पत्नी की उच्च शिक्षा योग्यता खुद की आजीविका चला सकने का कारण नहीं हो सकती है - फैमिली कोर्ट के फैसले पर हाईकोर्ट ने मुहर लगाई - 3000 प्रति माह भरण पोषण का आदेश | #NayaSaberaNetwork

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नया सबेरा नेटवर्क
नारी सम्मान में भारतीय कार्यपालिका व न्यायपालिका का विश्व में सर्वश्रेष्ठ स्थान - एड किशन भावनानी
गोंदिया - भारत वैश्विक स्तर पर एक ऐसा देश है जहां नारियों का हर क्षेत्र में काफी सम्मान किया जाता है संविधान से लेकर भारतीय कानूनों में भी नारी याने महिलाओं के लिए अनेक योजनाएं जो जन्म से लेकर संपूर्ण आजीविका के लिए अनेक कानूनों में बहुत ही धाराएं हैं, जो उनकी आजीविका सुरक्षित करती है। जिनमें कार्यपालिका व न्यायपालिका का बहुत बड़ा सहयोग रहता है.. बात अगर हम महिलाओं के भरण-पोषण की करें तो इस संबंध में अनेक कानून हैं जो इस प्रकार हैं। भरण-पोषण से संबंधित कानूनी प्रावधान--भरण-पोषण हिन्दू दत्तक और भरण-पोषण कानून, 1950 (धारा 18-23) के मुख्य प्रावधान, हिन्दू विवाह कानून, 1955 (धारा 24 और 25) के मुख्य प्रावधान, इस कानून के अन्तर्गत भरण-पोषण मांगने के लिए शिकायत किससे और कहाँ करें- घरेलु हिंसा से महिला का संरक्षण, 2005 (धारा 20) के मुख्य प्रावधान माता – पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 के मुख्य प्रावधान भरण-पोषण पत्नी, नाबालिग बच्चे, अविवाहित पुत्री, वृद्ध माता-पिता और विधवा बहू, जिनका कोई अपना भरण-पोषण का सहारा नहीं है, उनको भरण-पोषण में भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा और चिकित्सा उपचार का विभिन्न कानूनों द्वारा हक व संरक्षण का प्रावधान है।भरण-पोषण निम्नलिखित कानूनों के अन्तर्गत प्राप्त किया जा सकता है –1) दण्ड प्रक्रिया संहिता (Cr.PC) (धारा 125), 2) हिन्दू दत्तक और भरण-पोषण कानून, 1950 (धारा 18-23), 3) हिन्दू विवाह कानून, 1955 (धारा 24 और 25), 4) घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण कानून, 2005, 5) माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के लिए भरण-पोषण और कल्याण कानून, 2007 दण्ड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C) (धारा 125) में भी मुख्य प्रावधान हैं.... इसी विषय से संबंधित एक मामला माननीय कर्नाटक हाईकोर्ट में सोमवार दिनांक 25 जनवरी 2021को माननीय सिंगल जज बेंच जिसमें माननीय न्यायमूर्ति एच डी प्रभाकरा सस्त्री की बेंच के सम्मुख आरपीएफसी क्रमांक 133/2014, याचिकाकर्ता बनाम श्रीमती रूपा जो फैमिली कोर्ट मैसूर से क्रिमिनल अन्य क्रमांक 296/2008 दिनांक 3 जनवरी 2013 से उदय हुआ था जिसमें माननीय बेंच ने अपने 18 पृष्ठों और 21 प्वाइंटों के आदेश में फैमिली कोर्ट मैसूर के फैसले पर मुहर लगाई और कहा कि पत्नी की उच्च शिक्षा योग्यता होने का यह मतलब नहीं कि वह खुद की आजीविका चला सकती है और याचिकाकर्ता पति को ₹3000 प्रतिमाह देने का फैमिली कोर्ट केआदेश पर मुहर लगाई और पति की याचिका को खारिज कर दिया। आदेश कॉपी के अनुसार बेंच ने कहा, यह अनुमान लगाने का कोई कारण नहीं कि किसी महिला में उच्च शिक्षा योग्यता है फ़ैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए, याचिकाकर्ता द्वारा दायर की गई पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए बेंच ने कहा कि वे अपनी पत्नी को प्रति माह 3,000 रुपये का भुगतान करें। पति ने दावा किया था कि पत्नी अपनी शैक्षणिक योग्यता में एक डबल ग्रेजुएट महिला है, इस तरह, वह याची पति को भरण-पोषण के लिए परेशान किए बिना, अपनी आजीविका स्वयं प्राप्त कर सकती है। अदालत द्वारा पत्नी का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त वकील ने अपनी दलील में कहा कि मात्र शैक्षिक योग्यता या उच्च शिक्षा योग्यता रखने वाला व्यक्ति, अपनी जीविका कमाने की क्षमता वाले व्यक्ति को आत्मनिर्भर नहीं बना सकेगा। उसने आगे कहा कि, हालांकि वर्तमान प्रत्यर्थी के रूप में पत्नी के पास कमाने की क्षमता है, लेकिन वह बेशक, चिकित्सा कारणों सहित विभिन्न कारणों से अपनी आजीविका नहीं चला सकती हैं। इसलिए,वर्तमान याचिकाकर्ता पति का कर्तव्य है कि वह उसे बनाए रखे।न्यायालय ने अमृत क्यूरी प्रस्तुत करने पर सहमति व्यक्त की और धारा 125 (1)(क) और (ख), सीआरपीसी की धारा 125 (ख) और (ख) का निरीक्षण किया।स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि यह पत्नी या बच्चों की क्षमता नहीं है,जो उन्हें गुजारा कराने का दावा करने के लिए पात्र बनाती है, लेकिन वे अपने आपको न रख पाते हैं। उपर्युक्त भाग का पढ़ना, विशेष रूप से उप-धारा (1)(क) और कथित भाग के 1(ख) पढ़ने से स्पष्ट पता चलता है कि कानून में क्या जरूरत है, पत्नी या पुत्रियों ने खुद को बनाए रखने में असमर्थता हैं इसमें कहा खुद को बनाए रखने में असमर्थ व्यक्ति को अपनी आजीविका कमाने की क्षमता के साथ समकक्ष नहीं किया जा सकता है। यद्यपि कोई व्यक्ति किसी कार्य के लिए शैक्षणिक रूप से सुयोग्य हो सकता है या किसी विशिष्ट कार्य को करने के लिए योग्य हो सकता है या निजी या किसी पद या नौकरी के लिए आवेदन करने में सक्षम हो सकता है, लेकिन फिर भी वह अपने को बनाए रखने में असमर्थ हो सकता है। न्यायालय ने नोट किया कि केवल शैक्षणिक योग्यता के आधार के द्वारा कोई इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकता है कि इस तरह का योग्यता धारक, विशेष रूप से सीआरपीसी की धारा 125 के तहत एक पत्नी., खुद को बनाए रखने में सक्षम है, किसी महिला के लिए ऐसी नौकरी से इस्तीफा देने के कई कारण हो सकते हैं, जिसमें वह एक विशेष समय पर काम करती और अपने पति के भरण-पोषण की आशा करती है। जब तक यह अकाट्य साक्ष्य के माध्यम से नहीं लाया जाता कि नौकरी से त्यागपत्र देने या सरकारी नौकरी छोड़ने का ऐसा अधिनियम केवल अपने पति को भरण-पोषण के लिए विवश करने का इरादा था, जो परिस्थितियां संभवतः वाररा हो सकती हैं।कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला,इन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद, फैमिली कोर्ट, अपने उचित परिप्रेक्ष्य में रखी गई सामग्री का विश्लेषण करने के बाद, इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि, उसके समक्ष याची, अर्थात, भरण के लिए हकदार था और इसमें प्रत्यर्थी (इसमें) कथित याचिका की तारीख से प्रति माह अपनी पत्नी (इसमें प्रत्यर्थी) को भरण-पोषण के लिए देय था। पत्नी का भरण-पोषण पति के लिए महज सुखकर नहीं है बल्कि पति का कर्तव्य है कि वह अपनी पत्नी का भरण-पोषण करे, जो कि स्वयं उसका भरण-पोषण नहीं कर सकती और जब वह अपने आपको संभालने में असमर्थ हो जाती है तो पति का कर्तव्य हो जाता है कि वह उसका पालन करे? मामले का विवरण-सन् 2003 में हिन्दू-धर्म के अनुसार दंपति का विवाह हुआ।इसके बाद, वे अलग हो गए और पत्नी मैसूर में अपने भाई के घर में अलग रहती रही। पत्नी ने, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125 के तहत फ़ैमिली कोर्ट के समक्ष एक आवेदन दाखिल किया था, जिसमें प्रत्यर्थी द्वारा प्रति माह 5,000 की दर से भरण-पोषण की मांग की गई थी। पति ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 (1) (आई ए ए) के तहत उसी परिवार न्यायालय में विवाह के विघटन की मांग की परिवार न्यायालय ने 03-01-2013 के अपने फैसले से पति द्वारा तलाक के लिए दायर याचिका की अनुमति दे दी। उसने पत्नी द्वारा धारा 125 के तहत दाखिल की गई याचिका को भी अनुमति दी।
संकलनकर्ता कर विशेषज्ञ एड किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

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