दोहों का " मुरली सतसई " दोहा-संग्रह प्रकाशित | #NayaSaberaNetwork

मुरलीधर पांडेय द्वारा रचित सात सौ दोहों का " मुरली सतसई " दोहा-संग्रह प्रकाशित | #NayaSaberaNetwork


नया सबेरा नेटवर्क
भायंदर: भायंदर निवासी हिंदी के मूर्धन्य साहित्यकार  व हिंदी त्रैमासिक पत्रिका " संयोग साहित्य " के प्रकाशक / संपादक पं. मुरलीधर पांडेय द्वारा आज के परिवेश में समाज में, जनमानस में घटनेवाली इर्द-गिर्द घटनाओं, खामियों, कुरीतियों, अव्यवस्थाओं, अमान्यताओं, बुरी संगत, नशाविरोधी, अध्यात्म पक्ष, सदविचार को अपने मानवीय-जीवन में अपनाने के लिए सीधे-सादे सरल शब्दों में लगभग ' सात सौ दोहों की ' रचनाऐं की है। इन सात सौ दोहों का एक संग्रह बना जोकि , ' संयोग प्रकाशन ' द्वारा इसे प्रकाशित किया गया। पं. मुरलीधर पांडेय द्वारा रचित कालजयी दोहा-संग्रह " मुरली सतसई " के रूप में हमारे सम्मुख है। 
गौरतलब है कि, हिंदी सेवी, हिंदी के जाने-माने साहित्यकार पं. मुरलीधर पांडेय 73 जीवन के बसंत देख चुके हैं और इस उम्र में भी उनका " साहित्य सृजन " जारी है। देश भर में सैकड़ों अनगिनत , तमाम अकाडमिक पुरस्कारों- साहित्यिक सम्मानों से पं. मुरलीधर पांडेय की ' साहित्यिक कुटिया ' भरी पड़ी है। आज भी एकदम स्वस्थ शरीर, स्वस्थ विचारों से " साहित्य सृजन कर " देश और समाज को कुछ-न-कुछ दे रहे हैं । उनकी कुल अब तक 14 किताबें गद्य एवं पद्य विधा में किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनका रचना-संसार बड़ा व्यापक है। उन्होंने साहित्य की कोई विधा छोड़ी नहीं है। उनका साहित्यिक पक्ष देखा जाए तो उन्होंने गद्य विधा में कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी, आलेख, व्यंग्य, लघुकथा लिखा है। पद्य विधा में कविता, गीत, दोहे, ग़ज़ल , लोकगीत, आंचलिक गीतों को लिखा है। बाल-जगत देखें तो बाल कहानी बाल उपन्यास, बाल दोहे, बाल गीत, बाल कविता, पाठ्यक्रम के लिए कहानी, बाल एकांकी, बाल नाटक आदि रचनाएं लिखी हैं। शास्त्रीय संगीत बड़ा कठिन होता है। साहित्य के साथ-साथ संगीत विधा के लिए पण्डित मुरलीधर जी ने ध्रुपद, शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, तराना, ठुमरी, मोजरा, दादरा, कजरी, चैती आदि बंदिशों पर गज़ब का रचना-संसार है। इसके अलावा पुस्तक-समीक्षा, सम्पादकीय, भूमिका , टिप्पणी आदि भी सतत लिखते रहते हैं। आध्यत्मिक पक्ष देखें तो भजन, पारंपरिक भजन, सूफ़ी आदि विधाओं में रचना संसार भरा पड़ा है। छंद, क्षणिकाएं, शे'रो शायरी, शिशु गीत, लोरी के अलाई अन्य गतिविधियों में संपादन, प्रकाशन, आयोजन, संचालन, नाट्य निर्देशन, चित्रांकन आदि लंबी कार्यों की लंबी फेरलिस्ट है। अभिनय / गीत व गानों के लेखन के साथ-साथ फ़िल्म-संसार हेतु टर्न द पेज, मेरी परवरिस, रेत का सफ़र, नमक का आंसू , दहलीज़ , मृगनयनी, अनछुए आंसू टेलीफ़िल्मों में भी भूमिका निभाई है।
बता दें कि, ' मुरली सतसई ' में व्यक्ति से लेकर ब्रह्मांड तक को समेटने का सफल प्रयास किया गया है। इसमें जीवन की सार्थकता का चित्रण है तो जीवन की नश्वरता का भी -

सूर्य, चंद्र, तारे, धरा, है ब्रह्माण्ड अनन्त ।
ओर-छोर उसका नहीं, जाने सकल दिगन्त ।।

मन मैला सत्संग बिन, जल बिन मैली देह ।
संतों का मन साफ है, जैसे जनक विदेह ।।

' मुरली सतसई ' में कहीं-कहीं एक ही शब्द का अनेक बार उपयोग करके ध्वनि सौंदर्य उत्पन्न करने में कवि को आश्चर्यजनक सफलता मिली है-

कल-कल करते कल गया, गयी न कल की आश ।
फिर भी कल को देखिए, रचे नए इतिहास ।।

मध्यप्रदेश के भोपाल से  हिंदी जे बाल-जगत के साहित्यकार डॉ. परशुराम शुक्ल  ' मुरली सतसई ' दोहा-संग्रह की भूमिका में आगे लिखते हैं कि,  पं. मुरलीधर पांडेय ने ' सतसई का सृजन ' करने से पूर्व दोहा, छंद और विभिन्न साहित्यकारों  द्वारा रचित सतसइयों का गहन अध्ययन, मनन, चिंतन किया है तथा इनमें कुछ का इन पर गहरा प्रभाव पड़ा है। बाल-महिमा पर रचित दोहे इसी प्रकार के दोहे प्रतीत होते हैं-

मन निर्मल के मूर्त हैं, बच्चे सदा महान ।
इसीलिए इनको कहा, हैं बच्चे भगवान ।।

क्रोध कभी करते नहीं, यदि करते क्षण मात्र ।
ऐसे बच्चे जगत में , सदा क्षम्य के पात्र ।।

जिस घर मे बच्चे नहीं, घर लगता है सून।
आँगन रेगिस्तान है, बंजर देहरादून ।।

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि मुरलीधर पांडेय कृत ' मुरली सतसई ' हिंदी साहित्य के क्षेत्र में, विशेष रूप से सतसई परम्परा में एक मील का पत्थर सिद्ध हुआ है।  लखनऊ के ख्यातिप्राप्त हिंदी के साहित्यकार ' साहित्यभूषण आचार्य रामदेव लाल ' विभोर ' तथा कानपुर डॉ. रामकृष्ण शर्मा ने आशीर्वचन के रूप में बेजोड़ ' मुरली सतसई ' दोहा-संग्रह पर अपना अभिमत लिखा है। कुल 128 पृष्ठों की ' मुरली सतसई ' दोहा-संग्रह ' की कीमत मात्र 150/- रुपये है। संपादकीय / प्रकाशकीय कार्यालय का पत्ता  :- संयोग प्रकाशन, 9 / ए, चिंतामणि , आर.एन. पी. पार्क, काशी विश्वनाथ मंदिर के सामने, भायंदर (पूर्व ) का है । ' मुरली सतसई ' दोहा-संग्रह का मुख पृष्ठ बड़ा शालीन एवं आकर्षक है। ' कवर पेज  देखकर मन मंत्रमुग्ध हो जाता है पुल एवं ' बहता शांत पानी ' जनमानस को यह संदेश देता है कि, पुल जो है जोड़ने का काम करता है। इसीलिये कहा गया है न ' साहित्य समाज को जोड़ता है। '  पुल की भूमिका ' मिनिगफुल ' यह रही । अब शांत बहता पानी ' जीवन में सदैव आगे की तरफ, विकास की तरफ, प्रगति की तरफ सतत बढ़ने की प्रेरणा देता है। '

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