योगी सरकार से सवाल | #NayaSaberaNetwork

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नया सबेरा नेटवर्क
जब शराब की आनलाइन बिक्री सम्भव तो आनलाइन पढ़ाई पर क्यों रोक?
अजय कुमार
उत्तर प्रदेश में लॉक डाउन लगा है। अभी तो 17 मई तक की मियाद है लेकिन इसे बढ़ाया भी जा सकता है जिसकी काफी संभावनाएं हैं। लॉक डाउन से आम जनता को होने वाली मुश्किलें किसी से छिपी नहीं हैं। फिर भी लोग किसी तरह से जिंदगी बसर कर रहे हैं। उन्हें पता है कि कोरोना महामारी से निपटने के लिए लॉक डाउन सबसे मजबूत और ताकतवर विकल्प है। सबसे अच्छी यह बात है कि आम आदमी को दवाओं, दूध, फल-सब्जी, किराने के सामान के अलावा अन्य रोजमर्रा की चीजें सहज उपलब्ध हो जा रही हैं, इसलिए जनता में कोई खास बेचौनी भी नहीं है। लॉक डाउन में जो लोग घर से नहीं निकलने को प्रतिबद्व हैं, उन लोगों के लिए आनलाइन डिलीवरी सेवा मौजूद है। जहां जरूरत से लेकर लग्जरी तक का सभी सामान मौजूद है। लॉक डाउन से यदि किसी को सबसे अधिक परेशानी हो नहीं थी तो वह थे दारू के शौकीनों की, इसीलिए जब बाराबंकी में दारू की दुकानें खुली तो लखनऊ में रहने वाले मदिरा प्रेमियों की गाड़ियों का रूख बाराबंकी की ओर मुड़ गया। खैर, अब तो कई जिलों में दारू की बिक्री शुरू हो गई है। जैसे ही सरकार ने जिलों में शराब की दुकानें खोलने या बंद रखने का अधिकार जिलाधिकारियों को दिया, वैसे ही तमाम जिलाधिकारियों ने आनन-फानन में शराब की दुकानें खुलवा दीं। जहां जिलाधिकारी ने आदेश नहीं दिया तो वहां उन्हें दरकिनार करके आबकारी विभाग के अधिकारियों ने स्वयं ही दुकान खोलने का फरमान सुना दिया। लखनऊ इसका गवाह है। सरकार ने शराब की दुकानें खोलने का आदेश ऐसे ही नहीं दिया है। इस समय सरकार आर्थिक रूप से काफी बुरे दौर से गुजर रही है। शराब की दुकानें बंद होने की वजह से उसे आबकारी शुल्क का काफी नुकसान उठाना पड़ रहा था जबकि प्रदेश सरकार की तिजारी भरने के मामले में आबकारी विभाग दूसरे नम्बर पर आता है।
सरकार सब देख रही है। उसे पियक्कड़ों की चिंता है तो युवाओं के भविष्य की भी फिक्र है, इसलिए उसने एसएससी, यूपीएसी, इंजीनियरिंग, डाक्टरी,  सिविल सर्विस आदि परीक्षाओं की कोचिंग ऑनलाइन चलाए जाने की छूट दे दी है, ताकि प्रतियोगी परीक्षा देने वाले छात्रों का भविष्य नहीं खराब हो। तमाम समाचार पत्रों में कोंचिग संस्थाओं की ओर से बड़े-बड़े विज्ञापन देकर छात्रों को ऑनलाइन परीक्षा कम्पटीशन की तैयारी के लिए आकर्षित किया जा रहा है। यहां तक तो सब ठीक है लेकिन दूसरी तरफ ऐसा भी लगता है कि योगी सरकार को उन छात्रों की बिल्कुल भी चिंता नहीं है जो हाईस्कूल, इंटर या फिर तमाम विश्वविद्यालयों व महाविद्यालयों में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। सरकारी आदेशानुसार स्कूल/कालेज तो 20 मई तक बंद हैं, मगर दुख की बात यह है कि योगी सरकार के एक फरमान के चलते ऐसे छात्रों को आनलाइन शिक्षा भी नहीं नसीब हो पा रही है। प्रदेश सरकार ने सभी स्कूल/कालेजों को आदेश दे रखा है कि कोई आनलाइन शिक्षा नहीं देगा। यह सच है कि आनलाइन शिक्षा उतनी प्रभावी नहीं हो रही है, जितनी आमने-सामने बैठकर शिक्षक, छात्रों को अच्छी तरह से समझा लेता है। कुछ लोगों को इसलिए भी परेशानी का सामना करना पड़ता है, क्योंकि उनके पास इंटरनेट सेवा या ऐसा स्मार्ट मोबाइल नहीं होता है जो ऑनलाइन शिक्षा के लिए मजबूत हथियार माना जाता है लेकिन इस हकीकत से आगे सोचा जाए तो जिस तरह के हालात हैं, उसमें ऐसा लगता नहीं है कि जल्दी स्कूल खुल पाएंगे, इसलिए ऑनलाइन शिक्षा ही अंतिम विकल्प रह जाता है। कई राज्यों मंे हाईस्कूल/इंटर और उच्च शिक्षा के लिए ऑनलाइन पढ़ाई चल भी रही है लेकिन उत्तर प्रदेश में ऑनलाइन शिक्षा पर रोक के लिए सरकार ने जबर्दस्त ‘पहरा’ बैठा रखा है। ऑनलाइन पढ़ाई जारी रखने वाले स्कूलों का नोटिस थमाया जा रहा है।
दरअसल, इस ‘पहरे’ के पीछे कई राज छिपे हुए हैं। असल में कुछ अभिभावक भी नहीं चाहते हैं कि आनलाइन पढ़ाई हो। यह वह अभिभावक हैं जिसमें से कुछ आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण फीस जमा करने में अक्षम हैं तो ऐसे अभिभावकों की संख्या भी कम नहीं जो कोरोना महामारी की आड़ में फीस जमा करने से बचना चाह रहे हैं। इन्हंे मालूम है कि यदि आनलाइन पढ़ाई होगी तो फीस भी जमा करना पड़ेगी, इसीलिए ऐसे अभिभावकों द्वारा ज्यादा हो-हल्ला मचाया जाता है। ऐसे अभिभावकों द्वारा ही ऑनलाइन कक्षाओं के वीडियो/फोटो शिक्षा विभाग के अधिकारियों को भेजे जा रहे हैं। इसी आधार पर शिक्षा विभाग के उच्चाधिकारी इन स्कूलों के खिलाफ कार्रवाई किए जाने की बात कह रहे हैं।
बहरहाल, सौ में 8-10 ऐसे अभिभावकों के हो-हल्ले के चलते, उन 90 प्रतिशत अभिभावकों की आवाज दबकर रह गई हैं जो चाहते हैं कि उनका बच्चा विषम परिस्थितियों में ऑनलाइन शिक्षा के माध्यम से अपनी पढ़ाई जारी रखे। कई अभिभावक इसके लिए स्कूलों में सम्पके भी कर रहे हैं लेकिन सरकारी आदेश का हवाला देकर स्कूल संचालक अपने हाथ खड़े कर देते हैंे। न जाने सरकार में बैठे अधिकारी यह क्यों नहीं समझ पा रहे हैं कि शिक्षा अनवरत् चलने वाली प्रर्क्रिया है जिसमें किसी तरह की बाधा या रूकावट आने से यह प्रक्रिया रूक जाती हैजिसका खामियाजा छात्रों को भविष्य में भुगतना पड़ता है, फिर शिक्षा तो मौलिक अधिकार में शामिल है।
शिक्षा समय पर नहीं मिले तो वह भी ठीक वैसे ही व्यर्थ हो जाती है। जैसे न्याय होने में देरी पर होता है, क्योंकि उम्र के बढ़ने के साथ काफी कुछ पीछे झूठ जाता है। यह बात बच्चों को समझ में आती नहीं है? और अभिभावकों को सिर्फ पैसा बचता हुआ दिखाई दे रहा है। फीस नहीं जमा होेने का असर सरकारी स्कूलों के शिक्षकांे पर तो नहीं पड़ता है लेकिन प्राइवेट स्कूल संचालकों की कमर टूट जाती है। वह अपने शिक्षकों को वेतन नहीं दे पाते हैं। अन्य नियमित खर्चे भी प्रभावित होते हैं। हम कई ऐसे शिक्षकों को जानते हैं जिनको वेतन नहीं मिलने से घर चलाना मुश्किल हो रहा है। एक प्रतिष्ठित प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने वाले एक शिक्षक ने अपना नाम नहीं छापने की शर्त पर अपना दर्द बयां करते हुए कहा,‘ फीस नहीं जमा होने के कारण हम लोगों को दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। एक तो वेतन रूक गया है, दूसरे परिवार के किसी सदस्य या फिर कहीं-कहीं तो पूरे परिवार के ही कोरोना संक्रमित हो जाने के कारण इलाज कराना मुश्किल हो गया है। शिक्षा के क्षेत्र में लगे लोगों की पैसे की तंगी के चलते ‘सांसे फूलने’ लगी है।
आलम यह है कि ऑनलाइन कक्षाओं पर रोक और इसका उल्लंघन करने वाले स्कूल संचालकों पर कार्रवाई की चेतावनी का नोटिस तक थमा दिया गया है। इससे निजी स्कूलों का संगठन ‘अनएडेड प्राइवेट स्कूल्स एसोसिएशन काफी गुस्से में है और कोरोना महामारी का संकट बीतने के बाद सरकार से दो-दो हाथ करने का मन बनाए हुए है। एसो0 के अध्यक्ष अनिल अग्रवाल ने सवाल खड़ा किया है कि जब शराब की ऑनलाइन डिलीवरी हो सकती है तो स्कूल ऑनलाइन क्यों नहीं पढ़ा सकते हैं। शिक्षा बच्चे का अधिकार है, चाहें वह किसी भी माध्यम या किसी भी सरकारी अथवा प्राइवेट स्कूल का छात्र हो। अग्रवाल कह रहे हैं कि ऑनलाइन शिक्षा पर रोक समझ से परे है। इस साल सत्र की शुरूआत से स्कूल में पढ़ाई बंद हैं। ऐसे में शिक्षक घर से ही पढा रहे थे। श्री अग्रवाल ने सवाल खड़ा किया है कि घर पर ऑनलाइन सामान मंगा सकते हैं तो ऑनलाइन शिक्षा क्यों नहीं हो सकती है? उन्होंने कहा कि जहां स्कूलों पर ऑल लाइन गतिविधियां कराने पर रोक लगाई जा रही है, वहीं आनलाइन निजी बेबसाइड एप से पढ़ाई करा रहे हैं। इस सबंध में जब समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता अनुराग भदौरिया का कहना था कि योगी सरकार की मंशा पहले दिन से जनविरोधी रही है। वह जनता के हित में नहीं सरकार को किस फैसले से कितना फायदा होगा, इस पर उसका ज्यादा ध्यान रहता है। जब तमाम राज्यों में ऑनलाइन क्लासेंस चल रहे हैं तब यहां क्यों रोक लगी है, यह समझ से परे हैं। एक तरफ सरकार शराब की दुकाने खोल रही है, दूसरी तरफ शिक्षा जो बच्चों का मूल अधिकार है, उसको रोक रही है। योगी सरकार के दिन पूरे होने वाले हैं। अब समाजवादी सरकार बनेगी तभी प्रदेश को दोबारा से पटरी पर लाया जा सकेगा।
कांग्रेस के दिग्गज और ‘थिंक टैंक’ माने जाने वाले वरिष्ठ नेता सुबोध श्रीवास्तव से जब योगी सरकार के ऑनलाइन शिक्षा पर रोक के संबंध में पूछा गया तो उनका कहना था कि योगी सरकार की गलत नीतियों और फैसलों के चलते प्राइवेट शिक्षक वर्ग बेरोजगार होकर बर्बादी के कगार पर है। आमदनी बन्द होने के चलते अधिकतर छोटे-छोटे स्कूलों ने अपने स्टाफ की छुट्टी कर दी है जिससे वे सब बेरोजगार हो गये हैं। आजीविका को लेकर परेशान रोटी के संकट से जूझ रहे अनेक प्राइवेट शिक्षक भी मजदूरी करने तक को मजबूर हैं। सुबोध का कहना है कि शिक्षा के लिये बड़े-बड़े बजट पास करने वाले नेताओं की लिस्ट में चौपट हो रही शिक्षा व्यवस्था और बर्बाद प्राइवेट शिक्षकों के लिये कोई योजना नहीं है। सरकार को इस पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
(लेखक उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ मान्यताप्राप्त पत्रकार एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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